रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशप्रकाशः २१. ( २१५ )
बखानिये ॥ हाथलैकुशगोत्रउच्चरिसुवर्णयुक्तप्रमानिये । दान
दैकछुऔरदीजहिदानसात्त्विकजानिये ॥ ४ ॥
टी०-॥१॥ कहा कहे कौन वस्तु कै भांति कहें कै प्रकारसों दान कीजै दान
पदको संबंध याहूमों है ॥ २ ॥ ३ ॥ देवदेव जे विष्णु हैं तिनहिं स्थापिकै
कहे तिनके अर्थ फल समर्पण करिकै अथवा ब्राह्मणको देवहि ( विष्णुहि )
थापिकै कहे मानिकै अथवा देवदेवकी स्थापना करिकै सुवर्णसों युक्त कुश
हाथमें लैके गोत्रको उच्चरिकै वेदके मंत्रसों दान फेरि कछू और दीजै अर्थ
सांगतादान दीजै दानके बादि जो दान दियो जात है सो सांगतादान
कहावतहै ॥ ४ ॥
मू०-दोधकछंद ॥ देहि नहींअपनेकरदानैं । औरकेहाथ
जोमंगलजानै ॥ दानहिं देतजोआरसुआवै । सोवहरा जसदा-
नकहाव ॥ ५ ॥ बिप्रनदीजतहीनबिधानैं । जानहुँताकहँता-
मसं दानैं ॥ बिप्रनजानहुँजैनररूपै । जानहुँयेसबविष्णुस्वरूपै
॥ ६ ॥ श्लोक ॥ साचारो वा निराचारो साधुर्वासाधुरेव च ।
अविद्यो वा सविद्यो वा ब्राह्मणो मामकी तनुः ॥ ७ ॥
तोमरछंद ॥ द्विजधामदेहिं जो जाइ । बहुभाँतिपूजिसुराइ ॥
कछुनाहिँनैपरिमान । कहियेसोउत्तमदान ॥८॥ द्विजकोजो-
देतबोलाइ । कहियेसोमध्यमराइ ॥ गुनियाचनामिसदानु ।
अतिहीनताकहँजानु ॥ ९ ॥
टी०-॥५॥ विप्रनको जगरूपै कहे जगतके सदृशै जै कहे जनि जानहुँ ॥६॥
पाछे कह्यो कि विप्रनको विष्णुस्वरूपै जानौं ताको विष्णु वाक्यसों पुष्ट करत
हैं विष्णु कह्यो है कि ब्राह्मण कहे आचार सहित होइ और अर्थ सुगम है
मामकी कहे हमारो तनु कहा है ॥ ७ ॥ ताकी उत्तमताको कछू प्रमाग नहीं
है ॥ ८ ॥ अतिहीन कहे अधम ॥ ९ ॥
मू०-श्लोक ॥ अभिगम्योत्तमं दानमाहूतं चैव मध्यमम् ।
अधमं याच्यमानं स्यात्सेवादानं तु निष्फलम् ॥ १०॥ दोहा॥