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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 238, कुल 269 में से

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पृष्ठ 238

( २३२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
गुरुकेबचनअमलअनुकूल । सुनतहोतश्रवणनकोशूल॥ मैन
बलितनवबसनसुदेश । भिदतनहींजलज्योंउपदेश ॥ २१ ॥
टी०-जा पुरुषकी प्रीति महापुरुष जे भगवान हैं तिनसों है ताके पास आइ
झंझामारुत कहे अति जोर वायुकी रीतिसों हरति कहे तोरति है अर्थ जैसे
झंझामारुत वृक्ष लतानिकां तोरति है तैसे यह प्रीतिको तोरति है आशय यह
कि आपु विष्णुकी स्त्री हैं तासों प्रीतिरूपी स्त्रीको विष्णुके पास जाति देखि
सौतिधर्मसों तोरति है अर्थ राजनकी प्रीति ईश्वर पर नहीं होति रूप, रस,
गंध, स्पर्श, शब्द, ये जे पांचौं विषयरूपी मरीचिका कहे मृगतृष्णा हैं तिनकी
ज्योतिमें इंद्रीरूपी जे हरिण हैं तिनकी हारिणी कहे लैजानहारी होति है अर्थ
मृगतृष्णा सम मिथ्या जो पंचधा विषय हैं तामें राजनकी इंद्रिनको भ्रमावति
है ॥ २० ॥ मैन कहे (मोम) ॥ २१ ॥
मू०-मित्रनहूकोमतोनलेति । प्रतिशब्दकज्योंउत्तरदेति ॥
पहिलेसुनैनशोरसुनंति । मातीकरनीज्योंनगनंति ॥ २२ ॥
दोहा ॥ धर्मवीरताबिनयता, सत्यशीलआचार । राजश्रीनग-
नैकछू, वेदपुराणबिचार ॥ २३ ॥ चौपाई ॥ सागरमेंबहुका-
लजोरही । सीतवक्रताशशितेलही ॥ सूरतुरंगचरणनिते-
तात । सीखीचंचलताकीबात ॥ २४ ॥ कालकूटतेमोहनरी-
ति । मणिगणतेअतिनिष्ठुरप्रीति ॥ मदिरातेमादकतालई ।
मंदरउदरभईभ्रममई ॥ २५ ॥
टी०-प्रति शब्दक कहे झांई शब्द अर्थ जैसे शब्दके साथही प्रति शब्दक होत
है तैसे राजा मित्रके वाक्यमें शुभाशुभको विचार नहीं करत साथही उत्तर
कहे जवाब देत हैं औ पहिले तौ हित वाक्यको सुनति नहीं शोर करि कहै सो
सुनिबो करत है तौ माती करिनी सम गनति नहीं अर्थ जैसे माती करिनी
महावतके हितकें हित बचन नहीं गनति तैसे राज्यश्री मित्रादिके हित बचन
नहीं गनति ॥ २२ ॥ २३ ॥ क्षीरसागरमें बहुत काल रही है तहाँ इनको संग
रह्यौ तिनसों ए कर्म सीखे हैं शीतता कहे प्रसन्न है सेवकादिको धनादि दीबो