रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीरघुनाथगनौअसमर्थनदेखिबिनारथहाथिनचोरहि। तोरचो
शरासनशंकरकोजेहिसोवकहातुवलंकनतोरहि ॥८॥ मेघनाद-
दोहा ॥ मोकोंआयसुहोइजो, त्रिभुवनपालप्रवीन ॥ रामसहि-
तसबजगकरौं, नरबानरकरिहीन ॥९॥ विभीषण-मोटनकछंद॥
कोहैअतिकायजोदेखिसकै। कोकुंभनिकुंभवृथाजोबकै ॥ को
हैइन्द्रजीतजोभीरसहै । कोकुंभकर्णहथ्यारुगहै ॥ १० ॥
टी०-जालगि कहे जा लक्ष्मीरूप जे सीता हैं तिनके लिये ॥ ८ ॥ सरस्वती
उक्तार्थः मेघनाद कहत है कि जो मंत्र कहिबेको हमको आज्ञा होइ तौ हम
कहियत है कि त्रिभुवनपाल कहे तीनों लोकके रक्षा करणहार औ प्रवीण कहे
विवेकी यासों या जनायो कि केवल समदृष्टीहीसों नहीं प्रतिपाल करत भक्तन-
पर अतिकृपा शरणागतरक्षण शत्रुनाशादि कर्म यथोचित करत हैं ऐसे जे राम-
चन्द्र हैं तिनहीं करिकै सहित सब जग है अर्थ रामचंद्रही सर्वत्र व्याप्त हैं अर्थ कि
विष्णु हैं यथावृत्तरत्नाकरे ॥ म्यरस्तजन्नौग्लौंतैरेभिर्दशभिरक्षरैः ॥ समस्तं वाङ्-
मयं व्याप्तं त्रैलोक्यमिव विष्णुना ॥ इनको नर औ बानर करिकै हीन करौं कहे
करि मानत हौं अर्थ रामचन्द्र विष्णुहैं वानर सब देवताहैं अंगदहू सोरहे प्रकाशमें
कह्यो है कि। कौनइहांनरवानरकोरे ॥ ९ ॥ १० ॥
मू०-देखेरघुनायकधीररहै । जैसेतरुपल्लवबातबहै ॥ जौ-
लौंहरिसिंधुतरैइतरै । तौलौं सिय लैकिनपाइपरै ॥११॥ जौलौंन-
लनीलनासिंधुतरै । जौलौं हनुमंतनदृष्टिपरे ॥ जौलौनहिं अंगद
लंकदही । तौलौं प्रभुमानहुबातकही ॥१२॥ जौलौनहिं लक्ष्म-
णबाणधरै । जौलौं सुग्रीवनक्रोधकरै॥ जौलौरघुनाथनशीशहरै
तौलौंप्रभुमानहुपाइपरै ॥१३॥ रावण-कलहंसछंद ॥ अरिका-
जलाजतजिकैउठिधायो।धिकतोहिंमोहिंसमुझावनआयो।तजि
रामनामयहवोलउच्चारचो।शिरमांझलातपगलागतमारचो १४
टी०-अर्थ रघुनाथको देखि अतिकायदिकनके काहूके धीर न रहि है ॥
११ ॥ १२ ॥ १३ ॥ रामनामको तजि कहे छोड़ यह बोलु रावण उच्चारयो