रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
एकविंशप्रकाशः २१. ( २१५ )
बखानिये ॥ हाथलैकुशगोत्रउच्चरिसुवर्णयुक्तप्रमानिये । दान
दैकछुऔरदीजहिदानसात्त्विकजानिये ॥ ४ ॥
टी०-॥१॥ कहा कहे कौन वस्तु कै भांति कहें कै प्रकारसों दान कीजै दान
पदको संबंध याहूमों है ॥ २ ॥ ३ ॥ देवदेव जे विष्णु हैं तिनहिं स्थापिकै
कहे तिनके अर्थ फल समर्पण करिकै अथवा ब्राह्मणको देवहि ( विष्णुहि )
थापिकै कहे मानिकै अथवा देवदेवकी स्थापना करिकै सुवर्णसों युक्त कुश
हाथमें लैके गोत्रको उच्चरिकै वेदके मंत्रसों दान फेरि कछू और दीजै अर्थ
सांगतादान दीजै दानके बादि जो दान दियो जात है सो सांगतादान
कहावतहै ॥ ४ ॥
मू०-दोधकछंद ॥ देहि नहींअपनेकरदानैं । औरकेहाथ
जोमंगलजानै ॥ दानहिं देतजोआरसुआवै । सोवहरा जसदा-
नकहाव ॥ ५ ॥ बिप्रनदीजतहीनबिधानैं । जानहुँताकहँता-
मसं दानैं ॥ बिप्रनजानहुँजैनररूपै । जानहुँयेसबविष्णुस्वरूपै
॥ ६ ॥ श्लोक ॥ साचारो वा निराचारो साधुर्वासाधुरेव च ।
अविद्यो वा सविद्यो वा ब्राह्मणो मामकी तनुः ॥ ७ ॥
तोमरछंद ॥ द्विजधामदेहिं जो जाइ । बहुभाँतिपूजिसुराइ ॥
कछुनाहिँनैपरिमान । कहियेसोउत्तमदान ॥८॥ द्विजकोजो-
देतबोलाइ । कहियेसोमध्यमराइ ॥ गुनियाचनामिसदानु ।
अतिहीनताकहँजानु ॥ ९ ॥
टी०-॥५॥ विप्रनको जगरूपै कहे जगतके सदृशै जै कहे जनि जानहुँ ॥६॥
पाछे कह्यो कि विप्रनको विष्णुस्वरूपै जानौं ताको विष्णु वाक्यसों पुष्ट करत
हैं विष्णु कह्यो है कि ब्राह्मण कहे आचार सहित होइ और अर्थ सुगम है
मामकी कहे हमारो तनु कहा है ॥ ७ ॥ ताकी उत्तमताको कछू प्रमाग नहीं
है ॥ ८ ॥ अतिहीन कहे अधम ॥ ९ ॥
मू०-श्लोक ॥ अभिगम्योत्तमं दानमाहूतं चैव मध्यमम् ।
अधमं याच्यमानं स्यात्सेवादानं तु निष्फलम् ॥ १०॥ दोहा॥
( २१६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
प्रतिदिनदीजतनेमसों, ताकहँनित्यबखान ॥ कालहिपाइजो
दीजिये, सोनैमित्तिकदान ॥ ११ ॥ श्लोक ॥ आश्रितं साधु
कर्माणं ब्राह्मणं यो व्यतिक्रमेत् । तस्य पुण्यचयोप्याशु क्षयं
याति न संशयः ॥ १२ ॥ तोटकछंद ॥ पहिलेनिजवर्तिनदेहु
अबै । पुनिपावहिनागरलोगसबै ॥ पुनिदेहुसबैनिजदेशिनको
उबरोधनदेहुबिदेशिनको ॥ १३ ॥ दोधकछंद ॥ दानसकाम
अकामकहेहैं । पूरिसबैजगमांझरहेहैं॥इच्छितहीफलहोतसका-
मैं । रामनिमित्तेजानिअकामै ॥ १४ ॥
टी०-अभिगम्य कहे ब्राह्मणके घरमें जाइकै जो दान है सो उत्तम है औ
आहूत कहे ब्राह्मणको बोलायकै जो दान है सो मध्यम है औ याच्यमान कहे
जब ब्राह्मण मांगै आइ तब जो दान है सो अधम है औ सेवादान कहे जब
ब्राह्मण सेवा करै तब जो दान है सो निष्फल है अर्थ वामें कछू पुण्य नहीं है
॥ १० ॥ काल पाइ अर्थ चन्द्र सूर्य ग्रहणादि समयमों ॥ ११ ॥ अपनो
आश्रित जो साधुकर्मा ब्राह्मण है ताको जो व्यतिक्रमेत् कहे व्यतिक्रम करत है
अर्थ तिन्हें छोड़ि औरको दान देत है ताको पुण्यचय कहे पुण्यसमूह आशु कहे
शीघ्र ही “ क्षयं याति ” कहे क्षयको प्राप्त होता है यामें संशय नहीं अपि शब्दते
या जनायो कि थोरी पुण्य तौ क्षयको प्राप्त होतिही है ॥ १२ ॥ आश्रितको
व्यतिक्रम न कियो चाहिये तासों पहिले निज कहे आपने वर्ती कहे आश्रित-
नको देहु औ “ निजबृित्तिन ” पाठ होइ तौ निज कहे आपने इहां है दानहीसों
वृत्ति कहे जीविका जिनकी नागर कहे नगरवासी ॥ १३ ॥ १४ ॥
मू०-दानतेदक्षिणबामबखानौं । धर्मनिमित्तेदक्षिणजा-
नों ॥ धर्मबिरुद्धतेबामगुनौजूं । दानकुदानसबैतेसुनौजूं १५॥
देहुसुदानतेउत्तमलेखो। देहुकुदानतिन्हैंजनिदेखो ॥ छांडिसबै
दिनदानहिं दीजै । दानहिंतेसबकेमतलीजै ॥ १६ ॥ दोहा ॥
केशवदानअनंतहैं, बनैनकाहूदेत ॥ यहैजानिसुवभूपसब,भूमि
दानहीदेत ॥ १७॥ श्लोक ॥ यत्किंचित्कुरुते पापं ज्ञानतोऽज्ञा-
नतोपि वा ॥ अपि गोचर्ममात्रेण भूमिदानेन शुध्यति ॥१८॥
सप्तहस्तेनदंडेनत्रिंशद्दंडैर्निवर्तनम् । दश तान्येव गोचर्म दत्त्वा
स्वर्ग महीयते ॥ १९॥ अन्यायेन कृता भूमियैर्नरैरपहारिता।
हरंतो हारयंतश्च हन्यते सप्तमं कुलम् ॥ २० ॥ राम-दोहा ॥
कौनहिदीजैदानुभुव, हैंऋषिराजअनेक ॥ देहुसनाढ्यनआदि
दै, आयेसहितविवेक ॥ २१ ॥ श्रीराम--उपेंद्रवज्राछन्द ॥ कहौ
'भरद्वाजसनाढ्यकों हैं। भयेकहांतेंसबमद्ध्यसोहैं ॥ हुतेसबैबि-
प्रप्रभावभीने । तजेतेक्योँयेअतिपूज्यकीने ॥ २२ ॥
टी०-मारणोच्चाटनादिके लिये जो दान है सो धर्मविरुद्ध जानौ अथवा वेश्या-
दिके अर्थ दान ॥ १५ ॥ सबके मीमांसकादिकनके मत कहे सम्मत अर्थ
सम्मत फलको लीजै कहे पाइयत है अर्थ मीमांसकादिकनको मत है कि यज्ञा-
दिसों ऐहिक पारलौकिक फल होत है सो सब फल दाननहीसों पाइयत है तासों
सबको यज्ञादिकनको छोडिकै दिनप्रति दानहीको दीजै ॥ १६ ॥ १७ ॥ यत्कहे
जो ज्ञानतः कहे जानिकै अज्ञानतः कहे विनजाने कोऊ प्राणी किंचित्कह कछु
पापं कहे पाप जो है ताहि कुरुते कहे करत हैं, सो प्राणी गोचर्ममात्रेण भूमि-
दानेन कहे गोचर्ममात्र भूमिदान करत संते शुद्ध होत है अपि शब्दको अर्थ यह
कि अधिक भूमिदान करै तासों तौ शुद्ध यामें गोचर्मको लक्षण कहत हैं ॥१८॥
सप्तहस्तेन दंडेन कहे सात हाथके दंडकरिके त्रिंशद्दंडैः कहे तीसदंड करत संतेनिवर्तन
संज्ञक भूमिक्षेत्र होत है हस्तप्रमाण दुइसैदश औ दश तान्येव कहे तेई निवर्त्तनहीं
एक गोचर्म संज्ञक क्षेत्र होत है हस्तप्रमाण इक्कीससै २१०० सो गोचर्म प्रमाणहूं
भूमिको दत्त्वा कहे दैके स्वर्गे कहे स्वर्गको महीयते कहे जात है ॥ १९ ॥ यैर्नरैः
कहे जिन नरन करिकै अन्यायेन कहे न्याय बिनाही भूमिहृता कहे हरि गई औ जिन
नरन करिकै अपहारिता कहे हराई गई ता भूमिकरिकै हरंतःकहे हरनहार औ हारयंतः
[ हरावनहार ] ते हन्यते कहे पीडाको प्राप्त होत हैं अर्थ सो भूमि तिनको पीडा
करती है औ “तेषां सप्तमं कुलमपि हन्यते” अर्थ ताही भूमि करिकै तिनके
सातपुस्त पर्यंत पितर पीडाको प्राप्त होत हैं अर्थ जे दानकी भूमिको निर्दोष
छोरत हैं औ वृथापवाद कहि छोरावतहैं सो भूमि तिनको औ तिन दुहुनके सप्तपुस्त
पर्यंत पितरनको पितृलोकमें पीडा करति है ॥ २० ॥ ऋषि कह्यो सनाढ्यनको
( २१८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
दान देहु काहंते इन सनाढ्यनको आदिही सों अस अर्थ जबसों इनकी उत्पत्ति
है तबहीसों तुम विवेक सहित दै आये हौ ॥ २१ ॥ २२ ॥
मू०-भरद्वाज ॥ गिरीश नारायणपैसुनीत्यौं । गिरीशमोसों
जो कहीकहौंत्यौं ॥ सुनोसोसीतापतिसाधुचर्चा । करीसोजाते
तुमब्रह्मअर्चा ॥ २३ ॥ नारायण-मोटनछंद ॥ मोतेजलना-
भिसरोजबढ्यो । ऊंचोअतिउग्रअकाशचढ़्यो ॥ तातेचतुरा-
ननरूपपरो ॥ ब्रह्मायहनामप्रगट्टभयो ॥२४॥ ताकेमनतेसुत
चारिभये । सोहैंअतिपावनवेदमये ॥ चौहूंजनकेमनतेउपजे ।
भूदेवसनाढ्यतेमोहिंभजे ॥ दीन्हौतुमहीतिनजोहितजू ॥ है
हौ तुमब्रह्मपुरोहितजू ॥ २५ ॥
टी०-गिरीश (महादेव) जाति कहे जाकारणते तुम ब्रह्म अर्चा कहे सनाढ्य
ब्राह्मणनकी पूजा करी है अथवा ब्रह्म जे तुम हौ ते सनाढ्यनकी अर्चा आदिहीसों
करी है ॥ २३ ॥ २४ ॥ यह छंद छह चरणको है चारि सुत सनक, सनन्दन,
सनातन, सनत्कुमार वेदमये कहे वेदस्वरूप ये नारायणके वचन शिव प्रति हैं तिन्हें
कहिके द्वै चरणनमों भरद्वाज रामचन्द्रसों कहत हैं कि हे रामचन्द्र ! नारायणरूप
जे तुम हौ तिनहीं तिनको हितसों यह वचन दियो है वचन इतिशेषः ॥ कि तुम
ब्रह्म कहे परब्रह्मके पुरोहित है हौ ॥ २५ ॥
मू०-गौरीछंद ॥ तातेऋषिराजसबैतुमछांडो । भूदेवसना-
ढ्यनकेपद्मांडो ॥ दीन्हौतुमहीतिनकोबररुरे । चौंहूंयुगहो-
हुतपोबलपूरे ॥ २६ ॥ उपेंद्रवज्राछन्द ॥ सनाढ्यपूजाअघ-
ओघ हारी । अखंडआखंडललोकधारी । अशेषलोकावधि-
भूमिचारी । समूलनाशेनृपदोषकारी ॥ २७ ॥ श्रीराम-तोट-
कछंद ॥ हनुमन्तबलीतुमजाहुतहां । मुनिवेषभरत्थबसं-
तजहां ॥ ऋषिकैहमभोजनआजुकरैं । पुनिप्रातभरत्थहिंअं-
कभरैं ॥२८॥ चतुष्पदीछंद ॥ हनुमंतविलोकेभरतसशोकेअं-
गसकलमलधारी । बकलापहिरेतनशीशजटागणहैंफल-
एकविंशप्रकाशः २१. ( २१९ )
मूलअहारी ॥ बहुमंत्रिनगणमें राजकाजमेंसबसुखसोहित-
तोरे । रघुनाथपादुकातनमनप्रभुकारसेवतअंजुलिजोरे ॥२९॥
टी०-ब्रह्मपुरोहित होवेको इन्हें तुम्हारोई वर है औ तुम ब्रह्म हौ ताते कहे ता
हेतुते ॥ २६ ॥ अखंड कहे पूर्ण आखंडललोकधारी कहे इन्द्रलोककी धरण
हारी है जो कोऊ सनाढ्यनकी पूजा करत है ताको पूर्ण इंद्रलोक देतिहै इति
भावार्थः अशेषलोकावधि कहे चौदहों लोक पर्यन्त जो भूमि कहे स्थान हैं
तिनमें चारी कहे गमनकारी है अर्थ चौदहोंलोकमें सनाढ्यनकी पूजा सब करत
है अथवा चौदहोंलोकनमें नैनमारग, श्रवणमारग ह्वै गमन करति हैं अथ चौदहों
लोकनमें विदित है ॥ २७ ॥ बीसयें प्रकाशमें भरद्वाज कह्यो है कि अब करहु
विजय वैकुंठ क्षिप्र या प्रकार निमंत्रण दियो है तामों रामचन्द्र हनूमानसों कहत
हैं कि आज ऋषिको निमंत्रण है तासों ऋषिके इहां भोजन करि प्रात भरतपास
नन्दिग्राममें आइ हैं ॥ २८ ॥ २९ ॥
मू०-हनुमान ॥ सबशोकनिछाड़ौभूषणमांडीकेजेविविधि
बधाये । सुरकाजसँवारेरावणमारेरघुनन्दनघरआये ॥ सुग्री-
वसुयोधनसहितबिभीषणसुनहुँभरतशुभगीता । जयकीरति
ज्योंसँगअमलसकलअँगसोहतलक्ष्मणसीता ॥ ३० ॥ पद्ध-
टिकाछंद ॥ सुनिपरमभावतीभरतबात । भयेसुखसमुद्रमैंमगन
गात ॥ यह सत्यकिधौंकछुस्वप्नमईश । अबकहाकह्योमोसन
कपीश ॥ ३१ ॥ जैसेचकोरलीलैलैअँगार । त्यहिभूलिजाति
सिगरीसँभार । जीउठतउबतज्योंउदधिनंद । त्योंभरतभये
सुनिरामचन्द्र ॥ ३२ ॥ ज्यों सोइरहतसबशूरहीन । अतिहै
अचैतयद्यपिप्रबीन॥ ज्यों उबत उठतहँसिकरतभोग त्यों राम
चन्द्रसुनिअवधिलोग ॥ ३३ ॥ मालिनीछंद ॥ जहँतहँगज-
गाजैंदुंदुभीदीहबाजैं । बहुबरणपताकास्यंदनाश्वादिराजैं ॥
भरतसकलसेनामध्ययोंवेषकीने । सुरपतिजनुआये मेघमा-
लानिलीने ॥ ३४ ॥ सकलनगरबासिभिन्नसेनानिसार्जैं ।
रथसुगजपताकाझुंडझुंडानिराजैं ॥ थलथलसब शोभैंशुभ्र
शोभानिछाई । रघुपतिसुनिमानोंऔधिसीआजआई ॥ ३५॥
चामरछंद ॥ यत्रतत्रदासईशव्योमतेविलोकहीं । बानरालिरी-
छराजिदृष्टिसृष्टिरोकहीं । ज्योंचकोरमेघओघमध्यचंद्र-
लेखहा । भानुकेसमानजानत्योंबिमानदेखहीं ॥३६ ॥' मदन
मनोहरदंडक ॥ आवतबिलोकिरघुबीर लघुबीरतजिव्योमगति
भूतलबिमानतबआइयो । रामपदपद्मसुखसझकहँबंधुयुगदौरि
तबषटमदसमानसुखपाइयो ॥ चूमिमुखसूंघिशिरअंकरघुनाथ- .
धरिअश्रुजललोचननिपेखिउरलाइयो । देवमुनिवृद्धपरसिद्ध
सबसिद्धजनहर्षितनपुष्पवर्षानिवरषाइयो ॥ ३७ ॥
टी०-माँडौ कहे पहिरौ ॥ ३० ॥ ३१ ॥ उद्घिनंद ( चन्द्रमा ) ॥ ३२ ॥
॥ ३३ ॥ स्यंदन ( रथ ) अश्व ( घोडे ] आदि पदते पालकी आदि और जानौं
॥ ३४ ॥ थल थलमें सकल नगरबासी कैसे शोभित हैं कि अनेक प्रकारके
भूषण वस्त्रादिकी शोभानसों छायो रघुपतिको आगमन इतिशेषः सुनिकै मानों
अवधपुरीहीसी आई है ॥ ३५ ॥ बानरनकी आलि कहे पंक्ति औ ऋक्षन की
राजि पंक्ति है सो पुरवासिनकी दृष्टिकी जो सृष्टि कहे ताको रोकति है अर्थ
आगे वानर ऋक्ष उडत आवत हैं तासों रामचंद्र नहीं देखि परत भानु कहे सूर्य-
रूपी जो यान कहे बाहे बाहन हैं. तामों चढ्यो चंद्रमाको जैसे मेघ ओघ कहे मेघ
समूहमें चकोर लेखै ताहि बिधि भानु (सूर्य ) सम जान [ पुष्पक ] में रामचन्द्रको
बानरनके मध्यमें पुरवासी देखत हैं यामें [ अभूतोत्प्रेक्षा ] है दूसरो अर्थ सुगम
है ॥ ३६ ॥ अंक कहे गोदमें धरि लियो कहे बैठारि लियो फेरि लोचननमें अश्रु
देखि अति प्रीतिसों उरमें लाइ लियो ॥ ३७ ॥
मू०-दोहा ॥ भरतचरणलक्ष्मणपरे, लक्ष्मणकेशत्रुघ्न ॥ सी
तापगलागतदियो, आशिषशुभशत्रुघ्न ॥ ३८ ॥ मिलैभरतअरु
शत्रुहन, सुग्रीवहिअकुलाइ ॥ बहुरिबिभीषणकोमिले,अंगदको
सुखपाइ ॥ ३९ ॥ आभीरछंद ॥ जामवंतनलनील । मिलेभर
तशुभशीला॥ गवयगवाक्षगयंद । कपिकुलसबसुखकंद ॥४०॥
ऋषिवशिष्ठकोदेखि । जनमसफलकरिले खि ॥ रामपरेउठिपाय
लक्ष्मणसहितसुभाय ॥ ४१ ॥ दोहा ॥ लैसुग्रीवबिभीषणहिं,
करिकरिबिनयअनंत ॥ पाँयनपरेवशिष्ठके कबिकुलबुधिबलवं-
त ॥ ४२ ॥ श्रीराम-पद्धतिकाछंद ॥ सुनिजैवशिष्ठकुलइष्टदे-
व। इनकपिनायककेसकलभेव ॥ हमबूझतहैं विपदासमुद्र । इन
राखिलियोसंग्रामरुद्र ॥ ४३ ॥
टी०-जब भरत शत्रुघ्न सीताके पद लागे तब सीताजू आशिष दियो कि
शत्रुघ्न कहे शत्रुको मारौ ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ ४० ॥ ४१ ॥ ४२ ॥ कपिनायक
(सुग्रीव) संग्राममें रुद्र कहे भयंकर ॥ ४३ ॥
मू०-सबआसमुद्रकीभूशोधाइ । तबदईजनकतनयाबताइ ॥
निजबाइभरतज्योंदुखहरण । अतिसमरअमरहत्यो कुंभक-
रण ॥ ४४ ॥ इनहरेविभीषणसकलशूल । मनमानतहौं शत्रुघ्न
तूल ॥ दशकंठहनतसबदेवसाखि । इनलियेएकहनुमंतराखि ॥
॥ ४५ ॥ तजितियसुतसोदरबंधुईश । मिलेहमहिंकायमनवच
ऋषीशं ॥ दईमीचुइन्द्रजितकीबताय । अरुमंत्रजपतराषणदे-
खाय ॥ ४६ ॥ तोटकछंद ॥ इनअंगदशत्रुअनेकहने । हम-
हेतुसहेदिनदुःखघने ॥ बहुरावणकोसिखहीदुखलै। पुनिआये
भलेसियभूषणलै ॥ ४७ ॥
टी०-शोधाइ कहे ढुंढाइके कुंभकर्णको तो रामचन्द्रही मारयो है परंतु कुंभ-
कर्णकी नासा, श्रवण, प्रथम सुग्रीव काटि लियो है ताही समयमें रामचन्द्र
मारयो है ताको मारिवो सुग्रीव ही पर स्थापित करत हैं अमर कहे काहूके मारिबे
लायक नहीं ॥ ४४ जब मेघनाद ब्रह्मपाशमें हनुमानको बांधि लैगयो है तब
रावण हनूमानके वध करिबेकी आज्ञा राक्षसनको दियो है तब विभीषण “दूत
मारिये न राज छोडि दीजै” ऐसे वचन कहि हनूमानको बचायो है सो कथा
चौदहें प्रकाशमें है ॥ ४५ ॥ सोदर [ कुंभकर्ण ] बंधु [ ज्ञातिसमूह ] ईश-
( २२२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
रावण के मंत्र जपत समय अंगदादि गये हैं ता समय विभीषणके कछू वचन
नहीं हैं तौ इहां रामचन्द्रकी उक्तिसों जानो विभीषणहीके बतायेसों अंगदादि
गये हैं ॥ ४६ ॥ हम हेतु कहे हमारे हेतु ॥ ४७ ॥
मू०-दशकंधके जायजोगूढ़थली । तिनकेतनसोंबहुभांति
दली ॥ महिमैंमयकीतनयाकर्षी । मतिमारिअकंपनकोहर्षी ॥
॥ ४८ ॥ दोहा ॥ मारयोमैंअपराधबिन,इनकोपितुगुणग्राम ॥
मनसावाचाकर्मणा,कीन्हेमेरेकाम॥४९॥गीतिकाछंद॥इनजा-
मवंतअनेकराक्षसलक्षलक्षनहींहने । मृगराजज्यौंबनराजमैंग-
जराजमारतनीगने॥ बलभावनाबलवानकोटिकरावणादिकहा-
रहीं । चढ़िव्योमदीहबिमानदेवदिवानआनिनिहारहीं ॥ ५० ॥
दोहा ॥ करैनकरिहैकरतअब, कोऊऐसोकर्म ॥ जैसेबांध्योनल
उपल, जलनिधिसेतुसधर्म ॥ ५१ ॥ गीतिकाछंद ॥ हनुमन्त
येजिनमित्रतारविपुत्रसोंहमसोंकरी । जलजालकालकरालमा-
लउफालपारधराधरी ॥ निश्शंकलंकनिहारिरावणधामधामनि
धाइयो । यकबाटिकातरुमूलसीताहिंदेखिकैदुखपाइयो ॥५२॥
टी०-गूढस्थली [ जपस्थान ] तिनके अंगदके तनसों कर्षी कहे खेंची कठोरि
इति औ अकंपनको मारिकै इनकी मति हर्षी ( प्रसन्न ) भई ॥ ४८ ॥
॥४९॥ लक्षलक्षनही अर्थ एक एक वारमें लाख लाख मारयौहै बनराज कहे बडो बन
बलभावता कहे बलक्रिया हारही कहे हारत भये यहां भूतार्थमें बर्त्तमान प्रत्ययको
अर्थ है ॥ ५० ॥ उपल ( पाषाण ) सधर्म कहे यथोचित ॥५१॥ कालहूते कराल
जे नक्रादि जंतु हैं तिनको है माल कहे समूह जामें ऐसो जो जलजाल कहे समु-
द्रको जलसमूह है ताके पारकी धरा पृथ्वीको उफाल कहे कूदिबो ताही सों धरी
कहे प्राप्त भये अर्थ एतो बडो समुद्र ताके पार कूदिही कै गये काहू पोतादिमें
नहीं गये इति भावार्थः ॥ ५२ ॥
मू०-तरुतोरिडारिप्रहारिकिंकरमंत्रिपुत्रसँहारियो । रणमारि
अक्षकुमाररावणगर्वसोंपुरजारियो । पुनिसौंपिसीतहिमुद्रिका-
मणिशीशकीजबपाइयो । बलवन्तनांविअनंतसागरतैसही
फिरिआइयो ॥ ५३ ॥ दशकंठदेखिबिभीषणैरनब्रह्मशक्तिच-
लाइयो । करिपीठित्योंशरणागतैतबआपवक्षसिलाइयो । एक
यामयामिनिमैंगयोहतिदुष्टपर्बतआनिकै । त्यहिकाललक्ष्मण
कोजिआइजिआइयोहम्जानिकै ॥ ५४ ॥ दोहा ॥ अपने
प्रभुकोआपनो, कियोहमारोकाज ॥ ऋषिऋक्षकहौहनुमंतसों,
भक्तनकोशिरताज ॥ ५५ ॥ चामरछन्द ॥ बीरधीरसाहसी
बलीजेबिक्रमीक्षमी । साधुसर्वदासुखीतपीजपीजेसंयमी ॥
भोगभागयोगयागवेगवन्तहँजिते । वायुपुत्ररामकाजवारिडारि
येतितै ॥५६॥ दोहा ॥ सीतापाईरिपुहत्यो, देख्योतुमअरुगेहु
रामायणजपसिद्धिको, कपिशिरटीकादेहु ॥ ५७ ॥ दोहा ॥
यहिबिधिकपिकुलगुणनको, कहतहुतेश्रीराम ॥ देख्योआश्रम
भरथको, केशवनन्दीग्राम ॥ ५८ ॥
टी०-अनंत कहे बडो ॥ ५३ ॥ दुष्टपदते कालनेमि जानो लक्ष्मणको जियाइ
हम कहे हमें जिआयो लक्ष्मणके मरे राम न जी हैं यह जानिकै ॥ ५४ ॥ सब
भक्तनके शिरताज एई हैं इति भावार्थः ॥ ५५ ॥ विक्रमी ( उपायी ) भाग कहे
(भाग्य) वतुप्रत्ययांतः भोगादिपांचौं शब्द जानौ राजकाजमें वायुपुत्र पर इत्यादिकन
(वीरादिकन) को सबन वारि डारियत है अर्थ जो रामकाज वायुपुत्र सँवारचो
है सो इन वीरादिकनको काहूको सँवारचो न सँवरतो ॥ ५६ ॥ रामायण कहे
रामकथा ॥ ५७ ॥ ५८ ॥
मू०-सुन्दरीछंद ॥ पुष्पकतेउतरेरघुनायक ॥ यक्षपुरीपठये
सुखदायक ॥ सोदरकोअवलोकितपोथलु।भूलिरह्योकपिरिक्ष-
सकोदलु ॥ ५९ ॥ कंचनकोअतिशुद्धसिंहासन । रामरच्यो
त्यहिऊपरआसन ॥ कोपरहीरनकोअतिकोमल । तामहँकुंकु-
मचन्दनकोजल ॥६०॥ दोहा ॥ चरणकमलश्रीरामके, भरत
पखारेआप ॥ जातेगंगादिकनको, मिटतसकलसंताप ॥६१॥
पंकजवाटिकाछंद ॥ सूरजबचरणबिभीषणकेअति । आपुहिभ-
रतपखारिमहामति ॥ दुन्दुभिधुनिकरिकैबहुभेवनि । पुष्पबर-
षिहरषेदिविदेवनि ॥ ६२ ॥ दोहा ॥ पीछेदुरिशत्रुघ्नसुन, ल-
क्ष्मणधवायेपाइ ॥ चरणसौमित्रिपखारियो, अंगदादिकेआइ ॥
॥ ६३ ॥ तोमरछन्द ॥ शिरतेजटानिउतारि । अँगअंगराग
निधारि ॥ तनभूषिभूषणबस्त्र । कटिसोंकसेसबशस्त्र ॥ ६४॥
दोहा ॥ शिरतेपावनपादुका, लेकरिभरतबिचित्र ॥ चरणक-
मलतरहरिधरी, हँसिपहिरि जगमित्र ॥ ६५ ॥
टी०-यक्षपुरी कुबेरपुरी ॥ ५९ ॥ कोमल कहे चिकण ॥ ६० ॥ ६१ ॥ ६२ ॥
सौमित्रि शत्रुघ्न ॥ ६३ ॥ ६४ ॥ तरहरि कहे तरे ॥ ६५ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीराम
देवनशावैं । फूलनकीबरषाबरषावैं ॥ हीननिमेषसबैअवलो-
कैं । होडपरीबहुधादुहुँलोकैं ॥ ५ ॥
टी०-॥ १ ॥ २ ॥ ३ ॥ देवतनके प्रतिबिंब सम अवधवासी अवधवासिनके
प्रतिबिंब सम देवता मोद बढ़ावत हैं अर्थ जो आनंद क्रिया हास्यादि अवधबासी
करत हैं सोई देवता करत हैं ॥ ४ ॥ होड कहे वहस मानो अवधवासी वहस
करि देवता लोकको धूरि उडावत हैं औ देवता ता धूरिको फूलनकी अति वृष्टि
करि नशाइ देते हैं अर्थ दबाइ लेते हैं औ देवता तो अनिमेषही हैं औ रामचन्द्रके
दर्शनमें अवधवासिनहूकी पलक नहीं लागत सो मानों परस्पर होड किये हैं कि
देखिये धौ काकी पलक लागति हैं यामें ( असिद्ध विषय हेतूत्प्रेक्षा ) है ॥ ५ ॥
मू०-तारकछंद ॥ सिगरेदलऔधपुरीतबदेखी । अमराव-
तितेअतिसुन्दरलेखी ॥ चहुंओरबिराजतिदीरघखाई । शुभ
देवतरंगिनिसीफिरिआई ॥ ६ ॥ अतिदीरघकंचनकोटबिरा-
जैं । मणिलालकँगूरनकीरुचिराजैं ॥ पुरसुन्दरमध्यलसैछबि
छायो । परिवेषमनोरबिकोफिरिआयो ॥ ७ ॥ दोहा ॥ बिबि-
धपताकाशोभिजैं, ऊंचेकेशोदास ॥ दिविदेवनकेशोभिजैं,
मानहुँब्यजनबिलास ॥ ८ ॥ बिजयछंद ॥ चढ़ीप्रतिमंदिर
शोभबढ़ीतरुणीअवलोकनकोरघुनन्दनु । मनोगृहदीपतिदेह
धरेसुकिधौंगृहदेविबिमोहितिहैमनु ॥ किधौंकुलदेविविदियेअति
केशवकैपुरदेविनकोहुलस्योगनु । जहीं सोतहीँयहिभांतिलसैं
दिविदेविनकोमदघालतिहैमनु ॥ ९ ॥
टी०-देवतरंगिनी ( गंगा ) सम कह्यो तासों विमल जल युक्त जानो ॥ ६॥
रविसम अयोध्यापुरी है परिवेष सम कंचनकोट है ॥ ७ ॥ व्यजन ( पंखा ) ॥
॥ ८ ॥ अपनी सुन्दरतादि देखाइ देविनकी सुन्दरतादिको मद् दूरि करती हैं
अवधपुरीकी स्त्री देविनहूँसो अधिक सुंदरी हैं इति भावार्थः ॥ ९ ॥
मू०-दोहा ॥ अतिऊंचेमंदिरनपर, चढ़ीसुन्दरीसाधु ॥ दि-
विदेवनकोकरतिहैं, मनुआतिथ्यअगाधु ॥१०॥ तोटकछंद ॥
नरनारिभलीसुरनारिसबै । तिनकोऊपरैपहिंचानिअबै ॥
मिलिफूलनकीबरषैंबरषा । अरुगावतहैं जयकेकरषा ॥११॥
पद्मावतीछंद ॥ रघुनन्दनआयेलुनिसबधायेपुरजनजैसेतैसे॥
दर्शनरसभूलेतनमनफूलेबरणेजाहिनजैसे ॥ पतिकेसँगनारी-
सबसुखकारीरामहिंयोहगजोरी । जहँतहँचहुँओरनिमिलीझ-
कोरनिचाहतिचन्दचकोरी ॥ १२ ॥ पद्धटिकाछंद ॥ बहुभां-
तिरामप्रतिद्वारद्वार । अतिपूजतलोगसबैउदार ॥ यहिभांति-
गयेनृपनाथगेह । युतसुन्दरिसोदरस्योसनेह ॥ १३ ॥ दोहा॥
मिलेजायजननीनकों, जबहीश्रीरघुराइ ॥ करुणारसअद्भुत
भयोमौपैकह्योनजाइ ॥ १४ ॥ सीतासीतानाथजू, लक्ष्मण
सहितउदार । सबनमिलेसबके किये, भोजनएकहिबार ॥१५॥
टी०-अति सुंदर रूप आतिथ्यसम है ॥ १० ॥ यासों या जनायो कि जेती
दूरि देविनको विमान है तेतेई ऊंचे अवध बासिनके गृह हैं ॥ ११ ॥ १२ ॥
नृपनाथ (दशरथ) ॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥
मू०-सोरठा ॥ पुरजनलोगअपार, यहईसबजानतभये ॥
हमहींमिलेअगार, आयेप्रथमहमोरही ॥१६॥ मदनहराछंद ॥
सँगसीतालक्ष्मणश्रीरघुनन्दनमातनकेशुभपाइपरेसबदुःखह-
रे॥ आँसुनअन्हवायेभागनिआयेजीवनपायेअंकभरेअरुअंक-
धरे ॥ तेबदननिहारैंसरबसुवारैंदेहिंसबैसबहीनघनोअरुलेहिं-
घनो । तनमननसँभारैंयहैबिचारैंभागबडोयहहैअपनोकिधौं-
हैसपनो ॥ ॥ १७॥ स्वागताछन्द ॥ धामधामप्रतिहोति-
बधाई । लोकलोकतिनकीधुनिधाई ॥ देखिदेखिकपिअद्भुत-
लेखैं । जाहिंयत्रतित रामहिंदेखैं ॥ १८ ॥ दौरिदौरिकपिराव-
द्वाविंशप्रकाशः २२. (२२७)
रआवैं । बारबारप्रतिधामनिधावैं ॥ देखिदेखितिनकोदैतारी ।
भांतिभांतिबिबिहसैंपुरनारी ॥ १९ ॥
टी०-॥ १६ ॥ रामचन्द्रजू भागनसों आये तासों मातन जीवन समपाये सो
अंकमें भरे कहे अति प्रेमसो छातीमें लगाये फेरि अंक जो गोद है तामें धरे
कहे बैठारे तब आनंदअश्रुनसों सीता राम लक्ष्मणको अन्हवाये औ ते सबै कौश-
ल्यादि माता रामादिके वदन निहारती हैं औ तिनपर सर्वस्व वारि वारि सबको
अर्थ याचक नेगिनको देती हैं औ तिन याचकनसों आशीर्वाद करि घनो लेती
हैं पावती हैं अर्थ याचक आशीर्वाद देते हैं कि जो हमको तुम दियो ताको कोटि
गुणित तुम्हारे होय अथवा रामादिके वदन दर्शनहीसों घनो लेती हैं पावती हैं
अर्थ मुखदर्शन करि घनो पायो सम मानती हैं ॥ १७ ॥ १८ ॥ रावर (स्त्री
भवन) ॥ १९ ॥
मू०-श्रीराम-दोहा ॥ इनसुग्रीवबिभीषणै, अंगदअरुहनु-
मान ॥ सदाभरतशत्रुघ्नसम, माताजीमैं जान ॥ २० ॥ सुमि-
त्रा-सोरठा ॥ प्राणनाथरघुनाथ, जियकीजीवनमूरिहौं॥ लक्ष्म-
णहेतुमसाथ, क्षमियहुचूकपरीजोकछु ॥ २१ ॥ राम-दंडक ॥
पौरियाकहौं कि प्रतीहारकहौं किधौं प्रभुपुत्र कहौं मित्र किधौं मंत्री-
सुखदानिये । सुभटकहौं किशिष्यदासकहौं किधौं दूत केशोदा-
सहायकोहथ्यारउर आनिये । नैनकहौं किधौं तनमनकिधौं
तन त्राण बुद्धिकहौं किधौं बल बिक्रम बखानिये । देखिबेको-
एकहैं अनेक भांतिकीन्हीसेवा लक्ष्मणके मात कौन कौनगुणगा-
निये ॥ २२ ॥
टी०-॥ २० ॥ २१ ॥ पौरियाजो मुख्यद्वारकी रक्षामें रहते हैं प्रतीहार जो
राजसभाद्वारमें सुवर्णादिको दंडलै ठाढो रहत है बल जोर विक्रम यत्न ये सब
एक एक आपनो आपनो कार्य करि सुख देत हैं सो लक्ष्मण जहा जाको
काज लाग्यो है तहा ताही विधि तौन काज करि हमको परम सुख दीन्हो
है ॥ २२ ॥
( २२८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मू०-मोटनकछंद ॥ शत्रुघ्नबिलोकतरामकहें ॥ डेरानिस
जौजहँसुःखलहैं ॥ मेरेघरसंपतियुक्तसबै । सुग्रीवहिदेहुनिवास
अबै ॥ २३ ॥ साजेजोभरथसबैधनको। राखौतहँजाइबिभी-
षणको ॥ नैऋत्यनकोकपिलोगनको। राखौनिजधामनिभो-
गनको ॥ २४ ॥ दोहा ॥ एकएकनैऋत्यको, जितनेबानर-
लोग । आगेहीठाढेरहत, अमितइंद्रकेभोग ॥ २५ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिंद्रजि-
द्विरचितायांरामस्यायोध्यापुरप्रवेशोनामद्वाविंशः प्रकाशः ॥ २२ ॥
टी०-संपति ( अनेक भोग वस्तु ) ॥ २३ ॥ २४ ॥ अमित कहे
अप्रमाण ॥ २५ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्रसाद-
निर्मिताया रामभक्तिप्रकाशिकाया द्वाविशः प्रकाशः ॥ २२ ॥
मू०-दोहा ॥ या तेइसयेंप्रकाशमें ऋषिजनआगमलेषि ॥
राज्यश्रीनिंदाकही, श्रीमुखरामविशेषि ॥ १ ॥ मल्लिकाछंद॥
एककालरामदेव । सोधुबंधुकरतसेव ॥ शोभिजैसैबैसोऔर ।
मंत्रिमित्रठौरठौर ॥ २ ॥ बानरेशयूथनाथ । लंकनाथबंधु-
साथ ॥ शोभिजैसैबैसमीप । देशदेशकेंमहीप ॥ ३ ॥ दोहा ॥
सरसस्वरूपबिलोकिकै, उपजीमदनहिंलाज ॥ आइगयेताही
समय, केशवऋषिऋषिराज ॥ ४ ॥ असितअत्रिभृगुअं-
गिरा, कश्यपकेशव व्यास॥ विश्वामित्रअगस्त्ययुत, बालमी-
किदुर्बास ॥ ५ ॥
टी०-॥ १ ॥ २ ॥ बानरेश [ सुग्रीव ] यूथनाथ [ अंगदादि ] लंकनाथ जे बंधु
बिभीषण अथवा बंधु जे जातिवर्ग हैं राक्षस गण इति ते हैं साथ जिनके ऐसे लंकनाथ
जे बिभीषण हैं ते ॥ ३ ॥ सरस कहे आपनासों अधिक सुन्दर ॥ ४ ॥ ५ ॥
त्रयोविंशप्रकाशः २३. ( २२९ )
मू०-दोहा-वामदेवमुनिकण्ण्वश्रुत, भरद्वाजमतिनिष्ठ । पर्व-
तादिहै सकलमुनि, आयेसहितवशिष्ट ॥ ६ ॥ नगस्वरूपिणी
छंद ॥ सबंधुरामचंद्रजूउठेविलोकि कै तबै । सभासमेतिपाँपरे-
विशेषिपूजियोसबै ॥ विवेकसोंअनेकधादशेअनूपआसने ।
अनर्घअर्थआदिदैविनैकियेघनेघने ॥ ७ ॥ राम-रूपमाला-
छंद ॥ रावरेमुखकेविलोकतहीभयेदुखदूरि । सुप्रलापनहींरहे
उरमध्यआनँदपूरि ॥ देहपावनहैगयोपदपद्मकोपयपाइ । पूज
तैभयोवंशपूजितआशुहीमुनिराइ ॥ ८ ॥ संनिधानभरेतपोध-
नधामधीधनधर्म । अद्यसद्यसबैभयेनिरवद्यबासरकर्म ॥ ईश-
यद्यपिदृष्टिहीभइभूरिमंगलसृष्टि । पूँछिबेकहँहोतिहैसोतथापि-
वाकविसृष्टि ॥ ९ ॥
टी०-निष्ठ कहे उत्कृष्ट है मति जिनकी ॥ "निष्ठोत्कर्षव्यवस्थयोरिति अभि-
धानचिंतामणिः" ॥ ६ ॥ विवेक (विचार) सों अर्थ यथोचित अनर्घ कहे
अमोल अर्घ पाद्यादि पूजाविधि प्रसिद्ध है ॥ "अर्घः पूजाविधौ मूल्ये इत्यभिधान-
चिंतामणिः" ॥ ७ ॥ द्वै छंदको अन्वय एक है तपोधन ! ऋषिनको संबोधन है
सुप्रलाप कहे सुवचन ॥ "सुप्रलापः सुवचनमित्यमरः॥" पदपद्मको पय कहे चर-
णोदक रावरे पदको संबंध सुप्रलापादिकमों सर्वत्र है संनिधान कहे समीपसों
अर्थ रावरे निकट प्राप्त भये सो हमरे धाम (घर) औ धी (बुद्धि) धन औ
धर्मसों भरे अर्थ धाम धनसों भरे, बुद्धि धर्ममों भरी, अद्य कहे आज सद्य कहे
शीघ्रही सबै जे बासर कर्म कहे रोज रोजके दानकर्म हैं निरवद्य कहे अनिंद्य
भये औ हे ईश ! यद्यपि तुम्हारी दृष्टिहीसों अवलोकनहीं सों हमपर भूरि कहे
बहुत मंगल कहे कल्याणकी दृष्टि भई अर्थ हमारो बडो कल्याण भयो परंतु
कल्याणमें तो काहूकी तृप्ति होति नहीं तामों अधिक कल्याणके लिये तुमसों कछू
पूछिबेको हमारे वाक जे वचन हैं तिनकी विसृष्टि कहे उत्पत्ति होति॥ ८॥ ९॥
मू०-॥ दोहा ॥ गंगासागरसोंबड़ो, साधुनकोसतसंग ॥
पावनकरिउपदेशअति, अद्भुतकरतअभंग ॥ १० ॥
टी०-साधुनको जो सतसंग है सो गंगासागरहूसों बडो है काहेते अति अद्भुत
( २३० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
जो उपदेश शिक्षा है तासों पावन कहे पवित्र करिकै अभंग कहे नाशरहितके अर्थ
मुक्त करत है अथवा उपदेशसों अति पावन करि अद्भुत अभंग कहे मुक्त करतहै
अर्थ जीवन्मुक्त करत है उपदेश करि अभंगकरिबेकी शक्ति गंगासागरमों नहीं
है तासों बडो कह्यो एतो रामचंद्रके कहतही विरक्त वचन समुझि अगस्त्य बीच-
हीमें बोलि उठे तासों जो पूछिबो रहै सो नहीं पूछन पाये सो चौबीसयें प्रका-
शमें कह्यौ है कि जो कछु जीव उधारनको मत जानत हौ तौ कहौ मनुहै कहिबेको
हेतु यह कि हमको कछू ऐसो उपदेश करौ जासों संसार छूटै मुक्ति होइ ॥१०॥
मू०-अगस्त्य-नाराचछंद ॥ कियेबिशेषसोंअशेषकाजदे-
वरायके । सदात्रिलोकलोकनाथधर्मविप्रगायके ॥ अनादिसि-
द्धिराजसिद्धिराजआजलीजई ॥ नृदेवतानिदेवतानिदीहसुख
दीजई ॥ ११ ॥
टी०-हे त्रिलोक लोकनाथ ! अर्थ तीनों लोकोंके जे लोक कहे जन हैं तिनके
नाथ कहे स्वामी हौ अर्थ ईश्वर हौ यासों या जनायो कि तुम्हारो बंधन कौन है
जासों छूटिबेकी इच्छा करत हौ रावणको मारिदेवराज जे इन्द्र हैं औ धर्म औ
विप्र औ गाय इनके अशेष कहे पूर्ण काज करचौ अब अपनी अनादि सिद्धि अर्थ
तुम्हारी परंपराकी सिद्धि है औ राजसिद्धि कहे राजनकी सिद्धि जो राजाति है
ताहि लीजै नृदेवता ( राजा ) ॥ ११ ॥
मू०-दोहा ॥ मारेअरिपारोहितू, कौनहेतरघुनंद ॥ निरानंद-
सेदेखियत, यद्यपिपरमानंद ॥ १२ ॥ श्रीराम-तोमरछंद ॥
सुनिज्ञानमानसहंस । जपयोगजागप्रशंस ॥ जगमांझहैदुख-
जाल । सुखहैकहायहिकाल ॥ १३ ॥ तहँराजहैदुखमूल । सब-
पापको अनुकूल ॥ अबताहिलैऋषिराय । कहेकौननर्कहिजाय
॥१४॥ चौपाई ॥ सोदरमंत्रिनकेजेचरित्र । इनकेहमपैसुनिमख-
मित्र ॥ इनहींलगेराजकेकाज । इनहींतेसबहोतअकाज॥ १५॥
टी०-एक तौ तुम परमानंद रूपही हौ ताहूपर अरि ( रावणादि ) को मारे
औ हितू ( इन्द्रादि ) को पालत भये ऐसे आनंदवर्द्धक काजऊ करे तहूपर तुम्है
त्रयोविंशप्रकाशः २३. (२३१)
निरानंदसे काहे देखियत है इत्यर्थः ज्ञानरूपी जो मानस (मानसर) है ताके
हंस हौ औ जगमें योग औ जागकी है प्रशंसा (स्तुति) जिनकी दूनौ पद
संबोधन हैं ॥ १२ ॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥
मू०-राजभारनलभैयनिदयो । छलबलछीनिसबैतिनल-
यो ॥ जबलीन्होंसबराजबिचारि । नलदमयंतीदियोनिकारि॥
॥ १६ ॥ राजासुरथराजकीगाथ । सौंपिसबमंत्रिनकेहाथ ॥
संततमृगयालीनबिचारि । मंत्रिनराजादियोनिकारि ॥ १७॥
राजश्रीअतिचंचलतात । ताहूकीसुनिलौजैबात ॥ यौबनअरु
अबिबेकीरंग । बिनस्यौकौनराजश्रीसंग ॥ १८ ॥ शास्त्रसुज-
लँहूधोवततात । मलिनहोतअतिताकेगात ॥ यद्यपिहैअति-
उज्ज्वलदृष्टि । तदपिसृजतिरागनकीसृष्टि ॥ १९ ॥
टी०-नलकी कथा पुराणमों प्रसिद्ध है ॥ १६ ॥ मृगया (शिकार) सुरथ-
हूकी कथा मार्कण्डेयपुराणमों प्रसिद्ध है ॥ १७ ॥ अति चंचल जो राजश्री है
ताहूमें ऐसो दोष है ते सुनौ कहियत है यौबन औ अबिवेकी रंग औ राजश्रीके
संगमें को नहीं बिनस्यौ ए तीनों सम हैं अथवा यौबन औ अबिवेकी रंगयुक्त
जो राजश्री है अर्थ सदा यौबन औ अबिवेकसों युक्त रहति है ताके संगको नहीं
बिनस्यौ अथवा हितोपदेशमें कह्यो है कि ॥ "यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् ॥" यामें चारि कह्यौ है ता मतसों यह अर्थ-
कि यौवन अबिवेकी रंग औ राज औ श्री कहे संपत्ति इन चारिके संगमें को
नहीं बिनस्यौ ॥ १८ ॥ शास्त्रका उपदेश सुनिकै शास्त्रकी आज्ञा माफिक नहीं
करत और तासों मलिन उदास होत है अथवा अनेक शास्त्र सुनाबो ताहूपर पात-
कन करि ताके गात मलिन होत हैं शास्त्रहू सुनिकै अनेक पातक करत ही है
इत्यर्थः औ यद्यपि याकी उज्ज्वल (विमल) दृष्टि है अर्थ उत्तम पदार्थनपर
दृष्टि है तौ अति उत्तम जो पदार्थ (ईश्वरपद) है तामें प्रीति बारेसों नहीं करति
राग जो स्रक, चंदन, वनितादि बिषे अभिलाष है ताको सृजति कहे उत्पन्न
करति है "अभिमतविषयाभिलाषो रागः" ॥ १९ ॥
मू०-महापुरुषसोंजाकीप्रीति । हरतिसोज़ंझामारुतरीति ॥
बिषयमरीचिकानिकीज्योति ॥ इंद्रीहरिणहारिणीहोंति॥२०॥
( २३२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
गुरुकेबचनअमलअनुकूल । सुनतहोतश्रवणनकोशूल॥ मैन
बलितनवबसनसुदेश । भिदतनहींजलज्योंउपदेश ॥ २१ ॥
टी०-जा पुरुषकी प्रीति महापुरुष जे भगवान हैं तिनसों है ताके पास आइ
झंझामारुत कहे अति जोर वायुकी रीतिसों हरति कहे तोरति है अर्थ जैसे
झंझामारुत वृक्ष लतानिकां तोरति है तैसे यह प्रीतिको तोरति है आशय यह
कि आपु विष्णुकी स्त्री हैं तासों प्रीतिरूपी स्त्रीको विष्णुके पास जाति देखि
सौतिधर्मसों तोरति है अर्थ राजनकी प्रीति ईश्वर पर नहीं होति रूप, रस,
गंध, स्पर्श, शब्द, ये जे पांचौं विषयरूपी मरीचिका कहे मृगतृष्णा हैं तिनकी
ज्योतिमें इंद्रीरूपी जे हरिण हैं तिनकी हारिणी कहे लैजानहारी होति है अर्थ
मृगतृष्णा सम मिथ्या जो पंचधा विषय हैं तामें राजनकी इंद्रिनको भ्रमावति
है ॥ २० ॥ मैन कहे (मोम) ॥ २१ ॥
मू०-मित्रनहूकोमतोनलेति । प्रतिशब्दकज्योंउत्तरदेति ॥
पहिलेसुनैनशोरसुनंति । मातीकरनीज्योंनगनंति ॥ २२ ॥
दोहा ॥ धर्मवीरताबिनयता, सत्यशीलआचार । राजश्रीनग-
नैकछू, वेदपुराणबिचार ॥ २३ ॥ चौपाई ॥ सागरमेंबहुका-
लजोरही । सीतवक्रताशशितेलही ॥ सूरतुरंगचरणनिते-
तात । सीखीचंचलताकीबात ॥ २४ ॥ कालकूटतेमोहनरी-
ति । मणिगणतेअतिनिष्ठुरप्रीति ॥ मदिरातेमादकतालई ।
मंदरउदरभईभ्रममई ॥ २५ ॥
टी०-प्रति शब्दक कहे झांई शब्द अर्थ जैसे शब्दके साथही प्रति शब्दक होत
है तैसे राजा मित्रके वाक्यमें शुभाशुभको विचार नहीं करत साथही उत्तर
कहे जवाब देत हैं औ पहिले तौ हित वाक्यको सुनति नहीं शोर करि कहै सो
सुनिबो करत है तौ माती करिनी सम गनति नहीं अर्थ जैसे माती करिनी
महावतके हितकें हित बचन नहीं गनति तैसे राज्यश्री मित्रादिके हित बचन
नहीं गनति ॥ २२ ॥ २३ ॥ क्षीरसागरमें बहुत काल रही है तहाँ इनको संग
रह्यौ तिनसों ए कर्म सीखे हैं शीतता कहे प्रसन्न है सेवकादिको धनादि दीबो
त्रयोविंशप्रकाशः २३. ( २३३ )
वक्रता कुद्ध द्वै बंधादि करिवो सुरतुरंग (उच्चैःश्रवा) चंचलताकी वात कहे
क्षणमें और क्षणमें और कहिवो ( करिवो) ॥ २४ ॥ जैसे कालकूट भक्षणसों
मोहित (मूर्छित) भये प्राणीको कछु सुधि नहीं रहति है तैसे राज्यश्रीमें मोहित
राजनको ईश्वरादिकी सुधि भूलि जाति है इत्यर्थः निष्ठुरतावश गजनको जीव
वधादिमें कछू दया नहीं आवति इत्यर्थः राज्यश्रीके वश मत्त द्वै गजा हित
वस्तुको विचार नहीं करत इत्यर्थः औ विष्णु करिकै भ्रमायो जो मंदर है
ताके संगसों राज्यश्रीके उदरमें भ्रममई कहे भ्रमाधिक्य मई अर्थ मंदरको भ्रमत
देखिकै भ्रम सिख्यौ राजनके उरमें सदा बंधुमंत्र्यादिकनहूकी प्रतिकुलताको
भ्रम रहत है इत्यर्थः ॥ २५ ॥
मू०-दोहा ॥ शेषदईबहुजिह्वता, बहुलोचनताचारु ॥
अपसरानितैंसिखियो, अपरपुरुषसंचारु ॥ २६ ॥ चौपाई ॥
दृढगुनबाँधेहूबहुभाँति। कोजानैकेहिभांतिबिलाति ॥ गजघो-
टकभटकोटिनअरैं । खङ्गलतापंजरहूपरैं ॥ २७ ॥ अपनाइ-
तिकीन्हेबहुभाँति । कोजानेकितहैभजिजाति ॥ धर्मकोसमं-
डित शुभदेश । तजतिभ्रमरिज्योंकमलनरेश ॥ २८ ॥
टी०-बहु जिह्वता कहे एक जिह्वासों अनेक जिह्वासम वात कहि बहुलो-
चनता कहे द्वै लोचनसों अनेक लोचनसम देखिवो अर्थ राजा चितवत कहा
होत हैं औ चार दृष्टिसों सर्वत्र देखत हैं अपर कहे अन्य पुरुष प्रीति संचार
अर्थ एक पुरुष राजाको छोड़ि एक पास जाइवो ॥ २६ ॥ द्वै छन्दनको अन्वय
एक है गुन पद श्लेष है शूरतादि औ डोरी गज औ घोटक ( घोडं ) औ भट
कोटिन रक्षाके अर्थ अरैं कहे हठ करें औ तिनकी खङ्ग (तरवारि) रूपी जो
लता हैं ताके पंजरहूमैं परैं अर्थ तरवारि हाथमें लैके अनेक गजादि चौकी दै
रक्षा करें ताहूपर और अनेकविधि अपनाइति कीन्हेहूं अर्थ प्रीति कीन्हें हूं धर्म
(राजधर्म) औ कोमलताकी सब जाना औ सिफा (कंद) तासों मंडित (युक्त)
औ शुभदेश कहे सुन्दर है राज्यभूमि जाकी औ सुष्ठु है देश (उत्पत्ति स्थान)
जाको औ कमलरूपी जो नरेश राजा है ताको तजति है औ को जानै कहां है
भागि जाति है सुंदरतादिहूके वश नहीं होति इति भावार्थः ॥ २७ ॥ २८ ॥
( २३४ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
मू०-यद्यपिहोइशुद्धमतिसत्तु । फिरैपिशाचीज्यौंउनमत्तु ॥
गुनवंतनिआलिंगतिनहीं । अपवित्रनिज्योंछांडतितहीं॥२९॥
शूरनिनाशतिज्योंअहिदेखि । कंटकज्योंबहुसाधुनलेखि ॥
सुधासोदरायद्यपिआप । सबहीतेअतिकटकप्रताप ॥ ३० ॥
यद्यपिपुरुषोत्तमकीनारि । तदपिसकलखलजनअनुहारि ॥
हित कारिनकीअतिद्वेषिनी । अहितलोगकोअन्वैषिनी
॥ ३१॥ मनमृगकोसुबधिककीगीति । विषयबेलिकीबारि-
दरीति ॥ मदपिशाचिकाकीसीअली । मोहनींदकीशय्या-
भली ॥ ३२ ॥
टी०-सत्तु ( प्राणी ) अथ राजासों राज्यश्री युक्त द्वै पिशाचाक्रांत पुरुष-
सम उन्मत्त फिरत हैं गुणवंतन कहे विद्यादि अनेक गुणको अपवित्र सम त्याग
करति है इत्यर्थः ॥ "पंडिते निर्द्धनत्वमित्युक्तं माधवानलनाटके” ॥ २९ ॥
नाशति कहे छोडति है शूर औ साधुनको राज्यश्री नहीं प्राप्त होति अथवा शूर
औ साधुनको संग्रह राजा नहीं करते इत्यर्थः सुधा जो अमृत है ताकी सोदरा
( बहिन ) ॥ ३० ॥ पुरुषोत्तम (विष्णु) द्वेषिणी कहे शत्रु है अन्वेषिणी कहे
ढूंढनहारी है ॥ ३१ ॥ बधिकसम मनरूपी मृगको बांधि लेति है कहे काबू करि
लेति है इत्यर्थः ॥ औ बारिद कहे मेघसम विषयरूपी बेलिको हरित करति है
इत्यर्थः मद्रूपी जो पिशाचिका (प्रेतिन) है ताकी अली कहे सखी है अर्थ
सहायक है पठावनहारी इति मोह कहे अज्ञानरूपी जो नींद है ताकी शय्या
जैसे शय्यामें नींद बढति है तैसे राज्यमें मोह बढ़त है इत्यर्थः ॥ ३२ ॥
मू०-आशीबिषदोषनकीदरी । गुणसतपुरुषनकारणछरी ॥
कलहंसनकीमेघावली । कपटनृत्यकारीकीथली ॥ ३३ ॥
दोहा ॥ बामकामकरिकीकिधौं, कोमलकदलिसुवेष । धीरधर्म-
द्विजराजको, मनोराहुकीरेष ॥ ३४ ॥ चौपाई ॥ मुखरोगी
ज्योंमौनेरहै । बात बलायएकद्वैकहै ॥ बंधुबर्गपहिचानैनहीं ।
मानोसन्निपातहैगही ॥ ३५ ॥