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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 165, कुल 269 में से

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पृष्ठ 165

पंचदशप्रकाशः १५. ( १५९ )
कहाउजग जौंलगिरामनाम ॥ २७ ॥ तोटकछंद ॥ जबहीं
रघुनायकबाण लियो । सविशेषविशोषितसिंधुहियो ॥
तबहीद्विज रूपसोआइ गयो । नलसेतुरचैयहमंत्रदयो ॥२८॥
दोहा ॥ जहँतहँवानरसिंधुमैं, गिरिगण्डारतआनि ॥ शब्दरह्यो
भरिपूरिमहि, रावणको दुखदानि ॥ २९ ॥ तोटकछंद ॥
उछलैजलउच्चअकाशचढै । जलजोरदिशाबिदिशानमढै ॥
जनुसिंधुआकाशनदीअरिकै । बहुभाँतिमनावतपांपरिकै ॥३०॥
टी०--त्योंहीं कहे तत्कालही मोह कहे दुःख ॥ २६ ॥ २७ ॥ समुद्रतटमें
रामचन्द्र तीन दिन डेरा कियेरहे जब समुद्र राह नहीं दियो तब समुद्रको शोषि-
बेकेलिये कोपकरि रामचन्द्र बाण लियो इति कथा शेषः॥ २८ ॥ २९ ॥ समुद्र-
को जल उछरि आकाशकोचढत है सो मानहू समुद्र पायन परिकै आकाश गंगाको
मनावत है ॥ ३० ॥
मू०-बहुव्योमविमानतेभीजिगये । जलजोरभयेअँगरागम-
ये ॥ सुरसागरमानहुयुद्धजये । सिगरेपटभूषणलूटिलये॥३१॥
अतिउच्छलिंछितिकूटछयो । पुररावणकेजलजोरभयो ॥
तबलंकहनूमतलाइदई । नलमानहुआइबुझाइलई ॥ ३२ ॥
लगिसेजजहांतहँशोभगहे । सरितानिकेफेरिप्रवाहबहे ॥ पतिदे-
वनदीरतिदेखिभली । पितुकेघरकोजनुरूसीचली ॥३३॥सब
सागरनागरसेतुरची । बरणैबहुधायुतशक्रशची ॥ तिलकाव-
लिसीशुभशीशलसै । मणिमालकिधौंउरवेलसै॥३४॥तारक
छंद ॥ उरतेशिवमूरतिश्रीपतिलीन्ही। श्रुतिकेमूलअधिष्ठित
कीन्ही॥इनकेदरशैपरशैपगजोई।भवसागरपारसो होई ३५
टी०-जल जोर भये सो बहुत व्योम आकाशमें देव विमान भीजिगये
कहे जो अंगनमें लग्यो कुंकुमादि लेप है तासों रये कहे पट औ भूषण
बहि आये हैं सो मानो सुर जे देवता हैं तिनको सागर युद्धमें जीत्योंहै सो मानो
लूटि लीन्हों है इहां पटभूषणनको बहि आइबो विषय कहे उपमेय है सो अनुक्त