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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 224, कुल 269 में से

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पृष्ठ 224

( २१८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

दान देहु काहंते इन सनाढ्यनको आदिही सों अस अर्थ जबसों इनकी उत्पत्ति
है तबहीसों तुम विवेक सहित दै आये हौ ॥ २१ ॥ २२ ॥
मू०-भरद्वाज ॥ गिरीश नारायणपैसुनीत्यौं । गिरीशमोसों
जो कहीकहौंत्यौं ॥ सुनोसोसीतापतिसाधुचर्चा । करीसोजाते
तुमब्रह्मअर्चा ॥ २३ ॥ नारायण-मोटनछंद ॥ मोतेजलना-
भिसरोजबढ्यो । ऊंचोअतिउग्रअकाशचढ़्यो ॥ तातेचतुरा-
ननरूपपरो ॥ ब्रह्मायहनामप्रगट्टभयो ॥२४॥ ताकेमनतेसुत
चारिभये । सोहैंअतिपावनवेदमये ॥ चौहूंजनकेमनतेउपजे ।
भूदेवसनाढ्यतेमोहिंभजे ॥ दीन्हौतुमहीतिनजोहितजू ॥ है
हौ तुमब्रह्मपुरोहितजू ॥ २५ ॥
टी०-गिरीश (महादेव) जाति कहे जाकारणते तुम ब्रह्म अर्चा कहे सनाढ्य
ब्राह्मणनकी पूजा करी है अथवा ब्रह्म जे तुम हौ ते सनाढ्यनकी अर्चा आदिहीसों
करी है ॥ २३ ॥ २४ ॥ यह छंद छह चरणको है चारि सुत सनक, सनन्दन,
सनातन, सनत्कुमार वेदमये कहे वेदस्वरूप ये नारायणके वचन शिव प्रति हैं तिन्हें
कहिके द्वै चरणनमों भरद्वाज रामचन्द्रसों कहत हैं कि हे रामचन्द्र ! नारायणरूप
जे तुम हौ तिनहीं तिनको हितसों यह वचन दियो है वचन इतिशेषः ॥ कि तुम
ब्रह्म कहे परब्रह्मके पुरोहित है हौ ॥ २५ ॥
मू०-गौरीछंद ॥ तातेऋषिराजसबैतुमछांडो । भूदेवसना-
ढ्यनकेपद्मांडो ॥ दीन्हौतुमहीतिनकोबररुरे । चौंहूंयुगहो-
हुतपोबलपूरे ॥ २६ ॥ उपेंद्रवज्राछन्द ॥ सनाढ्यपूजाअघ-
ओघ हारी । अखंडआखंडललोकधारी । अशेषलोकावधि-
भूमिचारी । समूलनाशेनृपदोषकारी ॥ २७ ॥ श्रीराम-तोट-
कछंद ॥ हनुमन्तबलीतुमजाहुतहां । मुनिवेषभरत्थबसं-
तजहां ॥ ऋषिकैहमभोजनआजुकरैं । पुनिप्रातभरत्थहिंअं-
कभरैं ॥२८॥ चतुष्पदीछंद ॥ हनुमंतविलोकेभरतसशोकेअं-
गसकलमलधारी । बकलापहिरेतनशीशजटागणहैंफल-