रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचदशप्रकाशः १५. ( १५७ )
कहे कहो सरस्वतीउक्तार्थः अरि कहे शत्रुके काजसों लाज तजिकै उठि-
धायो है अर्थ रामचंद्रके हाथ मृत्युसों हमारी मुक्ति है है तामें चाहिये कि
तू भाई है सहाय करै सो तू शत्रुता करत है जामें याकी मुक्ति ना होई
यामें तोंकों लाज हीं है भाई हैकै शत्रुको काम करत है तोकों धिक्
है जो मोहिं समुझावैहै कि रामचंद्रसों न लरौ अथवा मोहि कहे मोहवश है
कै रामको नाम जो न रह्यो ताको तजिकै यह बोल उच्चारयो कहे एती कथा
कह्यौ यह कहिकै पाँय परत विभीषणके शिरमें लात मारयौ ॥ १४ ॥
मू०-करिहायहों गठेदेहसँभोरउ । लियअंगसंगसबमंत्रि-
यचारउ ॥ तजिअंगु दशकंधउडानयो । उररामचंद्रजगतौ-
पतिआन्यो ॥ १५। दोहा ॥ मंत्रिनसहितविभीषण,
बाढीशोभ अकाण ॥ चुअलिआवतभावतो, प्रभुपदपद्म-
निवास ॥ १६ ॥ चौपई निकटविभीषणआवतजाने ।
कपिपतियोंतबहींगुदराने, रघुपतिसोंतिनजाइसुनायो ।
दशमुखसोदरसेवहिआयो १७॥ श्रीराम० ॥ बुधिबलवं-
तसबैतुमनीके । मतसुनिलैँ तिनहीके ॥ तबजोबिचारप-
रैसोइकीजै । सहसाशत्रुन ३ दीजै ॥ १८ ॥ अंगद-
सुंदरीछंद ॥ रावणकोयहसांचउ ६ । आपुबलीबलवंत-
लियेअरु ॥ राकस वंशह मैं हनने १ काज कहातिनसों-
हमसों अब ॥ १९॥ बध्यबिरोध सोंअति । क्योंमि-
लिहैहमसोंतिनसोंमति ॥ रावणक्यौँ इतबहींइन । सी-
यहरीजवहींवहनिर्घुन ॥ २० ॥ नल- चारपठैनकोम-
तलीजिय । ऐसेहिकैसेबिदाकरिदीजिय रखियजोअति-
जानिय उत्तम । नाहिंतौमारियछोड़िसबै २१ ॥
टी०-॥ १५ ॥ १६ ॥ कपि सो बानर हैं तिनके प
गुदराने कहे कहत भये ॥ १७ ॥ १८ ॥ १९ ॥ बध्य वीर हैं तिनसों
करिबे लायक