रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनतोपि वा ॥ अपि गोचर्ममात्रेण भूमिदानेन शुध्यति ॥१८॥
सप्तहस्तेनदंडेनत्रिंशद्दंडैर्निवर्तनम् । दश तान्येव गोचर्म दत्त्वा
स्वर्ग महीयते ॥ १९॥ अन्यायेन कृता भूमियैर्नरैरपहारिता।
हरंतो हारयंतश्च हन्यते सप्तमं कुलम् ॥ २० ॥ राम-दोहा ॥
कौनहिदीजैदानुभुव, हैंऋषिराजअनेक ॥ देहुसनाढ्यनआदि
दै, आयेसहितविवेक ॥ २१ ॥ श्रीराम--उपेंद्रवज्राछन्द ॥ कहौ
'भरद्वाजसनाढ्यकों हैं। भयेकहांतेंसबमद्ध्यसोहैं ॥ हुतेसबैबि-
प्रप्रभावभीने । तजेतेक्योँयेअतिपूज्यकीने ॥ २२ ॥
टी०-मारणोच्चाटनादिके लिये जो दान है सो धर्मविरुद्ध जानौ अथवा वेश्या-
दिके अर्थ दान ॥ १५ ॥ सबके मीमांसकादिकनके मत कहे सम्मत अर्थ
सम्मत फलको लीजै कहे पाइयत है अर्थ मीमांसकादिकनको मत है कि यज्ञा-
दिसों ऐहिक पारलौकिक फल होत है सो सब फल दाननहीसों पाइयत है तासों
सबको यज्ञादिकनको छोडिकै दिनप्रति दानहीको दीजै ॥ १६ ॥ १७ ॥ यत्कहे
जो ज्ञानतः कहे जानिकै अज्ञानतः कहे विनजाने कोऊ प्राणी किंचित्कह कछु
पापं कहे पाप जो है ताहि कुरुते कहे करत हैं, सो प्राणी गोचर्ममात्रेण भूमि-
दानेन कहे गोचर्ममात्र भूमिदान करत संते शुद्ध होत है अपि शब्दको अर्थ यह
कि अधिक भूमिदान करै तासों तौ शुद्ध यामें गोचर्मको लक्षण कहत हैं ॥१८॥
सप्तहस्तेन दंडेन कहे सात हाथके दंडकरिके त्रिंशद्दंडैः कहे तीसदंड करत संतेनिवर्तन
संज्ञक भूमिक्षेत्र होत है हस्तप्रमाण दुइसैदश औ दश तान्येव कहे तेई निवर्त्तनहीं
एक गोचर्म संज्ञक क्षेत्र होत है हस्तप्रमाण इक्कीससै २१०० सो गोचर्म प्रमाणहूं
भूमिको दत्त्वा कहे दैके स्वर्गे कहे स्वर्गको महीयते कहे जात है ॥ १९ ॥ यैर्नरैः
कहे जिन नरन करिकै अन्यायेन कहे न्याय बिनाही भूमिहृता कहे हरि गई औ जिन
नरन करिकै अपहारिता कहे हराई गई ता भूमिकरिकै हरंतःकहे हरनहार औ हारयंतः
[ हरावनहार ] ते हन्यते कहे पीडाको प्राप्त होत हैं अर्थ सो भूमि तिनको पीडा
करती है औ “तेषां सप्तमं कुलमपि हन्यते” अर्थ ताही भूमि करिकै तिनके
सातपुस्त पर्यंत पितर पीडाको प्राप्त होत हैं अर्थ जे दानकी भूमिको निर्दोष
छोरत हैं औ वृथापवाद कहि छोरावतहैं सो भूमि तिनको औ तिन दुहुनके सप्तपुस्त
पर्यंत पितरनको पितृलोकमें पीडा करति है ॥ २० ॥ ऋषि कह्यो सनाढ्यनको