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रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

( १५४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मू०-दोहा ॥ याप्रकाशदशपंचमें, दशाशिरकरैबिचार ॥
मिलनबिभीषणसेतुरचि, रघुपतिजैहैंपार ॥ १ ॥
मू०-रावण-गीतिकाछंद ॥ सुरपालभूतलपालहौसबमूल
मंत्रतेजानिये । बहुमंत्रवेदपुराणउत्तममध्यमाधमगानिये ॥
करियेजोकारजआदिउत्तममध्यमाधमभानिये।उरमध्यआनि-
अनुत्तमैजेगयेतेकाजबखानिये ॥२॥ स्वागताछंद ॥ आजुमो-
हिंकरनेसोकहौजू ॥ आपुमांहजनिरोषगहौजू ॥ राजधर्मकहिये
छबिछाये । रामचन्द्रनहिंजौलंगिआये ॥ ३ ॥
टी०-सब महोदरादि जे राक्षस हैं तिनसों रावण कहत है कि तुम सब
सुरपाल जे इंद्रहैं तिनको जो भूतल स्वर्गहै ताके पालनहार हौ अर्थ इंद्रलोकमें
राज्य करचौ है आशय यह कि मंत्रनहीके जोरसों इंद्रको जीति इंद्रलोक अमलयौ
अथवा सुरपाल इंद्र सम भूतलपाल हौ इंद्रको ऐसो राज्य करत हौ सो मूलमंत्र
कहे सिद्धांतमंत्र अर्थ जिनसों शत्रु की पराजय आपनो जय होय ऐसे मंत्र जानिये
कहे जानत हौ वेद पुराणनमें बहुत जे मंत्र हैं तिन्हें उत्तम औ मध्यम औ अधम
नीति प्रकारके वेद पुराणनकारिकै गाइयत है अर्थ वेद पुराण कहत हैं यथा
शास्त्रकी दृष्टिसों अर्थ जैसो शास्त्र कहत हैं ताही विधिसों एक मत ह्वैकै मंत्र
ठहरावै सो मंत्र उत्तम है औ जहां मंत्रीजन अपने मतको मंत्र भिन्न भिन्न कहैं
फिरि राजभयादि कारणोंसों उदासीनतासों एकमत ठहरावैं सो मंत्र मध्यम है औ
मंत्री जो आपनेही अपने मनको मत भिन्न भिन्न कहैं एकमत कैसेहू ना होइ सो
मंत्र अधम है यथा । वाल्मीकीये । ऐकमत्यमुपागम्य शास्त्रदृष्टेन चक्षुषा । मंत्रि-
णो यत्र निरतास्तमाहुर्मंत्रमुत्तमम् ॥ १ ॥ बह्वीरपि मतीर्गत्वा मंत्रिणामर्थनिर्णयः॥
पुनर्यत्रैकतां प्राप्तः स मंत्रो मध्यमः स्मृतः ॥२॥अन्योन्यं मतिमास्थाय यत्र संप्र-
तिभाष्यते । नचैकर्मण्यश्रेयोस्ति मंत्रः सोधम उच्यते ॥ ३ ॥ तिन तीनहूं प्रका-
रके मंत्रनमें आदि उत्तम जो कारज है ताको करिये अर्थ एक मत ह्वै कारज
करिये औ मध्यम औ अधमको भानिये कहे दूरि करो ऐसे समयमें जे अनुत्तम
काज व्यतीत ह्वैगये अर्थ आपनेहीं अपने मनकी सब मिलि कह्यो तिन बात-
नको उरमें आनिकै बखानिये कहे कहत हौ अर्थ ऐसे समयमों ऐसी बात कहिबो
उचित नहींहै तासों एकमत ह्वै मंत्र करौ ॥ १ ॥ २ ॥ ३ ॥

पंचदशप्रकाशः १५. ( १५५ )

मू०-प्रहस्त ॥ वामदेवतुमकोवरदीन्हो । लोकलोकसिग-
रेशकीन्हो ॥ इन्द्रजीतसुतसोजगमोहै। रामदेवनरवानरको-
है॥४॥ मृत्युपाशभुजजोरनितोरे । कालदंडतुमसोंकरजोरे ॥
कुंभकर्णसमसोदरजाके । औरकौनमनआवतताके ॥ ५ ॥
कुंभकर्ण-चतुष्पदी० ॥ आपुनसबजानतकह्यौनमानतकीजै-
जोमनभावै।सीतातुमआनीमीचुनजानीआनकिमंग्रबतावै॥ जे
हिबरजगजीत्यौसर्वअतीत्यौतासोंकहाबसाई । अतिभूलिगई
तबशोचकरतबजबशिरऊपरआई ॥ ६ ॥ मंदोदरी-विजय-
छंद॥रामकिवामजोआनीचोराइसोलंकमेंमीचुकीबेलिवईजू ।
क्योंरणजीतहुगेतिनसोंजिनकीधनुरेखननांधिगईजू ॥ बीसबि-
सेबलवन्तहुतेजोहुतीदृगकेशवरूपपरईजू।तोरिशरासनशंकरको
पियसीयस्वयंवरक्यौंनलईजू ॥ ७ ॥
टी०-वामदेव महादेव सरस्वती उक्तार्थः ॥ रामचन्द्र देव हैं नर औ वानर
को हैं इहां देव पदते ईश्वर जानौ अर्थ रामचन्द्र ईश्वर हैं औ सुग्रीवादि
वानर सब देवसैन्य हैं ॥ ४ ॥ ५ ॥ बर कहे बल अर्थ तपोबल
अथवा शिवादिके वरमों सब अतीत्यौ कहे बीतो तासों कहा बसाइ कहे
जोर चलै अर्थ विनाशको समय आयो सोई तुमसों ऐसे सीयाहरणादि कार्य
करायो है अथवा जेहि शिव औ ब्रह्माके वरसों जगको जीत्यौ सो वरदान
सब वीतो काहेते कि यह वर दीन रह्यो कि नर वानरनको छोडिकै औरसों
तुमको भय न है है सो और औ वानर ही लरिबेको आवत हैं सो वानरको
प्रभाव तौ कछू यामें चलि है नहीं सो तुमको तब कहे सीयाहरणादि
समयमों यह सुधि भूलि गई कि हमको नर वानरसौं भय है जब शिर ऊपर
आई है तब शोच करत हौ तौ तासों कहा वसाइ कहे जोर चलै अर्थ अब
मृत्युते रक्षाको कछू उपाय नहीं है ॥ ६ ॥ जो तुम्हारो दृगनमों सीतारूप जो
सौंदर्य्य है ता करिकै रई कहे वसी रहे ॥ ७ ॥
मू०-बालिबली नबच्यो बरखोरिहिक्यौं बचिहौ तुम आपनिखो-
रहि।जालगिक्षीरसमुद्रमथ्यौ कहिकै सैन बांधिहैं वारिधितोरहि॥

श्रीरघुनाथगनौअसमर्थनदेखिबिनारथहाथिनचोरहि। तोरचो
शरासनशंकरकोजेहिसोवकहातुवलंकनतोरहि ॥८॥ मेघनाद-
दोहा ॥ मोकोंआयसुहोइजो, त्रिभुवनपालप्रवीन ॥ रामसहि-
तसबजगकरौं, नरबानरकरिहीन ॥९॥ विभीषण-मोटनकछंद॥
कोहैअतिकायजोदेखिसकै। कोकुंभनिकुंभवृथाजोबकै ॥ को
हैइन्द्रजीतजोभीरसहै । कोकुंभकर्णहथ्यारुगहै ॥ १० ॥
टी०-जालगि कहे जा लक्ष्मीरूप जे सीता हैं तिनके लिये ॥ ८ ॥ सरस्वती
उक्तार्थः मेघनाद कहत है कि जो मंत्र कहिबेको हमको आज्ञा होइ तौ हम
कहियत है कि त्रिभुवनपाल कहे तीनों लोकके रक्षा करणहार औ प्रवीण कहे
विवेकी यासों या जनायो कि केवल समदृष्टीहीसों नहीं प्रतिपाल करत भक्तन-
पर अतिकृपा शरणागतरक्षण शत्रुनाशादि कर्म यथोचित करत हैं ऐसे जे राम-
चन्द्र हैं तिनहीं करिकै सहित सब जग है अर्थ रामचंद्रही सर्वत्र व्याप्त हैं अर्थ कि
विष्णु हैं यथावृत्तरत्नाकरे ॥ म्यरस्तजन्नौग्लौंतैरेभिर्दशभिरक्षरैः ॥ समस्तं वाङ्-
मयं व्याप्तं त्रैलोक्यमिव विष्णुना ॥ इनको नर औ बानर करिकै हीन करौं कहे
करि मानत हौं अर्थ रामचन्द्र विष्णुहैं वानर सब देवताहैं अंगदहू सोरहे प्रकाशमें
कह्यो है कि। कौनइहांनरवानरकोरे ॥ ९ ॥ १० ॥
मू०-देखेरघुनायकधीररहै । जैसेतरुपल्लवबातबहै ॥ जौ-
लौंहरिसिंधुतरैइतरै । तौलौं सिय लैकिनपाइपरै ॥११॥ जौलौंन-
लनीलनासिंधुतरै । जौलौं हनुमंतनदृष्टिपरे ॥ जौलौनहिं अंगद
लंकदही । तौलौं प्रभुमानहुबातकही ॥१२॥ जौलौनहिं लक्ष्म-
णबाणधरै । जौलौं सुग्रीवनक्रोधकरै॥ जौलौरघुनाथनशीशहरै
तौलौंप्रभुमानहुपाइपरै ॥१३॥ रावण-कलहंसछंद ॥ अरिका-
जलाजतजिकैउठिधायो।धिकतोहिंमोहिंसमुझावनआयो।तजि
रामनामयहवोलउच्चारचो।शिरमांझलातपगलागतमारचो १४
टी०-अर्थ रघुनाथको देखि अतिकायदिकनके काहूके धीर न रहि है ॥
११ ॥ १२ ॥ १३ ॥ रामनामको तजि कहे छोड़ यह बोलु रावण उच्चारयो

पंचदशप्रकाशः १५. ( १५७ )
कहे कहो सरस्वतीउक्तार्थः अरि कहे शत्रुके काजसों लाज तजिकै उठि-
धायो है अर्थ रामचंद्रके हाथ मृत्युसों हमारी मुक्ति है है तामें चाहिये कि
तू भाई है सहाय करै सो तू शत्रुता करत है जामें याकी मुक्ति ना होई
यामें तोंकों लाज हीं है भाई हैकै शत्रुको काम करत है तोकों धिक्
है जो मोहिं समुझावैहै कि रामचंद्रसों न लरौ अथवा मोहि कहे मोहवश है
कै रामको नाम जो न रह्यो ताको तजिकै यह बोल उच्चारयो कहे एती कथा
कह्यौ यह कहिकै पाँय परत विभीषणके शिरमें लात मारयौ ॥ १४ ॥
मू०-करिहायहों गठेदेहसँभोरउ । लियअंगसंगसबमंत्रि-
यचारउ ॥ तजिअंगु दशकंधउडानयो । उररामचंद्रजगतौ-
पतिआन्यो ॥ १५। दोहा ॥ मंत्रिनसहितविभीषण,
बाढीशोभ अकाण ॥ चुअलिआवतभावतो, प्रभुपदपद्म-
निवास ॥ १६ ॥ चौपई निकटविभीषणआवतजाने ।
कपिपतियोंतबहींगुदराने, रघुपतिसोंतिनजाइसुनायो ।
दशमुखसोदरसेवहिआयो १७॥ श्रीराम० ॥ बुधिबलवं-
तसबैतुमनीके । मतसुनिलैँ तिनहीके ॥ तबजोबिचारप-
रैसोइकीजै । सहसाशत्रुन ३ दीजै ॥ १८ ॥ अंगद-
सुंदरीछंद ॥ रावणकोयहसांचउ ६ । आपुबलीबलवंत-
लियेअरु ॥ राकस वंशह मैं हनने १ काज कहातिनसों-
हमसों अब ॥ १९॥ बध्यबिरोध सोंअति । क्योंमि-
लिहैहमसोंतिनसोंमति ॥ रावणक्यौँ इतबहींइन । सी-
यहरीजवहींवहनिर्घुन ॥ २० ॥ नल- चारपठैनकोम-
तलीजिय । ऐसेहिकैसेबिदाकरिदीजिय रखियजोअति-
जानिय उत्तम । नाहिंतौमारियछोड़िसबै २१ ॥
टी०-॥ १५ ॥ १६ ॥ कपि सो बानर हैं तिनके प
गुदराने कहे कहत भये ॥ १७ ॥ १८ ॥ १९ ॥ बध्य वीर हैं तिनसों
करिबे लायक

( १५८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
निर्घृण कहे निर्दय ॥ 'कारुण्यं करुणा घृणा इत्यमरः' ॥ २१ ॥ चार कहे
दूत ॥ २१ ॥
मू०-नील० ॥ सांचेहुजोयहहैशरणागत । राखियराजि-
वलोचनमोमत ॥ भीतनराखियतौअतिपातक । होइजोमा-
तुपिता कुलघातक ॥ २२ ॥ हनूमान-हरीलीलाछंद ॥
जानौबिभीषणनराकसरामराज । प्रह्लादनारदबिशारद-
बुद्धिसाज ॥ सुग्रीवनीलनलअंगदजाम्बवाँ । राजाधिराज-
बलिराजसमानसंत ॥ २३ ॥ दोहा ॥ कहननपाई बातसब-
हनूमंतगुणधाम ॥ कह्यौबिभीषण जुही, सबन सुनाइ-
प्रणाम ॥ २४ ॥ सवैया ॥ दयालुकहावतकेशवहौं
अतिदीनदशागह्यौगाढो । रावण अघओघमैंकेशवबूडतहौं
वरहींगहिकाढो । ज्योंगज ग्राहकीकीरतित्योंहींबिभी-
षणकोयशबाढो । आरतबंधु सुनो किन आरतहौं तौ-
पुकारतठाढो ॥ २५ ॥
टी०-जो माता औ पिता औ घात कहूं होय औ भीत है कै आवै
ताको न राखौ तौ बडो पातक जो माता पिता औ कुल घातकको
पातक होत है सोई पातक जो ना राखै ताको होत है ॥ २२ ॥ प्रह्लाद
औ नारदके समान हैं बिशा धृष्ट परिपक्व इति बुद्धिकी साज जिनकी
अर्थ प्रह्लाद नारद सम तु क है ॥ “विशारदः पंडिते च धृष्टे इतिमे-
दिनी” ॥ २३ ॥ २४ कहे बाढो ॥ २५ ॥
मू०-केशवउ सह्यौदुःखपैदासनदेखिसकेनदुखारे ।
जाकोभयोजेहि जहँदुखत्योंहींतहांतिहिभाँतिपधारे ॥
मोरियबारअबु कहूँनाहिंतुकाहुकेदोषबिचारे । बूडतहौँम-
हामोहसमुद्र वतकाहेनराखनहारे ॥ २६ ॥ हरीलीला-
छंद ॥ श्री चंद्रअतिआरतवंतजानि । लीन्होंबोलायशर-
णागतसुनि ॥ लंकेशआउचिरजीवहिलंकधाम । राजा-

पंचदशप्रकाशः १५. ( १५९ )
कहाउजग जौंलगिरामनाम ॥ २७ ॥ तोटकछंद ॥ जबहीं
रघुनायकबाण लियो । सविशेषविशोषितसिंधुहियो ॥
तबहीद्विज रूपसोआइ गयो । नलसेतुरचैयहमंत्रदयो ॥२८॥
दोहा ॥ जहँतहँवानरसिंधुमैं, गिरिगण्डारतआनि ॥ शब्दरह्यो
भरिपूरिमहि, रावणको दुखदानि ॥ २९ ॥ तोटकछंद ॥
उछलैजलउच्चअकाशचढै । जलजोरदिशाबिदिशानमढै ॥
जनुसिंधुआकाशनदीअरिकै । बहुभाँतिमनावतपांपरिकै ॥३०॥
टी०--त्योंहीं कहे तत्कालही मोह कहे दुःख ॥ २६ ॥ २७ ॥ समुद्रतटमें
रामचन्द्र तीन दिन डेरा कियेरहे जब समुद्र राह नहीं दियो तब समुद्रको शोषि-
बेकेलिये कोपकरि रामचन्द्र बाण लियो इति कथा शेषः॥ २८ ॥ २९ ॥ समुद्र-
को जल उछरि आकाशकोचढत है सो मानहू समुद्र पायन परिकै आकाश गंगाको
मनावत है ॥ ३० ॥
मू०-बहुव्योमविमानतेभीजिगये । जलजोरभयेअँगरागम-
ये ॥ सुरसागरमानहुयुद्धजये । सिगरेपटभूषणलूटिलये॥३१॥
अतिउच्छलिंछितिकूटछयो । पुररावणकेजलजोरभयो ॥
तबलंकहनूमतलाइदई । नलमानहुआइबुझाइलई ॥ ३२ ॥
लगिसेजजहांतहँशोभगहे । सरितानिकेफेरिप्रवाहबहे ॥ पतिदे-
वनदीरतिदेखिभली । पितुकेघरकोजनुरूसीचली ॥३३॥सब
सागरनागरसेतुरची । बरणैबहुधायुतशक्रशची ॥ तिलकाव-
लिसीशुभशीशलसै । मणिमालकिधौंउरवेलसै॥३४॥तारक
छंद ॥ उरतेशिवमूरतिश्रीपतिलीन्ही। श्रुतिकेमूलअधिष्ठित
कीन्ही॥इनकेदरशैपरशैपगजोई।भवसागरपारसो होई ३५
टी०-जल जोर भये सो बहुत व्योम आकाशमें देव विमान भीजिगये
कहे जो अंगनमें लग्यो कुंकुमादि लेप है तासों रये कहे पट औ भूषण
बहि आये हैं सो मानो सुर जे देवता हैं तिनको सागर युद्धमें जीत्योंहै सो मानो
लूटि लीन्हों है इहां पटभूषणनको बहि आइबो विषय कहे उपमेय है सो अनुक्त

त्रयोदश से षोडश प्रकाश: लंका-दहन, अंगद-रावण संवाद एवं सेतु-बन्ध

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पंचदशप्रकाशः १५. (१६१)

मू०-दण्डक॥कुंतलललितनीलभ्रुकुटीधनुषनैनकुमुदकटा-
क्षबाणसबलसदाईहै॥ सुग्रीवसहिततारअंगदादिभूषणरुमध्य
देशकेशरीसुगजगतिभाईहै॥ विग्रहानुकूलसबलक्षलक्षऋक्षब-
लक्षऋक्षराजमुखीमुखकेशोदासगाईहै। रामचन्द्रजूकीचमूराज्य
श्रीविभीषणकीरावणकीमीचुदरकूचचलिआई है ॥ ४० ॥

टी०-रामचन्द्र चमू कैसीहै कि कुंतल औ ललित औ नील औ भ्रुकुटी औ
धनुष औ कुमुद औ कटाक्ष औ बाण औ सबलई जे वानर हैं ते सदा हैं जामें
अथवा बाण पर्यंत इन नामन करिकै युक्त औ सदा सबल कहे बलवान ऐसे
जे वानर ऋक्ष हैं ते हैं जामें औ सुग्रीव सहित है औ तार नामा जे वानरहैं तिन
सहितहै औ अंगदादिक जे भूषण कहे सेनानायक हैं तिनसों युक्त है औ मध्य
देशनामा औ केशरीनामा औ सुगज नामा जे वानरहैं तिनकी गति भाई कहे
नीकी है जामें औ विग्रहनामा औ अनुकूलनामा औ ऋक्षराज मुख कहे ऋक्षराज
जे जाम्बवंत हैं ते हैं मुख कहे मुखिया जामें ऐसो लक्ष लक्ष कहे अनेक लक्ष
ऋक्षन ऋक्षनकोहै बल सैन्य जामें विभीषणकी राज्यश्री कैसी है कि कुंतल
जे केश हैं ते हैं ललित कहे सुंदर औ नील कहे श्याम जाके औ भ्रुकुटी धनुष
सम जाकी औ नयन हैं कुमुद कहे कमलसम जाके औ कटाक्ष हैं बाणसम जाके
औ सबल कहे सुंदरता सहित सदा है अर्थ जाकी छवि काहू समयमों म्लानि
नहीं होति ॥ "बलं गंधरसे रूपे-इति मेदिनी"॥ औ सुष्ठु जो ग्रीवा है सो सहितहै
तार कहे विमल मुक्तनसों अर्थ मोतिनकी माला पहिरे है॥ "तारो निर्मलमौक्तिके
मुक्ताशुद्धावबुध्नादे-इत्यभिधानचिंतामणिः"॥ औ अंगद जो विजायठ हैं
तेहि आदिदै जे भूषण हैं तिनसों युक्त है औ मध्यदेश जो कटि है सो है केशरी
कहे सिंहको ऐसो जाको औ सुष्ठु जो गज है अर्थ जो अति ललित चाल चलत
है ताकी ऐसी गति है भाई कहे नीकी जाकी औ विग्रह कहे शरीर है अनुकूल
कहे यथोचित सब कहे पूर्ण अर्थ जैसो जौन अंग चाहिये तौन अंग तैसोई है
अथवा अनुकूल कहे हित है सबको अर्थ जे देखत हैं ताको मन वश है जात
है अथवा अनुकूल कहे व्याधि रहित 'गात्रं वपुः संहननं शरीरं वर्ष्म विग्रहः
इत्यमरः'॥ औ लक्ष लक्ष जे ऋक्ष नक्षत्र हैं गन कहे जो बल सौंदर्य है तेहि
सहित जो ऋक्षराजचन्द्रमा है ताते सदृशहै मुख जाको अर्थ जब अनेक लक्ष

११

( १६२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
नक्षत्रकी शोभा लैके चन्द्रमा आपु धारण करै तब जाके मुखके सम होय ॥
‘ऋक्षस्तुस्यानक्षत्रमृक्षभल्लयोः-इत्यभिधानचिंतामणिः’ ॥ रावणकी मीचु कैसी
है कि कुंत जो बरछी है सो है ललित कहे लचकति जाके अर्थ बरछी हाथमें
लिये है अथवा कुंतल जो भालाहैं सोहैं ललित कहे अति तीक्ष्ण जाको अर्थ
हथियारको धरे है ॥ “कुंतलोभल्लकेशयोरित्यभिधानचिंतामणिः ॥” औ
नील कहे श्यामवर्ण है औ भ्रुकुटी भौंह हैं धनुषसम विकराल जाकी इहां कवि
क्रूर स्त्री करि वर्णन है तासों भौंहनकी धनुषकी क्रूरता धर्म करि साम्य जानौ
औ नयन हैं कुमुद् कहे कुत्सित है मुद आनंद जिनमें ऐसे हैं जाके अर्थ राव-
णके वधको आनंद है विभीषणके राज्यलाभादि उत्सवको आनंद नहीं है अथवा
नयन हैं कुमुद कहे मुद जो आनंद है प्रसन्नता इति तासों रहित अर्थ अतिको-
पसों अरुण अति विकरालहैं प्रशस्त नहीं हैं औ कटाक्ष हैं बाणसम कराल जाके
औ सबल कहे बुद्धिवल सहित सदा हैं इहां बलपदते बुद्धिवल जानौ अर्थ बुद्धि-
बलसों सीता हरणादि कार्य कराइ रामचन्द्रसों विरोध कराइ दियो तार कहे
उच्चस्वर करिकै सहित है सुसुग्रीवा जाकी सुष्ठु पदको अर्थ यह कि ऐसी उच्च-
स्वर करिवेकी शक्ति और काहूकी ग्रीवामें नहीं है औ अंगद जो विजायत हैं
तेहि आदि भूषण कहे नहीं है अर्थ मुंडमालादि क्रूर भूषण पहिरे हैं औ मध्य
कहे अधम अनुत्तमेति हैं देश कहे जाके अंग ॥ “मध्यंविलग्नेन स्त्रीस्यान्न्याय्यें-
ऽतरेऽधमेऽपिचेति मेदिनी ॥” औ केशरी जो सिंह है ताकी गजपर ऐसी गति भाई
है जाको अर्थ जैसे गजके मारिवेको सिंह चलत है तैसे रावणके मारिवेको चली
आवाति है औ रामचन्द्रको जो विग्रह विरोध है सोई है अनुकूल हित जाको
अर्थ रामचन्द्रके विरोधहीसों है कार्यसिद्धि जाकी औ सब कहे पूर्ण अनेक लक्ष
जे ऋक्ष भालु हैं तिनको है बल जाके औ ऋक्षराज जे जाम्बवंत हैं तिनको ऐसो
है मुखजाको ॥ ४० ॥
मू०-हीरकछंद ॥ रावणशुभश्यामलतनुमंदिरपरसोहियो ।
मानहुदशशृंगयुतकलिंदगिरिबिमोहियो॥ राघवशरलाघवगति
छत्रमुकुटयोंहयो । हंससबलअंशसहितमानहुउडिकैगयो
॥ ४१ ॥ लजितखलतजिसुथलभाजिभवनमेंगयो । लक्षण
प्रभुतलक्षण गिरिदक्षिणपरसोभयो ॥ लंकनिरखिअंकहर-

पंचदशप्रकाशः १५. ( १६३ )
षिमर्मसकलजोलह्यो । जाहुसुमतिरावणवह अंगदसनयों-
कह्यो ॥ ४२ ॥ चंचलाछंद ॥ रामचन्द्रजूकहंतस्वर्णलंकदे-
खिवैखि । ऋक्षवानरालि ओरओरचारिहूविशेषि ॥ मंजुकं-
जगंधलुब्धसौरभीरसीविशाल । केशौदासआसपासशोभिजै-
मनोमराल ॥ ४३ ॥
टी०-नवल कहे अनेक रंग मिश्रित हैं अंशु कहे किरण जाके ऐसे जे
सूर्य हैं तिन सहित मानों कलिंदगिरि श्रृंगते हंस कहे हंस समूह उड़िगयो है
यहाँ जातिविषे एक बचन है हंसनके सदृश श्वेत छत्र हैं औ सूर्यनके सदृश
अनेक रंग नग जटित मुकुट हैं ॥ ४१ ॥ दक्षिण गिरि कहे समुद्रके दक्षिण
कूलकी गिरि समुद्र पारको गिरि इति मर्म भेद ॥ ४२ ॥ सौर भीर सम ऋक्ष
हैं मराल हंस सम वानर हैं ॥ ४३ ॥
मू०-ताम्रकोटलोहकोटस्वर्णकोटआसपास । देवकीपुरी
घिरीकिपर्वतारिकेविलास ॥ बीचबीचहैकपीशबीचबीचचक्र-
क्षजाल । लंककन्यकागरेकिपीतनीलकंठमाल ॥ ४४ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिन्तामणिश्रीरामचन्द्र-
चन्द्रिकायामिन्द्राजिद्विरचितायां रामसैन्यसमुद्रतरणं
नामपंचदशः प्रकाशः ॥ १५ ॥
टी०-अर्थ इंद्रकी शत्रुतासों मानो पर्वतन देवपुरीको घेरिलियों है देवपुरी
सदृश स्वर्णकोट है जाके मध्यमें पुरी है औ ताके आस पास ताम्रादिके कोट
हैं ते पर्वत समान हैं यासों या जनायो कि लंका देवपुरी सम है ॥ ४४ ॥
टी०-॥ । इति श्रीमज्जगज्जननीजनकराजकुमारीजानकीजानिप्रसादायजनजानकी-
प्रसादनिर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां पंचदशः प्रकाशः ॥ १५ ॥
मू०दोहा-यह वर्णनहैषोडशे, केशवदासप्रकास । रावण
अंगदसोंविविध, शोभितवचनविलास ॥ १ ॥ अंगदकूदि
गयेतहाँ, आसनगतलंकेश । मनुमधुकरकरहाटपर, शोभि-

तश्यामलवेष ॥ ॥ २ ॥ प्रतीहारनाराचछंद ॥ पढोबिरंचि
मोनवेदजीवसोरछंडिरे । कुबेरबेरकैकहीनयक्षभीरमंडिरे ।
दिनेशजाइदूरिबैठुनारदादिसंगहीं । नबोलुचंदमंदबुद्धिइंद्रकीसभानहीं ॥ ३ ॥ चित्रपदाछंद ॥ अंगदयोसूनिबानी ।
चित्तमहारिसआनी ॥ ठेलिकै लोगअनेक । जाइसभामहँ-
बैठे ॥ ४ ॥ चित्रपदाछंद ॥ कौनहोपठयेसोकौनैइहांत तुम्हैं-
कहकामहै ॥ अंगद ॥ जातिबानरलंकनायक दूतअंगदनाम
है ॥ रावण ॥ कौनहैवहबांधिकैहमदेहपूछिसबैदही । लंकजारि-
सँहारिअक्षगयोसोबातवृथाकही ॥ ५ ॥
टी०-॥ १ ॥ आसनमें गत कहे बैठो ॥ २ ॥ रावणके सभाभवनमें जाइ
अंगद ऐसे कौतुक देखत भये प्रतीहार या प्रकारके अनादर पूर्वक बचन
ब्रह्मादिसों कहत हैं हे कुबेर ! तुमसों कैयो बार कह्यो कि तुम यक्षनकी भीरको
न मंडौ अर्थ यक्षनकी भीरको संग लै इहां न आयो करो सो तुम आइवां करत हौ ३॥
॥ ४ ॥ लंकनायक बिभीषण॥ ५ ॥
[L

हविहारछयोजू। सीयनिहारिसंहारिकैराक्षसशोकअशोकबनीहि
दयोजू। अक्षकुमारहिमारिकैलंकहिजारिकैनीकेहिजातभयोजू ९

टी०-महोदरने पूंछी कि तुम तहां कौन भांतिसों रहत हौ अर्थ कौने
कामके अधिकारी हौ तब अंगद कह्यो है हम राजाके इहां प्रेषक कहे यथोचित
स्थानमें दूतनके पठावनहार हैं अर्थ दूतनके नायक हैं लोक लाज दुरयो रहे
यह कहि अंगद या जनायो कि हमारे सैन्यमें ऐसो कोऊ नहीं है
जाको काहूं बांध्यो माग्यो होइ ॥ ६ ॥ ७ ॥ पाछे अंगद कह्यो है कि हम लंक
नायकके दूत हैं सो रावण पूछ्यो कि लंकनायक को है जाके तुम दूत हौ तब
अंगद कह्यो है कि विभीषण लंकनायक है कैसो है विभीषण जे देवतनके दूषण
कहे पीडा करनहार हैं तिनको दहै कहे जारत हैं यामों या जनायो कि तुमहूं देव
दूषण हो तुमहूं को दहि हैं ॥ ८ ॥ सागरके मद रह्यो कि हमको कोऊ ना नांघि
सकिहै सो नांघिकै ता मदको झारि डारचो अर्थ दूरि करचो औ चिकारिकै गर्जि-
कै त्रिकूट नाम जो लंकापुरीको पर्वत है ताके देहमें अर्थ सब पर्वतघेरमें बिहारि
कहे नीके प्रकारसों ढूंढिकै स्त्री भवनादि देखिकै छयो कहे रहत भयो ॥ ९ ॥

मू०-गंगोदकछंद ॥ रामराजानकेराजआइयेइहांधामतेरम-
हाभागजागेअबै । देविमंदोदरीकुंभकर्णादिदैमित्रमंत्रीजितैपूं-
छिदेखौसबै । राखिजैजातिकोभांतिकोंवंशकोंसाधिजैलौकमें
लोकपलौंकको । आनिकैपांपरोदैसुलैकौशलैआसुहोइशमा-
ताहिलैओकको ॥ १० ॥ रावण ॥ लोकलोकेशसोंशोचिगा-
रचैंअपनीअपनीसींवसोंसोरहै । चारिबाहैंधरेविष्णुरक्षाकरैं
वातसांचीयहैवेदवाणीकहै ॥ ताहिभूमंगहीदेवदेवेशसोंविष्णु
ब्रह्मादिदैरुद्रजूसंहरै । ताहिहोंछोड़िकैपायँकाकेपरौंआजुसंसा-
रतोपायँमेरेपरै ॥ ११ ॥ मदिराछंद ॥ रामकोकामकहारिपु-
जीतहिंकौनकबैरिपुजीत्योमहा । बालिबलीछलसोंभृगुनंदन
गर्वसहोद्विजदीनमहा ॥ दीनसोक्योंछितिक्षत्रहत्योबिनप्राण-

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( १६६ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
निहैहयराजकियो । हैहयकौनवह्रैबिसरचोजनखेलतहीतुलैं
बांधिलियो ॥ १२ ॥
टी०-जा स्त्रीके संग राज्याभिषेक होइ सो देवी कहावै ॥ "देवी कृताभिषेका-
यामित्यभिधानचिंतामणिः"॥१०॥ कल्पांतके अंतमें ब्रह्मा सृष्टि रचत हैं विष्णु
रक्षा करत हैं सो ताहि कहे लोक सृष्टिको औ देवेश इन्द्र औ विष्णु औ ब्रह्मादि
दै जे देव हैं तिन्हें रुद्र जे महादेव हैं ते भू जो भौंहहै ताके भंगही टेढ़ी करनेहीसों
संहारकालमें संहारकरि डारत हैं ॥ ११ ॥ छत्र कहे छत्रवर्णः ॥ १२ ॥
मू०-अंगद-विजयछंद ॥ सिंधुतरयोउनकोबनरातुमपैध-
नुरेखगईंतरी । बांध्योइबांधतसोनबँध्योउनबारिधिबांधिकै
बाटकरी ॥ अजहूँरघुनाथप्रतापकीबाततुन्हेंदशकंठ Santana जानिप-
री। तेलनितूलनिपूंछिborder/जरीनजरीजरीलंकजराइपरी ॥ १३ ॥
मेघनाद् ॥ छांडिदियोहमहींवनरावहपूंछकीआगनलंकज री ।
भीरमेंअक्षमत्र्योचपिबालकवादिहिंजाइप्रशास्तिकरी ॥ ताल
बिंधेअरुसिंधुबँधेयहचेटकविक्रमकौनकियो । बानरकौनरकौ
वपुरापलमँसुरनायकबांधिलियो ॥ १४ ॥
टी०-बांध्योई कहे हनुमानको बंधन तुम काहूविधिसों करिबोहू करचौ ताहू
पर बांधत ना बन्यौ तेल औ तूल कहे रूईयुक्त जो वस्तु होतिहै सो विशेष जरति
है सो या प्रकारकी पूंछ तुम करी सो ना जरी औ केवल सुवर्ण औ रत्ननमें अग्नि
प्रज्वलित नहीं होति परंतु तुम्हारी लंका तृणादि रहित केवल रत्नादिके जरायमों
औौ जरत भई रामके प्रभावसों ऐसी अनहोनी बातें होंती हैं ताहूपर तुम्हें नहीं
जानि परत इतिभावार्थः ॥ १३ ॥ वादि कहे वृथा प्रशास्ति कहे स्तुति सप्तताल
बेध्यो औ सिंधु बांध्यो यह चेटक कहे भगरविद्या है सरस्वती उक्तार्थः ॥ जो
रामचन्द्र तालवेधन सिंधुबंधन करचौ सो तो चेटक कहे भगर विद्यासम है अर्थ खेल
समहै यामें कौन विक्रम कहे अतिबल कियौहै ॥ "विक्रमस्त्वतिशक्तिता इत्यमरः” ॥
अर्थ वै चाहें तौ त्रैलोक्यको संहार करिदारें सिंधुबंधादि सदृश कर्मनमें उनको
कौन श्रम है ऐसे प्रबल वे ना होते तौ जिन हम पलमें सुरनायकको बांधि लियो
ते बानर औ नरको वपुरा है जाते अर्थ हम इंद्र लोकादिमें जाइकै इन्द्रादिको

षोडशप्रकाशः १६. ( १६७ )

जीत्यौ औ वै हमपर चढ़ि आये हैं हम वपुगसम कछु करि नहीं सकत अथवा वपुरा
समुझि हमपर चढ़िआये हैं ॥ १४ ॥
मू०-अंगद ॥ चेटकसोंधनुभंगकियोप्रभुरावरेकोअतिजीर-
नहो । बाणसमेतरहपचिकैतुमजासपैंनतज्योथलुहो ॥ बाण
सुकौनबलीवालिकेसूतवैबलिबावनबांधिलियो। ओइसोतौजिन
कीचिरचेरिननाचनचाइकैकैछांडिदियो ॥१५॥ रावण ॥ नील
सुखेनहनू उनकेनलऔरसबैकपिपुंजतिहारे । आठहु आठदिशा
बलिदैअपनोपदुलैपितुजालगिमारे ॥ तोसेसपूतहिजाइकैकैवालि
अपूतनकीपदवीपगुधारे । अंगदसंगलेमैरो सबैदलआजुहिक्यों
नहैनवपमारे ॥ १६ ॥ दोहा ॥ जोसुतअपनेबापको, बैरनलेइ
प्रकाश । तासोंजीवतहीमरचो, लोगकहैंतजि त्रास ॥ १७॥
टी०-कवित्तमें उक्ति मेघनादकी है औ जवाब रावणको अंगद दियो ता
जवाबहीसों या जानो कि रामचन्द्र सिंधुबंधनादि मम शंभु धनुषभंग चेटकहीसों
कियो है यह बात रावण कह्यो है अंगद कहत हैं कि प्रभु जे रामचन्द्र हैं तिन
चेटकसों धनुष भंग कीन्हौं औ तुम कहत हौ कि जीरण कहे पुरानो रहै परन्तु
तुमको पुरानो तो रहै पै बाणसमेत तुम पश्रम करि पचिकै कहे थकि कै
रहिगये ताहूपर थलहू ना छांडयो अर्थ रंच ना उठयों ॥ १५ ॥ नील, सुखेने,
हनूमान औ सुग्रीव औ राम लक्ष्मण औ विभीषण ये जे आठ हैं [अस्पष्ट]
नील सुखेनादि चारि वानर उनके सुग्रीवके हैं ते वालिके भयसों भागि रहे तब
संगरहे यासों या जनायो कि जो रामचन्द्र आज्ञाहूं करें औ तिनहीकि मोहसों तिनहीं
वै तिहारो राज्य न दियो चाहैं तौ सब वानर तेरेई साथी है हैं तासों तू आठहूं
आठ दिशा बलिद जे रामचन्द्र हैं आठ दिशनके आठ जो इन्द्रादि दिक्पाल हैं ते
हैं बलिदकहे भेंटक दाता जिनके अर्थ इन्द्रादि दिक्पाल जिनकर भेंट देतहैं तिनहीं
सों आपनो पद जो राज्यहै ताको ले जाके लिये सुग्रीव तिहारे पितुको मारिडारचो
है काहेते राज्य तिहारे पिताको है रामचन्द्र मर्यादापुरुषोत्तम हैं जो तू कहिहै तौ
तोकों विशेष देहं । “बलिदैत्योपहारयोरित्यभिधानचिन्तामणिः” ॥ बापमारे कहे
जो तेरे बापको मारचो है ॥ १६ ॥ १७ ॥

मू०-अंगद॥इनकोबिलगुनमानिये,क‍हिकेशवपलआधुपानी
पावकपवनप्रभु, ज्योंअसाधुत्योंसाधु॥१८॥रावण॥द्रुतविलंबि
तछंद॥ उरसिअंगदलाजकछूगहौ।जनकघातकवातवृथाकहौ॥
सहितलक्ष्मणरामहिंसंहरौ। सकलवानरराजतुम्हेंकरौ ॥१९॥
टी०-बिलगु कहे द्वेष साधु कहे भलो असाधु कहे बुरो ॥ १८ ॥ जनक
पिता सरस्वती उक्तार्थः ॥ हे अंगद तुम रामचन्द्रसों मिलिबेकों हमकों कहत हौ
यामें तुमको कछु लाज नहीं होत ऐसी बात कहि कछु लाज तौ उरमें गहौ काहेते
कि तुम्हारे जनक बालि तिनके जे घातक रामचन्द्र हैं तिनकी बात वृथा है यह तुम
कहौ अर्थ रामचन्द्रकी बात वृथा नहीं होति जो मनमें संकल्प करतहैं सो करिबोई
करत हैं यासों या जनायो कि अति बली बालिके वध करिबेको संकल्प कियो सो
वध करिबोई कियो तैसे वै तो हमारे मारिबेको संकल्प करै हैं यह संकल्प वृथा काहू
उपायसों न ह्वै है तासों मैं लक्ष्मण सहित रामहिसों संहरौं कहे संहारनाशकों प्राप्त
होत हौं अर्थ लक्ष्मण सहित राम मोहिं मारतहीहैं नहीं तो ऐसो हित सीख तुमको
दियो है जासों सब वानरनको राजा तुमको करौं अर्थ सुग्रीवसों छोरि तुम्हारो
राज्य तुम्हें देऊँ अथवा जनकघातक जे सुग्रीवहैं तिनकी बात वृथा कहत हौ
अर्थ जो तुम्हारे पिताको मारचो ताकी तुम बड़ाई वृथा करत हौ मैं लक्ष्मण सहित
राम करिकै संहरौं कहे नाश कों प्राप्त होत हौं नहीं तो सुग्रीवको मारि सब वान-
रनकौ राजा तुमकों करौं ॥ १९ ॥
मू०-अंगद-निशिपालिकाछंद ॥ शत्रुसबमित्रहमचित्तपाहिं
चानहीं । दूतविधिनूतकबहूंनउरआनहीं ॥ आपुमुखदेखि
अभिलाषअभिलाषहू । राखिभुजशीशतबऔरकहँराखहू
॥ २० ॥ रावण-इन्द्रवज्राछन्द ॥ मेरीबड़ीभूलसोकाकहौंरे ।
तेरोकह्योदूतसबैसहैंरे ॥ वैजोसबैचाहततोहिंमारचो । मारों
कहातौहिंजो दैवमारचो ॥ २१ ॥ अंगद-उपेन्द्रवज्राछन्द ॥
नराचश्रीरामजहींधरैंगे। अशेषमाथेकटिभूपरैंगे ॥ शिखाशि-
वाश्वानगहैंतिहारी । फिरैंचहूँवोरनिरैविहारी ॥ २२ ॥

षोडशप्रकाशः १६. ( १६९ )

टी०-तुम्हारी जो यह नूतन कहे नवीन दूतविधि कहे दूतता तोर फोर है ताको
कबहूं न उरमें आनि हैं पाइ है ॥ २० ॥ २१ ॥ नराच वान निगैंविहारी राव-
णको संबोधन है अथवा शिवा औ श्वान औ और जे निगैविहारी काकादि हैं ते
तिहारी शिखा गहे तिहारे शिरको लिये फिरेंगे ॥ २२ ॥
मू०-रावण भुजंगप्रयातछन्द ॥ महामीचुदासीसदापाईँ-
धोवै । प्रतीहारहै कै कृपाशूरसोवै ॥ क्षपानाथलीनहेरहैछत्र-
जाको । करैगो कहाशत्रुसुग्रीवताको ॥ २३ ॥ सकामेघ-
माला शिखीपाककारी । करैकोतवालीमहादंडधारी ॥ पढ़ैवेद
ब्रह्मासदाद्वारजाके । कहाबापुरोशत्रुसुग्रीवताके ॥ २४ ॥
टी०-अंगदकहो कि श्रीराम बाण धरिकै तुमको मारिहैं ताको उत्तर रावण
दियो कि महामीचुजो है सो मेरे सदा पाईं धोइवेके अर्थ दासीहै याते अति
न्यूनदासी जनायो एकशत एक मीचु हैं तामें शत अकालमीचु हैं एक महामीचु
है शतमीचु उपायोंसों दूरि होती हैं एक महामीचु काहू उपायोंसों नहीं मिटति ।
यथा भावप्रकाशे “एकोत्तरं मृत्युशतमथर्वाणः प्रयच्छते । तत्रैकः कालसंयुक्तः
शेषास्त्वागंतवः स्मृताः” । यामों या जनायो कि युद्धादिमें मरिबो तो अकाल-
मृत्यु है सो मेरे समीप कैसे आइ है ॥ २३ ॥ सका कहे सक्का पाककारी रसों-
ईदार ॥ २४ ॥
मू०-अंगद-विजयछन्द ॥ पेटचढ़्योपलनापलिकाचढ़िपा-
लकिहूचढ़िमोहमढ़योरे । चौकचढ़्योचित्रसारीचढ़्योगजवा-
जिचढ़योगढ़गर्बचढ़योरे । व्योमविमानचढ़्योईसहाकलिनि-
वसोंकबहूंनपढ़योरे । चेततनाहींरह्योचढ़िचित्तसोंचाहतमूढ़
चिताहूचढ़योरे ॥ २५ ॥
टी०-प्रथमहिं पेटमें चढ्यो कहे गर्भमें आयो जब जन्म भयो तब पलनामें
चढिकै झूल्यो कछू और बडो भयो पलिका जो खट्टा है तामें चढि सोवन
लाग्यो औ जब व्याह भयो तब पालकीमें चढि व्याहने चल्यो तब मोह जो
माया है तामें मढ्यो कहे युक्त भयो फेरि पाणिग्रहणमें चौकमैं चढ्यो फेरि
स्त्रीके संग चित्रसारीमें चढ्यो फेरि राजा हैकै गजवाजिमें चढ्यो औ गढपर

( १७० ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
चढ्यो औ गर्वपर चढ्यो अर्थ राज्याभिमान भयो औ जेहि कहे जाते अर्थ जाकी
कृपासों व्योममें विमानन पर चढ्योई रह्यो अर्थ पुष्पकादि विमानन पर चढ्यों
आकाश आकाश फिरत रह्यो केशव कहत हैं कि सो जो वह प्रभु रामचन्द्र हैं
ताकों कबहूं न पढ्यो अर्थ राम नाम कबहूं न जप्यो सो हे मूढ ! अब चिताहू
पर चढ्यो चाहत हैं ताहू पर तेरी चित्त चढि रह्यो हैं कहे मत्त है रह्यो है तामें तू
चेतत नहीं अर्थ चेत नहीं करतो चिताहूमें चढ्यो चाहत है यह कहि या जनायो
कि रामचन्द्र तोहि शीघ्रही मारि हैं तासों उनके शरणमों जाइकै आपनो
भलो करु ॥ २५ ॥
मू०-रावण-भुजंगप्रयातछंद ॥ निकारयोजोमैं पालियोरा-
जजाको । दियोकाढिकैजूकहात्रासताको ॥ लियेबानराली-
कहौंबाततोसों। सोकैसेलरैरामसंग्राममोसों ॥ २६ ॥ अंगद-
बिजयछन्द ॥ हाथीनसाथीन

यहाँ पृष्ठ के पाठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण (Markdown/देवनागरी) प्रस्तुत है:

षोडशप्रकाशः १६. ( १७१ )
ताकी आली कहे समूह अर्थ जिनमें अनि अग्नि है ऐसे बाण लिये हैं अथवा र
कहे तीक्ष्ण जे बाण हैं तिनकी आली कहे पंक्तिसमूह इनि तिनको लिये हैं सो
रामचंद्रके संग्राममों मोसों कहे हम ऐसो प्राणी कैसे जुरै अर्थ हम उनके युद्ध
करिवे लायक नहीं हैं। 'रस्तीक्ष्णे दहने इत्यभिधानचिंतामणिः।' 'पुस्यालिविश-
दाशये त्रिषु स्त्रियां पश्यायां सेतौ पंक्तौ च कीर्तिता' इत्यभिधान चिंतामणिः॥२६॥
वित्त धन ॥ २७॥
मू०-रावण-भुजंगप्रयातछंद॥ डरैगायविप्रैअनाथैजोभाजै।
परद्रव्यछोडैपरस्त्रीहिलाजै॥ परद्रोहजासों नहोवैग्तीको। मुकैसै
लरैवेषकीन्हैयतीको॥२८॥ दोहा॥ गेंदकरेउमैंखेलको, हरगिरि
केशौदास। शीशचढायेआपने, कमलसमानसहास॥ २९ ॥
टी०-जे रामचन्द्र गाय औ विप्रको डगत हैं अथ अतिदीन गाय औ विप्र
तिनहूँको डरात हैं तासों अति कादरहैं औ अनाथ जे प्राणी हैं जिनकी नाथ
कोऊ नहीं है ताहीको भजै कहे सेवन करत हैं अर्थ ताहीसों संग करत हैं यामों या
जनायो कि भयसों रंचकहूँ परद्रव्य नहीं लै सकत हमारो राज्य कैसे लें हैं औ पर
स्त्रीको लजातहैं यासों या जनायो कि जे स्त्रीको लजात हैं ते वीरनसों कहा
धृष्टता करि हैं औ जिनमों परद्रोह कबहूं रत्तीहूभरीनाहीं हैं सकत आशय कि शत्रुता
करते डगतहैं औ ताहूपर वेष यती तपस्वीकी घरेहैं अर्थ वेषहू वीरको नहीं है सो
मोसों कैसे लरि हैं सरस्वती उक्तार्थः-मर्यादा पुरुषोत्तम हैं तासों ब्रह्मशाप गोशापको
डेरातहैं भृगु लातहू मारचो ताहू पर कछू ना करचो अनाथ जे प्रह्लाद सम्भादि हैं
तिनके निकट ही रहे जा भांति कष्ट भयो ताही विधि निकट वर्गी...
औ परद्रव्य परस्त्री हरनमें पाप होत है तासों त्याग करत हैं औ परद्रोह कासों
रत्तीहूभरि नाहीं होत यासों समदर्शी जानां सबको समान हैं तिनसों हम कैसे
लरैं अर्थ वै ईश्वर हैं वेष कहे रूप मात्र यती को कीन्हे हैं ॥ २८॥२९॥
मू०-अंगद-दंडक ॥ जैसोतुमकहतउठायोएकगिरिवरऐसे
कोटिकपिनकेबालकउठावहीं। काटेजोकहतशीशकाटतघनेरे
घाघभगरकेखेलेकहाभटपदपावहीं ॥ जीतयोजोसुरेशरणशा-
पऋषिनारिहीकोसमुझहुहमद्विजनातेसमुझावहीं । गहौराम
पायँसुख पाइकैरंतपी तप सीताजूको देहु देव दुंदुभी बजा-

( १७२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।

दर्दी ॥३०॥ रावण-वंशस्थछंद॥ तपीजपीबिप्रनिछिप्रहीहरौं ।
अदेवद्वेषीसबदेवदंसहरौं ॥ सियानदेहौंयहनेमजीधरौं । अमा-
नुषीभूमिअवानरीकरौं ॥३१॥ अंगद-विजयछंद ॥ पाहनते
पतिनीकरिपावनटूककियोहरको धनुको रे। छत्रबिहीनकरे
क्षणमेंक्षितिगर्वहर्यौतिनकेबलको रे ॥ पर्वतपुंजपुरैनिकेपात
समानतरेअजहूंधरको रे । होइँनरायणहूँपै नयेगुणकौनईहां
नरवानरको रे ॥ ३२ ॥ रावण-चंचरीछंद ॥ देहिंअंगदरा-
जतोकहंमारिवानरराजको।बांधिदेहिंबिभीषणै अरुफोरिसेतुस-
माजको ॥ पूंछजाराहंअक्षरिपुकीपाइंलागहिंरुद्रके । सीयकोत-
वदेहूरामहिंपारजाइंसमुद्रके ॥ ३३ ॥
टी०-घाघ कहे नटादि इंद्रजालिका॥ ३०॥ सरस्वती उक्तार्थः-हे अंगद !कहै केशव
हौं कि तपी औ जपी जे विप्रहैं अथवा तपी औ जपी औ विप्रनको छिमहीं हरौं
कहौं कि तपी औ जपी जे विप्र हैं अथवा तामें कछूविचार नहीं करत औ अदेव
जे दैत्य जे राक्षस हैं तिनके द्वेषी शत्रु देवता हैं तिन्हें छिमहीं संहरत हौं कहे मारतहौं
यासों हौं बडो पापीहौं सो सियाको न देहौं यह नेम जो जीमें धरतहौं सो अब कहे
या समयमों अमानुषी कहे नाहीं हैं मानुष्य जहां औ अनरी कहे नाहीं हैं कोऊ
काहू को अरि शत्रु जहां ऐसी जो भूमि कहे स्थान है विष्णुलोक ताको करों कहे
साधत हौं । 'भूमिः क्षितौ स्थानमात्रे' इति अभिधानचिंतामणिः । ब्रह्मदोष देव-
दोषादि बडे पातकनसों छूटिबेको उपाव और नहीं है तासों सीताको नहीं देतो
कि सीताके लिये आइकै रामचंद्र मोहिं मारिहैं तौ सब पातकनसों छूटिकै
विष्णुलोक जैहौं इति भावार्थः ॥ ३१ ॥ अजहूं कहे अबहूं अर्थ एतेहूपर तौ
धरकौ कहर करौ ॥ ३२ ॥ सरस्वती उक्तार्थः यामें प्रहस्तादि मंत्रिनप्रति का-
कोक्ति है रावण कहत है कि हे अंगद ! तुम तौ नीकी शिष देतहौ परंतु प्रह-
स्तादि मंत्रिनकरि दी कर्मवश मेरी ऐसी दुर्मति है कि जब रामचंद्र येती बातें
करें तब सीताको देहुं सो ऐसो काहेको कैहैं तासों दुर्मति कृत हमारी मृत्यु विशेष
सो ह्वै चुको यह निश्चय जानौं ॥ ३३ ॥
मू०-अंगद-लंकालाइगयो बलीहनुमंतसंतनगाइयो ॥ सिंधु
बांधतशोधिकैनलंकछीरछीटबहाइयो । ताहितोहिंसमेतअंधउ-

( १७३ )

खारिहौंउलटीकरौं। आजुराजकहाँविभीषणबैठिहैं तेहितेडरौं॥
॥ ३४ ॥ दोहा ॥ अंगदरावणकोमुकुट, लैकरिउड्योसुजान ।
मनोचलोयमलोकको, दशशिरकोप्रस्थान ॥ ३५ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकायामिन्द्र-
जिद्विरचितायामंगदरावणसंवादवर्णनं नाम षोडशः प्रकाशः ॥ १६ ॥
टी०-क्षीर कहे जल ॥ ३४ ॥ ३५ ॥
इति श्रीमज्जगजननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादायतजानकीप्रसादनिर्मितायां
रामभक्तिप्रकाशिकायां अंगदसंवादवर्णन नाम षोडश प्रकाशः ॥ १६ ॥
मू०-दोहा ॥ सत्रहवेंप्रकाशमें, लंकाकोअवरोध । शत्रुच-
मूवर्णनसमर, लक्ष्मणकौ परबोध ॥१॥ अंगदलैवामुकुटको, परे
रामकेपाइ ॥ रामविभीषणकेशिरसि, भूषितकियोबनाइ ॥ २ ॥
मू०-पद्धतिकाछंद ॥ दिशिदक्षिणअंगदपूर्वनील ॥ पुनि
हनूमंतपश्चिम सुषेण ताल ॥ दिशिउत्तरलक्ष्मणसहितराम । सुग्रीव
मध्यकीन्हेविराम॥३॥ सँगयूथपयूथपवलबिलास । पुरफिरत
विभीषणआसपास ॥ निशिवासरसबकोलेतसोध । यहिभांति-
भयो लंकानिरोध ॥४॥ तबरावणसुनिलंकानिरोध । उपजौत-
नमन अतिप्रचंडक्रोध ॥ राख्योप्रहस्तहठिपूर्वपौरि । दक्षिणहिं-
महोदरगयोदौरि ॥५॥ भयोइंद्रजीतपश्चिमदुवार । हैउत्तरराव-
णबलउदार । कियोबिरूपाक्षथितमध्यदेश । कैरॅनरान्तकच-
हुंचाप्रवेश ॥६॥ प्रमिताक्षराछंद ॥ अतिद्वारद्वारमहँयुद्धभये ।
बहुऋच्छकंचरनलागिगये ॥ तबस्वर्णलंकमहँशोभभई। जनुअ-
ग्निजवालमहँधूममई ॥ ७ ॥
टी०-अवरोध घेरनो औ विभीषणकरि शत्रु जो रावण हैं ताके चमूको वर्णन
है परमोत्कर्ष ॥ १ ॥ २ ॥ रामचंद्रके औ लंकाके मध्यमें सुग्रीव विश्राम
कीन्हे हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ ५ ॥ ६ ॥ छंद उपजातिहै ॥ ७ ॥