रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
जो उपदेश शिक्षा है तासों पावन कहे पवित्र करिकै अभंग कहे नाशरहितके अर्थ
मुक्त करत है अथवा उपदेशसों अति पावन करि अद्भुत अभंग कहे मुक्त करतहै
अर्थ जीवन्मुक्त करत है उपदेश करि अभंगकरिबेकी शक्ति गंगासागरमों नहीं
है तासों बडो कह्यो एतो रामचंद्रके कहतही विरक्त वचन समुझि अगस्त्य बीच-
हीमें बोलि उठे तासों जो पूछिबो रहै सो नहीं पूछन पाये सो चौबीसयें प्रका-
शमें कह्यौ है कि जो कछु जीव उधारनको मत जानत हौ तौ कहौ मनुहै कहिबेको
हेतु यह कि हमको कछू ऐसो उपदेश करौ जासों संसार छूटै मुक्ति होइ ॥१०॥
मू०-अगस्त्य-नाराचछंद ॥ कियेबिशेषसोंअशेषकाजदे-
वरायके । सदात्रिलोकलोकनाथधर्मविप्रगायके ॥ अनादिसि-
द्धिराजसिद्धिराजआजलीजई ॥ नृदेवतानिदेवतानिदीहसुख
दीजई ॥ ११ ॥
टी०-हे त्रिलोक लोकनाथ ! अर्थ तीनों लोकोंके जे लोक कहे जन हैं तिनके
नाथ कहे स्वामी हौ अर्थ ईश्वर हौ यासों या जनायो कि तुम्हारो बंधन कौन है
जासों छूटिबेकी इच्छा करत हौ रावणको मारिदेवराज जे इन्द्र हैं औ धर्म औ
विप्र औ गाय इनके अशेष कहे पूर्ण काज करचौ अब अपनी अनादि सिद्धि अर्थ
तुम्हारी परंपराकी सिद्धि है औ राजसिद्धि कहे राजनकी सिद्धि जो राजाति है
ताहि लीजै नृदेवता ( राजा ) ॥ ११ ॥
मू०-दोहा ॥ मारेअरिपारोहितू, कौनहेतरघुनंद ॥ निरानंद-
सेदेखियत, यद्यपिपरमानंद ॥ १२ ॥ श्रीराम-तोमरछंद ॥
सुनिज्ञानमानसहंस । जपयोगजागप्रशंस ॥ जगमांझहैदुख-
जाल । सुखहैकहायहिकाल ॥ १३ ॥ तहँराजहैदुखमूल । सब-
पापको अनुकूल ॥ अबताहिलैऋषिराय । कहेकौननर्कहिजाय
॥१४॥ चौपाई ॥ सोदरमंत्रिनकेजेचरित्र । इनकेहमपैसुनिमख-
मित्र ॥ इनहींलगेराजकेकाज । इनहींतेसबहोतअकाज॥ १५॥
टी०-एक तौ तुम परमानंद रूपही हौ ताहूपर अरि ( रावणादि ) को मारे
औ हितू ( इन्द्रादि ) को पालत भये ऐसे आनंदवर्द्धक काजऊ करे तहूपर तुम्है