रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंत्रयोविंशप्रकाशः २३. ( २२९ )
मू०-दोहा-वामदेवमुनिकण्ण्वश्रुत, भरद्वाजमतिनिष्ठ । पर्व-
तादिहै सकलमुनि, आयेसहितवशिष्ट ॥ ६ ॥ नगस्वरूपिणी
छंद ॥ सबंधुरामचंद्रजूउठेविलोकि कै तबै । सभासमेतिपाँपरे-
विशेषिपूजियोसबै ॥ विवेकसोंअनेकधादशेअनूपआसने ।
अनर्घअर्थआदिदैविनैकियेघनेघने ॥ ७ ॥ राम-रूपमाला-
छंद ॥ रावरेमुखकेविलोकतहीभयेदुखदूरि । सुप्रलापनहींरहे
उरमध्यआनँदपूरि ॥ देहपावनहैगयोपदपद्मकोपयपाइ । पूज
तैभयोवंशपूजितआशुहीमुनिराइ ॥ ८ ॥ संनिधानभरेतपोध-
नधामधीधनधर्म । अद्यसद्यसबैभयेनिरवद्यबासरकर्म ॥ ईश-
यद्यपिदृष्टिहीभइभूरिमंगलसृष्टि । पूँछिबेकहँहोतिहैसोतथापि-
वाकविसृष्टि ॥ ९ ॥
टी०-निष्ठ कहे उत्कृष्ट है मति जिनकी ॥ "निष्ठोत्कर्षव्यवस्थयोरिति अभि-
धानचिंतामणिः" ॥ ६ ॥ विवेक (विचार) सों अर्थ यथोचित अनर्घ कहे
अमोल अर्घ पाद्यादि पूजाविधि प्रसिद्ध है ॥ "अर्घः पूजाविधौ मूल्ये इत्यभिधान-
चिंतामणिः" ॥ ७ ॥ द्वै छंदको अन्वय एक है तपोधन ! ऋषिनको संबोधन है
सुप्रलाप कहे सुवचन ॥ "सुप्रलापः सुवचनमित्यमरः॥" पदपद्मको पय कहे चर-
णोदक रावरे पदको संबंध सुप्रलापादिकमों सर्वत्र है संनिधान कहे समीपसों
अर्थ रावरे निकट प्राप्त भये सो हमरे धाम (घर) औ धी (बुद्धि) धन औ
धर्मसों भरे अर्थ धाम धनसों भरे, बुद्धि धर्ममों भरी, अद्य कहे आज सद्य कहे
शीघ्रही सबै जे बासर कर्म कहे रोज रोजके दानकर्म हैं निरवद्य कहे अनिंद्य
भये औ हे ईश ! यद्यपि तुम्हारी दृष्टिहीसों अवलोकनहीं सों हमपर भूरि कहे
बहुत मंगल कहे कल्याणकी दृष्टि भई अर्थ हमारो बडो कल्याण भयो परंतु
कल्याणमें तो काहूकी तृप्ति होति नहीं तामों अधिक कल्याणके लिये तुमसों कछू
पूछिबेको हमारे वाक जे वचन हैं तिनकी विसृष्टि कहे उत्पत्ति होति॥ ८॥ ९॥
मू०-॥ दोहा ॥ गंगासागरसोंबड़ो, साधुनकोसतसंग ॥
पावनकरिउपदेशअति, अद्भुतकरतअभंग ॥ १० ॥
टी०-साधुनको जो सतसंग है सो गंगासागरहूसों बडो है काहेते अति अद्भुत