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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 269 में से

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पृष्ठ 222

( २१६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

प्रतिदिनदीजतनेमसों, ताकहँनित्यबखान ॥ कालहिपाइजो
दीजिये, सोनैमित्तिकदान ॥ ११ ॥ श्लोक ॥ आश्रितं साधु
कर्माणं ब्राह्मणं यो व्यतिक्रमेत् । तस्य पुण्यचयोप्याशु क्षयं
याति न संशयः ॥ १२ ॥ तोटकछंद ॥ पहिलेनिजवर्तिनदेहु
अबै । पुनिपावहिनागरलोगसबै ॥ पुनिदेहुसबैनिजदेशिनको
उबरोधनदेहुबिदेशिनको ॥ १३ ॥ दोधकछंद ॥ दानसकाम
अकामकहेहैं । पूरिसबैजगमांझरहेहैं॥इच्छितहीफलहोतसका-
मैं । रामनिमित्तेजानिअकामै ॥ १४ ॥
टी०-अभिगम्य कहे ब्राह्मणके घरमें जाइकै जो दान है सो उत्तम है औ
आहूत कहे ब्राह्मणको बोलायकै जो दान है सो मध्यम है औ याच्यमान कहे
जब ब्राह्मण मांगै आइ तब जो दान है सो अधम है औ सेवादान कहे जब
ब्राह्मण सेवा करै तब जो दान है सो निष्फल है अर्थ वामें कछू पुण्य नहीं है
॥ १० ॥ काल पाइ अर्थ चन्द्र सूर्य ग्रहणादि समयमों ॥ ११ ॥ अपनो
आश्रित जो साधुकर्मा ब्राह्मण है ताको जो व्यतिक्रमेत् कहे व्यतिक्रम करत है
अर्थ तिन्हें छोड़ि औरको दान देत है ताको पुण्यचय कहे पुण्यसमूह आशु कहे
शीघ्र ही “ क्षयं याति ” कहे क्षयको प्राप्त होता है यामें संशय नहीं अपि शब्दते
या जनायो कि थोरी पुण्य तौ क्षयको प्राप्त होतिही है ॥ १२ ॥ आश्रितको
व्यतिक्रम न कियो चाहिये तासों पहिले निज कहे आपने वर्ती कहे आश्रित-
नको देहु औ “ निजबृित्तिन ” पाठ होइ तौ निज कहे आपने इहां है दानहीसों
वृत्ति कहे जीविका जिनकी नागर कहे नगरवासी ॥ १३ ॥ १४ ॥
मू०-दानतेदक्षिणबामबखानौं । धर्मनिमित्तेदक्षिणजा-
नों ॥ धर्मबिरुद्धतेबामगुनौजूं । दानकुदानसबैतेसुनौजूं १५॥
देहुसुदानतेउत्तमलेखो। देहुकुदानतिन्हैंजनिदेखो ॥ छांडिसबै
दिनदानहिं दीजै । दानहिंतेसबकेमतलीजै ॥ १६ ॥ दोहा ॥
केशवदानअनंतहैं, बनैनकाहूदेत ॥ यहैजानिसुवभूपसब,भूमि
दानहीदेत ॥ १७॥ श्लोक ॥ यत्किंचित्कुरुते पापं ज्ञानतोऽज्ञा-