रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशप्रकाशः २३. ( २३३ )
वक्रता कुद्ध द्वै बंधादि करिवो सुरतुरंग (उच्चैःश्रवा) चंचलताकी वात कहे
क्षणमें और क्षणमें और कहिवो ( करिवो) ॥ २४ ॥ जैसे कालकूट भक्षणसों
मोहित (मूर्छित) भये प्राणीको कछु सुधि नहीं रहति है तैसे राज्यश्रीमें मोहित
राजनको ईश्वरादिकी सुधि भूलि जाति है इत्यर्थः निष्ठुरतावश गजनको जीव
वधादिमें कछू दया नहीं आवति इत्यर्थः राज्यश्रीके वश मत्त द्वै गजा हित
वस्तुको विचार नहीं करत इत्यर्थः औ विष्णु करिकै भ्रमायो जो मंदर है
ताके संगसों राज्यश्रीके उदरमें भ्रममई कहे भ्रमाधिक्य मई अर्थ मंदरको भ्रमत
देखिकै भ्रम सिख्यौ राजनके उरमें सदा बंधुमंत्र्यादिकनहूकी प्रतिकुलताको
भ्रम रहत है इत्यर्थः ॥ २५ ॥
मू०-दोहा ॥ शेषदईबहुजिह्वता, बहुलोचनताचारु ॥
अपसरानितैंसिखियो, अपरपुरुषसंचारु ॥ २६ ॥ चौपाई ॥
दृढगुनबाँधेहूबहुभाँति। कोजानैकेहिभांतिबिलाति ॥ गजघो-
टकभटकोटिनअरैं । खङ्गलतापंजरहूपरैं ॥ २७ ॥ अपनाइ-
तिकीन्हेबहुभाँति । कोजानेकितहैभजिजाति ॥ धर्मकोसमं-
डित शुभदेश । तजतिभ्रमरिज्योंकमलनरेश ॥ २८ ॥
टी०-बहु जिह्वता कहे एक जिह्वासों अनेक जिह्वासम वात कहि बहुलो-
चनता कहे द्वै लोचनसों अनेक लोचनसम देखिवो अर्थ राजा चितवत कहा
होत हैं औ चार दृष्टिसों सर्वत्र देखत हैं अपर कहे अन्य पुरुष प्रीति संचार
अर्थ एक पुरुष राजाको छोड़ि एक पास जाइवो ॥ २६ ॥ द्वै छन्दनको अन्वय
एक है गुन पद श्लेष है शूरतादि औ डोरी गज औ घोटक ( घोडं ) औ भट
कोटिन रक्षाके अर्थ अरैं कहे हठ करें औ तिनकी खङ्ग (तरवारि) रूपी जो
लता हैं ताके पंजरहूमैं परैं अर्थ तरवारि हाथमें लैके अनेक गजादि चौकी दै
रक्षा करें ताहूपर और अनेकविधि अपनाइति कीन्हेहूं अर्थ प्रीति कीन्हें हूं धर्म
(राजधर्म) औ कोमलताकी सब जाना औ सिफा (कंद) तासों मंडित (युक्त)
औ शुभदेश कहे सुन्दर है राज्यभूमि जाकी औ सुष्ठु है देश (उत्पत्ति स्थान)
जाको औ कमलरूपी जो नरेश राजा है ताको तजति है औ को जानै कहां है
भागि जाति है सुंदरतादिहूके वश नहीं होति इति भावार्थः ॥ २७ ॥ २८ ॥