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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 228, कुल 269 में से

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पृष्ठ 228

( २२२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
रावण के मंत्र जपत समय अंगदादि गये हैं ता समय विभीषणके कछू वचन
नहीं हैं तौ इहां रामचन्द्रकी उक्तिसों जानो विभीषणहीके बतायेसों अंगदादि
गये हैं ॥ ४६ ॥ हम हेतु कहे हमारे हेतु ॥ ४७ ॥
मू०-दशकंधके जायजोगूढ़थली । तिनकेतनसोंबहुभांति
दली ॥ महिमैंमयकीतनयाकर्षी । मतिमारिअकंपनकोहर्षी ॥
॥ ४८ ॥ दोहा ॥ मारयोमैंअपराधबिन,इनकोपितुगुणग्राम ॥
मनसावाचाकर्मणा,कीन्हेमेरेकाम॥४९॥गीतिकाछंद॥इनजा-
मवंतअनेकराक्षसलक्षलक्षनहींहने । मृगराजज्यौंबनराजमैंग-
जराजमारतनीगने॥ बलभावनाबलवानकोटिकरावणादिकहा-
रहीं । चढ़िव्योमदीहबिमानदेवदिवानआनिनिहारहीं ॥ ५० ॥
दोहा ॥ करैनकरिहैकरतअब, कोऊऐसोकर्म ॥ जैसेबांध्योनल
उपल, जलनिधिसेतुसधर्म ॥ ५१ ॥ गीतिकाछंद ॥ हनुमन्त
येजिनमित्रतारविपुत्रसोंहमसोंकरी । जलजालकालकरालमा-
लउफालपारधराधरी ॥ निश्शंकलंकनिहारिरावणधामधामनि
धाइयो । यकबाटिकातरुमूलसीताहिंदेखिकैदुखपाइयो ॥५२॥
टी०-गूढस्थली [ जपस्थान ] तिनके अंगदके तनसों कर्षी कहे खेंची कठोरि
इति औ अकंपनको मारिकै इनकी मति हर्षी ( प्रसन्न ) भई ॥ ४८ ॥
॥४९॥ लक्षलक्षनही अर्थ एक एक वारमें लाख लाख मारयौहै बनराज कहे बडो बन
बलभावता कहे बलक्रिया हारही कहे हारत भये यहां भूतार्थमें बर्त्तमान प्रत्ययको
अर्थ है ॥ ५० ॥ उपल ( पाषाण ) सधर्म कहे यथोचित ॥५१॥ कालहूते कराल
जे नक्रादि जंतु हैं तिनको है माल कहे समूह जामें ऐसो जो जलजाल कहे समु-
द्रको जलसमूह है ताके पारकी धरा पृथ्वीको उफाल कहे कूदिबो ताही सों धरी
कहे प्राप्त भये अर्थ एतो बडो समुद्र ताके पार कूदिही कै गये काहू पोतादिमें
नहीं गये इति भावार्थः ॥ ५२ ॥
मू०-तरुतोरिडारिप्रहारिकिंकरमंत्रिपुत्रसँहारियो । रणमारि
अक्षकुमाररावणगर्वसोंपुरजारियो । पुनिसौंपिसीतहिमुद्रिका-