रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 231, कुल 269 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेवनशावैं । फूलनकीबरषाबरषावैं ॥ हीननिमेषसबैअवलो-
कैं । होडपरीबहुधादुहुँलोकैं ॥ ५ ॥
टी०-॥ १ ॥ २ ॥ ३ ॥ देवतनके प्रतिबिंब सम अवधवासी अवधवासिनके
प्रतिबिंब सम देवता मोद बढ़ावत हैं अर्थ जो आनंद क्रिया हास्यादि अवधबासी
करत हैं सोई देवता करत हैं ॥ ४ ॥ होड कहे वहस मानो अवधवासी वहस
करि देवता लोकको धूरि उडावत हैं औ देवता ता धूरिको फूलनकी अति वृष्टि
करि नशाइ देते हैं अर्थ दबाइ लेते हैं औ देवता तो अनिमेषही हैं औ रामचन्द्रके
दर्शनमें अवधवासिनहूकी पलक नहीं लागत सो मानों परस्पर होड किये हैं कि
देखिये धौ काकी पलक लागति हैं यामें ( असिद्ध विषय हेतूत्प्रेक्षा ) है ॥ ५ ॥
मू०-तारकछंद ॥ सिगरेदलऔधपुरीतबदेखी । अमराव-
तितेअतिसुन्दरलेखी ॥ चहुंओरबिराजतिदीरघखाई । शुभ
देवतरंगिनिसीफिरिआई ॥ ६ ॥ अतिदीरघकंचनकोटबिरा-
जैं । मणिलालकँगूरनकीरुचिराजैं ॥ पुरसुन्दरमध्यलसैछबि
छायो । परिवेषमनोरबिकोफिरिआयो ॥ ७ ॥ दोहा ॥ बिबि-
धपताकाशोभिजैं, ऊंचेकेशोदास ॥ दिविदेवनकेशोभिजैं,
मानहुँब्यजनबिलास ॥ ८ ॥ बिजयछंद ॥ चढ़ीप्रतिमंदिर
शोभबढ़ीतरुणीअवलोकनकोरघुनन्दनु । मनोगृहदीपतिदेह
धरेसुकिधौंगृहदेविबिमोहितिहैमनु ॥ किधौंकुलदेविविदियेअति
केशवकैपुरदेविनकोहुलस्योगनु । जहीं सोतहीँयहिभांतिलसैं
दिविदेविनकोमदघालतिहैमनु ॥ ९ ॥
टी०-देवतरंगिनी ( गंगा ) सम कह्यो तासों विमल जल युक्त जानो ॥ ६॥
रविसम अयोध्यापुरी है परिवेष सम कंचनकोट है ॥ ७ ॥ व्यजन ( पंखा ) ॥
॥ ८ ॥ अपनी सुन्दरतादि देखाइ देविनकी सुन्दरतादिको मद् दूरि करती हैं
अवधपुरीकी स्त्री देविनहूँसो अधिक सुंदरी हैं इति भावार्थः ॥ ९ ॥
मू०-दोहा ॥ अतिऊंचेमंदिरनपर, चढ़ीसुन्दरीसाधु ॥ दि-
विदेवनकोकरतिहैं, मनुआतिथ्यअगाधु ॥१०॥ तोटकछंद ॥