रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशप्रकाशः २३. (२३१)
निरानंदसे काहे देखियत है इत्यर्थः ज्ञानरूपी जो मानस (मानसर) है ताके
हंस हौ औ जगमें योग औ जागकी है प्रशंसा (स्तुति) जिनकी दूनौ पद
संबोधन हैं ॥ १२ ॥ १३ ॥ १४ ॥ १५ ॥
मू०-राजभारनलभैयनिदयो । छलबलछीनिसबैतिनल-
यो ॥ जबलीन्होंसबराजबिचारि । नलदमयंतीदियोनिकारि॥
॥ १६ ॥ राजासुरथराजकीगाथ । सौंपिसबमंत्रिनकेहाथ ॥
संततमृगयालीनबिचारि । मंत्रिनराजादियोनिकारि ॥ १७॥
राजश्रीअतिचंचलतात । ताहूकीसुनिलौजैबात ॥ यौबनअरु
अबिबेकीरंग । बिनस्यौकौनराजश्रीसंग ॥ १८ ॥ शास्त्रसुज-
लँहूधोवततात । मलिनहोतअतिताकेगात ॥ यद्यपिहैअति-
उज्ज्वलदृष्टि । तदपिसृजतिरागनकीसृष्टि ॥ १९ ॥
टी०-नलकी कथा पुराणमों प्रसिद्ध है ॥ १६ ॥ मृगया (शिकार) सुरथ-
हूकी कथा मार्कण्डेयपुराणमों प्रसिद्ध है ॥ १७ ॥ अति चंचल जो राजश्री है
ताहूमें ऐसो दोष है ते सुनौ कहियत है यौबन औ अबिवेकी रंग औ राजश्रीके
संगमें को नहीं बिनस्यौ ए तीनों सम हैं अथवा यौबन औ अबिवेकी रंगयुक्त
जो राजश्री है अर्थ सदा यौबन औ अबिवेकसों युक्त रहति है ताके संगको नहीं
बिनस्यौ अथवा हितोपदेशमें कह्यो है कि ॥ "यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता।
एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् ॥" यामें चारि कह्यौ है ता मतसों यह अर्थ-
कि यौवन अबिवेकी रंग औ राज औ श्री कहे संपत्ति इन चारिके संगमें को
नहीं बिनस्यौ ॥ १८ ॥ शास्त्रका उपदेश सुनिकै शास्त्रकी आज्ञा माफिक नहीं
करत और तासों मलिन उदास होत है अथवा अनेक शास्त्र सुनाबो ताहूपर पात-
कन करि ताके गात मलिन होत हैं शास्त्रहू सुनिकै अनेक पातक करत ही है
इत्यर्थः औ यद्यपि याकी उज्ज्वल (विमल) दृष्टि है अर्थ उत्तम पदार्थनपर
दृष्टि है तौ अति उत्तम जो पदार्थ (ईश्वरपद) है तामें प्रीति बारेसों नहीं करति
राग जो स्रक, चंदन, वनितादि बिषे अभिलाष है ताको सृजति कहे उत्पन्न
करति है "अभिमतविषयाभिलाषो रागः" ॥ १९ ॥
मू०-महापुरुषसोंजाकीप्रीति । हरतिसोज़ंझामारुतरीति ॥
बिषयमरीचिकानिकीज्योति ॥ इंद्रीहरिणहारिणीहोंति॥२०॥