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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 160, कुल 269 में से

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पृष्ठ 160

( १५४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मू०-दोहा ॥ याप्रकाशदशपंचमें, दशाशिरकरैबिचार ॥
मिलनबिभीषणसेतुरचि, रघुपतिजैहैंपार ॥ १ ॥
मू०-रावण-गीतिकाछंद ॥ सुरपालभूतलपालहौसबमूल
मंत्रतेजानिये । बहुमंत्रवेदपुराणउत्तममध्यमाधमगानिये ॥
करियेजोकारजआदिउत्तममध्यमाधमभानिये।उरमध्यआनि-
अनुत्तमैजेगयेतेकाजबखानिये ॥२॥ स्वागताछंद ॥ आजुमो-
हिंकरनेसोकहौजू ॥ आपुमांहजनिरोषगहौजू ॥ राजधर्मकहिये
छबिछाये । रामचन्द्रनहिंजौलंगिआये ॥ ३ ॥
टी०-सब महोदरादि जे राक्षस हैं तिनसों रावण कहत है कि तुम सब
सुरपाल जे इंद्रहैं तिनको जो भूतल स्वर्गहै ताके पालनहार हौ अर्थ इंद्रलोकमें
राज्य करचौ है आशय यह कि मंत्रनहीके जोरसों इंद्रको जीति इंद्रलोक अमलयौ
अथवा सुरपाल इंद्र सम भूतलपाल हौ इंद्रको ऐसो राज्य करत हौ सो मूलमंत्र
कहे सिद्धांतमंत्र अर्थ जिनसों शत्रु की पराजय आपनो जय होय ऐसे मंत्र जानिये
कहे जानत हौ वेद पुराणनमें बहुत जे मंत्र हैं तिन्हें उत्तम औ मध्यम औ अधम
नीति प्रकारके वेद पुराणनकारिकै गाइयत है अर्थ वेद पुराण कहत हैं यथा
शास्त्रकी दृष्टिसों अर्थ जैसो शास्त्र कहत हैं ताही विधिसों एक मत ह्वैकै मंत्र
ठहरावै सो मंत्र उत्तम है औ जहां मंत्रीजन अपने मतको मंत्र भिन्न भिन्न कहैं
फिरि राजभयादि कारणोंसों उदासीनतासों एकमत ठहरावैं सो मंत्र मध्यम है औ
मंत्री जो आपनेही अपने मनको मत भिन्न भिन्न कहैं एकमत कैसेहू ना होइ सो
मंत्र अधम है यथा । वाल्मीकीये । ऐकमत्यमुपागम्य शास्त्रदृष्टेन चक्षुषा । मंत्रि-
णो यत्र निरतास्तमाहुर्मंत्रमुत्तमम् ॥ १ ॥ बह्वीरपि मतीर्गत्वा मंत्रिणामर्थनिर्णयः॥
पुनर्यत्रैकतां प्राप्तः स मंत्रो मध्यमः स्मृतः ॥२॥अन्योन्यं मतिमास्थाय यत्र संप्र-
तिभाष्यते । नचैकर्मण्यश्रेयोस्ति मंत्रः सोधम उच्यते ॥ ३ ॥ तिन तीनहूं प्रका-
रके मंत्रनमें आदि उत्तम जो कारज है ताको करिये अर्थ एक मत ह्वै कारज
करिये औ मध्यम औ अधमको भानिये कहे दूरि करो ऐसे समयमें जे अनुत्तम
काज व्यतीत ह्वैगये अर्थ आपनेहीं अपने मनकी सब मिलि कह्यो तिन बात-
नको उरमें आनिकै बखानिये कहे कहत हौ अर्थ ऐसे समयमों ऐसी बात कहिबो
उचित नहींहै तासों एकमत ह्वै मंत्र करौ ॥ १ ॥ २ ॥ ३ ॥