रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
्योंसमान । पैतदपिभरत Wait, look atतीन्यों: त+ी+न+्+य+ो+ं=तीन्यों. Wait, look at अरुयदपिअनुजतीन्योंसमान: अरु यदपि अनुज तीन्यों समान । पै तदपि भरत-> printed as: अरुयदपिअनुजतीन्योंसमान । पैतदपिभरत`
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1: त्रयोदशप्रकाशः १३. ( १३९ )
2: लई ॥ ६६ ॥ तोमरछंद ॥ जबलगीसियरीहाथ । यहआगि
3: कैसीनाथ ॥ यहकह्योलोषितबताहि ॥ मणिजटितमुँदरीआहि
भावतनिदान ॥ ७५॥ ज्योंनारायणउरश्रीवसंति । त्योंरघुप-
तिउरकछुद्युतिलसंति ॥ जगतितनैहैंसबभूमिभूप । सुरअसुर
नपूजैंरामरूप ॥ ७६ ॥ सीताजू-निशिपालिकाछंद ॥ मोहिं
परतीतियहिभाँतिनहिं आवई । प्रीतिकहिधोंसुनरबानरनि
क्यों भई ॥ बातसबवर्णिपरतीतिहरित्योंदई । आशुअन्हवा-
इउरलाइमुँदरीलई ॥ ७७ ॥ दोहा ॥ आशुबरषिहियरेहरषि,
सीतासुखदसुभाइ । निरखिनिरखिपियमुद्रिकहि, बरणतिहैं
बहुभाइ ॥ ७८ ॥
टी०-पच्छ जो हैज्ञाति वर्ग तासों विरूप कहे अन्य रूप ॥ ७१ ॥ खेद डर
पाप छल यह छंद छःचरणकोहै तासों गाथा जानो यथा वृत्तरत्नाकरे ॥ "शेषं गाथा-
स्त्रिभिः षड्भिश्चरणैश्चोपलक्षिताः" ॥ माघको दूसरो छंद छः चरणको है ॥ ७२ ॥
॥७३॥ कछु कहे गुणादिकनमें काहूकोलक्षणकहौ ॥७४॥ शक्तसमर्थ ॥७५॥
नपूजेकहेसभ्यता नहीं करत ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ भाइकहेअभिप्राय ॥ ७८ ॥
मू०-पद्धटिकाछंद ॥ यहसूरकिरणतमदुःखहारि । शशिक-
लाकिधौंउरशीतकारि ॥ कलकीरतिसीशुभसहितनाम । करौ
ज्यश्रीयह तजीराम ॥ ७९ ॥ कैनारायणउरसमलसंति । शुभ-
अंकनऊपरश्रीवसंति ॥ वरविद्यासीआनंददानि । युतअष्टाप-
दमनशिवामानि ॥ ८० ॥ जनुमायाअच्छरसहितदेखि । कै प-
त्रीनिश्चयदानिले खि । प्रियप्रतीहारनीसीनिहारि । श्रीरामो-
जयउच्चारकारि ॥ ८१ ॥ पियपठईमानौसखिसुजान । जगभू-
षणकोभूषणनिधान ॥ निजआईहमकोशीषदेन । यहिकिधौं-
हमारोमरमलेन ॥ ८२ ॥
टी०-हमारो तम अंधकार सदृश जो दुःख है ताकी रहनहारी है ताते कैधौं
सूर्य्य की किरण है कल कहे अविघ्न मुद्रिका में राम नाम लिख्यो है औ कीर-
तिहू जा प्राणीकी होति है ताके नाम के साथही रहति है प्रथम ताको नाम
कहि कीरति कही जाति है राज्य श्रीहूको रामचन्द्र छांड़्यो है औ याहू को
छांड़्यो है ॥ ७९ ॥ नारायणके उरमें अंक जो गोदहै तापर श्री बसति है
अथवा अंक कहे श्रीवत्सादि चिह्न पर श्री बसति है मुद्रिकामें श्रीरामोजयति
लिख्यो है तहां रामोजयति इन अंकनके ऊपर श्रीअंक लिख्यो है शिवा पार्वती
पक्ष अष्टापद कहे पशु पशुपदते सिंह अथवा वृषभ जानौ । “चामीकरं जातरूपं
महा रजतकांचने ॥ रुक्मं कार्तस्वरं जाम्बूनदमष्टापदोऽस्त्रियामित्यमरः” मुद्रिका
पद सुवर्ण ॥ ८० ॥ अक्षर विष्णु औ अंक पिय जे रामचन्द्र हैं तिनकी प्रति-
हारिणी चोबदारिनी हैं यामें श्रीरामोजयति लिख्यो है प्रतिहार को नामोच्चार
करिवो धर्म है ॥ ८१ ॥ सखी कैसी है जगके जितने भूषण गहने हैं तिनको
जो भूषण कहे भूषिबो है ताको निधान भांडा है अर्थ अनेक प्रकार सों भूषण
पहिराइवे में चतुर है औ मुद्रिका कैसी है जग भूषण जे रामचन्द्र हैं तिनको
भूषणनको निधान कहे भांडा है अर्थ जब याको रामचन्द्र पहिरत हैं तब अनेक
भूषण पहिरे सम अपना को मानत हैं अथवा जब या मुद्रिकाको धारण करत हैं
तब अनेक भूषण पहिरे समान छबि होति है अथवा जगके जे भूषण गहने हैं
तिनको जो भूषण है सो माताको निधान कहे भांडा है काहेते मोहर है सब
राज्यको व्यवहार मोहरके अंकन सों सही होतहै ॥ ८२ ॥
मू०-दोहा ॥ सुखदा शिखदा अर्थदा, यशदा रसदातारि ।
रामचन्द्रकी मुद्रिका, किधौं परम गुरुनारि ॥ ८३ ॥ बहु बर-
णा सहजप्रिया, तमगुनहराप्रमान । जगमारग दरशावनी,
सूरुज किरण समान ॥ ८४ ॥
टी०-परम गुरुनारि कैसीहै कोमल भाषणादि करिकै सुखदा है औ शिख-
दाता है कि कुलांगननको ऐसो करिवो उचित है सो करौ औ अर्थ जो प्रयोजन
है ताकी दाता है कि स्त्रियनको पतिब्रतसों देवलोक गमन होत हैं यह पतिब्रतमें
देवलोक गमनरूप जो प्रयोजन है ताको देति है औ पतिव्रत साधब करार यश
देति है औ अनेक वचन चातुर्य्यादि रस कहे गुण देति है औ मुद्रिका दर्शन-
सों सुखदा है औ शिख दाताहै काहेते शिक्षा दियो कि धीरज धरौ औ अर्थ प्रयो-
जनकी दाता है काहेते रामचन्द्रको संदेशरूप हमारो प्रयोजन रह्यो ताको
दियो अथवा अर्थ जो ज्ञानहै ताको दाता है औ अतिमूल्याधिक्य सो जाके
पास रहै ताको यश दाता है औरस कहे प्रेमकी दाता है अर्थ रामचन्द्र प्रतिप्रेम
( १४२ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
वढावन हारी है ॥ "शृंगारादौविषेवीर्येगुणेरागेद्रवेरसः ॥ इत्यमरः ॥ ८३ ॥ बहु
वरणा कहे बहुत हैं वरण रंग अक्षर जिनके औ सहज प्रिया दुवौ हैं तमगुण
अंधकार औ अज्ञान सूरज किरण जगके मारग राह देखावत हैं औ मुद्रिकाहू
जगमारग दशावनी है काहेते जहाँ रामचंद्र हैं तहांकी राह देखायो जा मारग
हैं हमारो मन रामचंद्रके निकट गयो दोहा क्षेपक है ॥ ८४ ॥
सू०-दोहा-श्रीपुरमेंवनमध्यहों, तुमगकरीअनीति। कहिसुँ-
दरीअबतियनकी, कोकरिहैपरतीति ॥ ८५ ॥ पद्धटिकाछंद॥
कहि कुशलमुद्रिकेरामगात । पुनिलक्ष्मणसहितसमानतात ॥
यहउत्तरदेतिनबुद्धिवंत ॥ केहिकारणधौंहनुमंतसंत ॥ ८६ ॥
हनूमान-दोहा ॥ तुमपूंछतकहिमुद्रिकै, मौनेहातियहिनाम ॥
कंकनकीपदवीदई तुमबिनयाकहँराम ॥ ८७ ॥ दंडक ॥
दीरघदरीनबसैंकेशोदासकेशरीज्योंकेशरीकोदेखिबनकरी-
ज्योंकपतहैं । बासरकीसंपतिउलूकज्योंनचितवतचकवाज्यों-
चंदचितैचौगुनोंचपतहैं । केकासुनिब्यालज्योंबिलातजात-
घनश्यामघननकेघोरनजवासोज्योंतपतहैं ॥ भँवरज्योंभवत-
वनयोगीज्योंजगतैरैनिसाकतज्योंरामनामतेरोईजपतहैं॥८८॥
टी०-श्रीजो राज्यश्रीहै तेहिपुरमें अयोध्यामें रामचन्द्रको छोडिदियो औ
बनके मध्यमें हमछाँड्यौ राम हमें तू छोड्यो सो हे सुन्दरी ! कहौ तियनको
अबको परतीतिकारि है अर्थ कोऊ ना करि है ॥ ८५ ॥ ८६ ॥ तुम्हारे
विरह सों रामचन्द्र ऐसे दुर्बल भये हैं जासों याको कंकनके स्थानमों पहिरत हैं
इति भावार्थः ॥ ८७ ॥ सीताजू सों हनुमान कहतहैं कि हे सीता ! तुम्हारे विरह
सों रामचंद्र ऐसी दशाको प्राप्त हैं कि दीरघ दरीन में केशरी जो सिंहहै ताके
समान बसत हैं जैसे सिंह भूमिहीमें सोवत बैठत है कछू सेजादि सुख की इच्छा
नहीं करत तैसे रामचंद्र हैं औ केशरी पदश्लेष है करी कहे हस्ती पच्छ सिंह
जानौ रामपक्ष केशरी केशरी उदीप कहे तासों औ बासर जो दिन है ताकी
संपत्ति कहे लक्ष्मी शोभा इति ताको उलूक जो घूघू पक्षी विशेष है ताके समान
नहीं देखत घूघू को दिनको देखि नहीं परत औ रामचन्द्रको अनेक वस्तु देखि
Here is the complete, line-by-line transcription of the Hindi and Sanskrit text from the page:
त्रयोदशप्रकाशः १३. (१४३)
विरह उद्दीपन होतहै तासों दिनमें इउत नहीं निरखत औ चंद्रमाको देखि
चक्रवाक समान जपत हैं चन्द्रमा विरह उद्दीपन है तासों औ केका जो मोर-
वाणी है ताको सुनि व्याल जो सर्प हैं ताके समान बिलात जातहैं सर्प भक्षनके
भयों रामचन्द्र विरह वर्द्धन भयों ॥ "केकावाणीमयूरस्येत्यमरः" औ घन-
श्याम कहे सजल जे घन मेघ हैं तिनको जो घोर शब्द है तासों जवाँसे सम तपत
हैं जवासे जल वृष्टिसों निज जरिवो जानिकै औ रामचन्द्रके विरहाग्नि ज्वलित
होति है तासों औ वनमें ठौर ठौर भौंरसम भँवत रहत हैं औ जैसे योगीध्यान
धारणादि करत राति बितावत हैं तैसे तुम्हारे वियोग सों विकल जे राम-
चंद्रहैं तिनको रात्रिहू में निद्रा नहीं आवती औ जैसे शाक्त कहे देवीको उपासक
देवीको नाम जपत हैं तैसे राम तिहारोई नाम रात्रि दिन जपत हैं ॥ ८८ ॥
मू०-हनूमान-बारिधरछंद ॥ राजपुत्रियकबातसुनौपुनि ।
रामचन्द्रमनमांहकहीगुनि ॥ रातिदीहयमराproductरजनीजनु ।
यात नानितनजानतकैमनु ॥ ८९ ॥
टी०-दीह कहे बडी जो राति है सो जानो यमराज की जनी कहे किंकरी
है ता राति करिकै कृत जो यातना पीडा है ताको कि हमारो तन जानत है कि
मन जानत है जापै बीतति है अर्थ कहिबे लायक नहीं है अति बडी है औ यम
किंकरन हूं करिकै कृत यातना कहिबे लायक नहीं होति अति कठोर होति है
तासों यमकिंकरी सम कह्यो ॥ ८९ ॥
मू०-दोहा ॥ दुखदेखैसुखहोहिगो, सुखवनदुःखविहीन ।
जैसेतपसीतपतपै, होतपरमपदलीन ॥ ९० ॥ वर्षावैभव
देखिकै, देखीशरदसकाम । जैसेरणमेंकालभट, भेंटिभेंटि-
यतबाम ॥ ९१ ॥ दुःखदेखिकैदेखिहौ, तवमुखआनँदकंद ।
तपनतातपिप्यौसनिशि, जैसेशीतलचन्द ॥ ९२ ॥ अपनी-
दशाकहाकहौं दीपद्दशासीदेह । जरतजातिबासरनिशा, केशव
सहितसनेह ॥ ९३ ॥ सुगति सुकेसिसुनैनिसुनि, सुमुखि-
सुदंतिसुश्रोणि । दरशावैगोबेगिही, तुमकोसरसिजयोनि
॥ ९४ ॥ हरिगीतछंद ॥ कछुजननिदेपरतीतिजासोंरामच-
( १४४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
न्द्रहिआवैं । शुभशीशकीमणिदईयहकहि सुयशतवजगगा-
वैं ॥ सबकालहैहौं अमर अरु तुमसमरजयपदपाइहौ । सुत
आजुतेरघुनाथकेतुमपरमभक्तकहाइहौ ॥ ९५ ॥
टी०--तुमको हमारे विरह कृत जो दुःखहै ताके अनन्तर मिलापरूप सुख है है
इति भावार्थः॥ ९० ॥ वैभव ऐश्वर्य जैसे वर्षा बिताई शरदको भेट्यो तैसे रावणा-
दिकनको मारि तुमको भेटिहैं इति भावार्थः ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ और अपनी दशा
कहा कहिये तुम्हारे स्नेह प्रेम सहित जो देह है सो स्नेह तैल सहित दीप दशा
कहे दीपकी बाती सम बासर निशा कहे रातोंदिन जरतजातिहै ॥ ९३ ॥ सुन्दर
है श्रोणि कहे कटि जाकी । “कटि श्रोणीककुद्मतीत्यमरः ॥” सरसिजयोनि ब्रह्मा
तुमको मोहिं दर्शावैगो मोहिं इति शेषः ॥ ९४ ॥ ९५ ॥
मू०-करजोरिपगपरितोरिउपबनकोरिकिंकरमारियो । पुनि
जंबुमालीमंत्रिसुतअरुपंचमंत्रिसंहारियो ॥ रणमारिअक्षकुमार
बहुबिधिइंद्रजीतसोंयुद्धकै । अतिब्रह्मशस्त्रप्रमाणमानिसोबश्य
भोमनशुद्धकै ॥ ९६ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचंद्रिकाया-
मिन्द्रजिद्विरचितायांहनूमद्बंधनंनामत्रयोदशः प्रकाशः ॥ १३ ॥
टी०-जंबुमाली प्रहस्तनामा मंत्रीको पुत्र है यथा वाल्मीकीये ॥ संदृष्टो राक्षसेन्-
द्रेण प्रहस्तस्य सुतो बली ॥ जम्बुमाली महादंष्ट्रो निर्जगाम धनुर्द्धरः ॥ १ ॥ पुनः
पंचमंत्रिणउक्ताः वाल्मीकीये ॥ सविरूपाक्षयूपाक्षौ दुर्द्धर्षं चैव राक्षसम् । प्रघसम्भ्रास
कर्णं च पंच सेनाग्रनायकान् ॥ ९६ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्रसाद
निर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां त्रयोदशः प्रकाशः ॥ १३॥
मू०-दोहा ॥ याचौदहेंप्रकाशमें, हैहैलंकादाह ॥ सागरती-
रमिलानपुनि, करिहैरघुकुलनाह ॥ १ ॥ रावण-विजयछंद ॥
रेकपिकौनतुअक्षकोघातक दूतबलीरघुनंदनजीको। कोरघुनंदन
रेत्रिशिराखरदूषणदूषणभूषणभूषनभूको। सागरकैसेतरयौजैसेगोपद
चतुर्दशप्रकाशः १४. ( १४५ )
काजकहासियचोरहिदेखौ कैसेबँधायोजोसुंदरितेरीछुईदगसो-
वतपात़कलेखो ॥२॥ रावण-चामरछंद ॥ क्रोरिक्रोरियातना
निफोरिफारिमारिये । काटिकोटिफारिमाँसुबांटिबांटिडारिये ॥
खालखैंचिखैंचिहाडभूनिभूजिखाइरे। पौरिटांगिरुंडमुंडलैउडम्-
द्रजाहुरे ॥३॥ बिभीषण ॥ दूतमारियेनराजराजछोड़िदीजई ।
मंत्रिमित्रपूँछिकैसौऔरदंडकीजई ॥ एकरंकमारिक्यौंबडोकलं-
कलीजई । बूंदसोकिगोकुहामहासमुद्रछीजई ॥ ४ ॥
टी०-मिलान कहे विश्राम ॥ १ ॥ हम तेरी स्त्रीको सोवत में दृग सों छुयो
अर्थ देख्यो ता पातक सों बंधिगये तू रामचन्द्रकी स्त्रीको हरि ल्यायो है
तेरी अतिदुर्गति है है इतिभावार्थः ॥ २ ॥ हनूमानके कठोरवचन सुनि कोप करि
रावण राक्षसन सों कहत हैं क्रोरि क्रोरि कहे करोरि करोरि जे यातना नाना हैं
नखदंतताजनदंडवातादि सों फोरि फोरि कहे जामें चर्म फोरि रुधिर कढि आवै
या प्रकारसों मारि डारो कहूँ ताजनानि पाठ है तौ ताजन कहे चाबुक औखालखैंचै
रोमांचितके कुठारादि सों हाडनके स्थान में काटिकै औ छुरिकादि सों फारिकै
ताको मांस बांटि बांटि डारिये कहे आपनो आपनो भाग करि लीजिये औ हाड
खैंचिके कहे निकारिकै भूनिभूनिकै खाय डारो रुण्ड रुण्डकी पढ़ते रुंडकी खाल
जानो अर्थ यह कि रुण्डकी खालमें तृणादि भरिकै सबके देखिवेके लिये पौरिमें
कहे पुरद्वारमें टांगिदेहु औ मुंडको लैके उड़ाइ कहे उड़िकै राम पास जाउ
रामपासइतिशेषः । जासों मुण्ड चीन्हि रामचन्द्र दूतको मार्यो जानि दुःखपावैं
इतिभावार्थः ॥ ३ ॥ ४ ॥
मू०-तूलतेलबोरिबोरिजोरिजोरिबाससी । लैअपाररारु-
नदूनसूतसोंकसी । पूंछपवनपूतकोसंवारिबारिदीजहीं ॥ अंग-
कोघटाइकैउडाईजातभोतहीं ॥५॥ चंचरीछंद ॥ धामधामनि
आगिकीबहुज्वालमालबिराजहीं। पवनकेझकझोरतेझँझरीझ-
रोखनभ्राजहीं ॥ बाजिबारणशारिकाशुकमोरजोरनभाजहीं ।
छुद्रज्योंबिपदाहिआवतछोडिजातनलाजहीं ॥६॥ भुजंगप्रया-
( १४६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
तछंद ॥ जटीअग्निज्यालाअटासेतहैंज्यों। शरत्कालकेमेघसं-
ध्यासमैज्यों ॥ लगीज्वालधूमावलीनीलराजैं। मनोस्वर्णकी
किंकिणीनागलाजैं ॥ ७॥ लसैपीतक्षत्रीमठीज्वालमानौ। ढके
ओढनीलंकबक्षोजजानौ ॥ जरेजूहनारीचढ़ीचित्रसारी। मनो
चेटकामेंसतीसत्यधारी ॥८॥ कहूँ रैनिचारीगहेज्योतिगाढे।
मनोईशरोषाग्निमेंकामडाढे ॥ कहूंकामिनीज्वालमालानिभौरैं।
तजैंलालसारीअलंकारतोरैं ॥ ९ ॥
टी०-तूलरुई बाससी वस्त्र ॥ ५ ॥ झँझरीके जे झरोखा कहे छिद्र हैं तिनमें
भ्राजहीं कहे शोभित हैं जैसे छुद्रप्राणी जाके पास रहत है ताको कछू विपत्ति-
परै तो सहाय नहीं करत ताको छोडिकै भागत है लजात नहीं है तैसे अग्निदाह-
की जो विपत्तिहै तामें वारणादि सब भागत भये ॥ ६ ॥ नाग कहे हाथी ॥७॥
वक्षोज कुचसम पीत क्षत्रिय हैं ओढनी सम अग्निज्वाल है ॥ ८ ॥ भोरे कहे
भ्रमसों अलंकार स्वर्ण भूषण ॥ ९ ॥
मू०-कहूंभौनरातेरचेधूमछाहीं। शशीसूरमानोंलसैंमेघमा-
हीं। जरैअस्त्रशालाबलीगंधमाला ॥ मिलैअद्रिमानौलगीदाव
जाला ॥ १० ॥ चलीभागिचौहूंदिशाराजधानी। मिलीज्वा-
लमालाफिरैदुःखदानी॥मनोईशबानावलीलाललोलें। सबै-
दैत्यजा यानकेसंगडोलैं ॥ ११ ॥ सवैया ॥ लंकलगाइदईह-
नुमंतबिमान बचेअतिउच्चरुखीहै। छातिफटैंउचटैंबहुधामनि
रानीरटैंपानीपानीदुखीहै॥ कंचनको पबिल्योपुरपूरपयोनिधि-
मेंपसरेतिसुखीहै। गंगहजारमुखीगनिकेशोगिरामिलीमानौ-
अपारमुखीहै ॥ १२ ॥
टी०-शशि कहे श्री जो प्रताप है त्यहिसहित प्रतापरहित सूर्य्यको रंग श्वेत
है प्रतापसहित अरुण है तासों शशि कह्यो अथवा कि शशि कहे चन्द्रमा सहित
मानों सूर्य लसत हैं अर्थ चन्द्रयुक्त सूर्य होते हैं तब सूर्य्यग्रहण होत है सो
चतुर्दशप्रकाशः १४. ( १४७ )
मानो ग्रहण समयमें सूर्य शोभित हैं इत्यर्थः । औ कि मानो सूर्य मेघवनमें
शोभित हैं यथा सिद्धांत रहस्ये 'छादयत्यर्कमिन्दुर्गिति' । सर्पसम शिखैं चन्दन
गंधसम गंधहै ॥ १० ॥ महादेव त्रिपुरका भस्म करिबे को बाण चलायो है ते
बाण दैत्य जाया जे देत्यस्त्री हैं तिनके भागत में तनुमें लागे भस्म कऱ्योहैं
मानो तेईहैं बाणावली सम ज्वाला माला हैं दैत्यजाया सम राक्षसी हैं ॥ ११ ॥
पाच कहे पन्नामणि अथवा पाचि कहे पाकि कै फटे कहे फूटती हैं ते मणि
बहुधा उचटती हैं कहे उछरती हैं गंगको सहस्रमुखी कहे सहस्रधारा ह्वै समुद्रको
मिलीं गुणिकै गिरा जो सरस्वती हैं सो मानो अति सुखी ह्वै कै अपार कहे
अगन्यमुखी ह्वै कै समुद्रको मिली हैं सुवर्णद्रव सरस्वतीके जल समहै ॥ १२ ॥
मू०-दोहा ॥ हनुमतलाईलंकसब, बच्योबिभीषणधाम ॥
ज्योंअरुणोदयबेरमें, पंकजपूरबयाम ॥ १३ ॥ संयुताछंद ॥
हनुमंतलंकलगाइकै। पुनिपूछसिंधुबुझाइकैकै॥शुभदेखिसीतहि
पाँपरे। मनिपायआनँदजीभरे ॥ १४ ॥ रघुनाथपैजबहीगये।
उठिअंकलावनकोभये॥ प्रभुमैं कहाकरणीकरी। शिरपायकीध-
रणीधरी ॥ १५॥ दोहा ॥ चिन्तामणिसोमणिदई,रघुपतिकरह-
नुमंत ॥ सीताजूकोमनरँग्यो, जनुअनुरागअनंत ॥ १६ ॥
टी०-हनुमान करिकै लाई कहे जारी जो जरति सब लंका है तामें बच्यो
जो विभीषणको धाम है सो ज्वालमध्य कैसो शोभित है जैसे पूर्व याम कहे
प्रथम पहर अरुण जे सूर्य हैं तिनके उदयके बेरमें कहीं समयमें पङ्कज कमल
शोभित है जैसे कमल रात्रिको मुकुलित रहत है प्रातही सूर्योदय होत अति
प्रफुल्लित है प्रकाशको प्राप्त होत है तैसें रावणको प्रभावरूपी जो रात्रि है तामें
विभीषणको धाम उदासीन रह्यो सो लङ्कामें रामप्रतापरूपी सूर्योदय सोँ धाम
सम जो अग्नितेज है तामें शोभित भयो पूर्वयाम कहि या जानियो कि ज्यों ज्यों
सूरज सम प्रताप अधिक उदय को प्राप्त ह्वै है त्यों त्यों कमल सम विभीषणको
घर अधिक प्रकाशको प्राप्त ह्वै है इतिभावार्थः ॥ पूर्वयाम यासों कह्यो कि मेघादि
करिकै आच्छादित है मेघनसों कहि तृतीयादि पहरू मे:उदित कहावत है॥१३॥
वाल्मीकीय रामायण में कह्यो है कि, लंक दाहिकै हनुमान पश्चात्ताप करयो है
यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
( १४८ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
कि यामें सीताहू जरि गई हैं हैं तासों फेरि सीताके पास जाइ सीता को शुभ
कहे संकुशल देखिकै मणिसम पाइकै आनन्द जीमें भरत भये जैसे कछु मणि
रत्न पाये आनन्द होत है तैसे भयो ॥ १४ ॥ १५ ॥ १६ ॥
मू०-दोधकछंद ॥ श्रीरघुनाथजबैमणिदेखी। जीमहँभाग
दशासमलेखी ॥ फूलिउठ्योमनुज्योंनिधिपाई। मानहुँअंधसों
दीठिसोहाई ॥ १७॥ तारकछंद ॥ मणिहोहिनहींमनुआ-
हिसियाको। उरमेंप्रगट्योतनुप्रेमदियाको ॥ सबभागिग-
यो जो हुतो तमछायो। अबमैंअपनेमनकोमतपायो ॥ १८ ॥
दरशैहमको बनहीदरशाये । उरलागतिआइबस्याइलगाये ॥
कुछउत्तरदेति नहींचुपसाधी ॥ जियजानतिहैहमकोअपराधी
॥ १९॥ हनुमान ॥ कछुसीयदशाकहिमोहिंनआवै । चर-
काजडबातसुने दुखपावै ॥ सरसोप्रतिबासरबासरलागै ।
तनधावनहींमनप्राणनखागै ॥ २० ॥
टी०-भाग्यकी दशा कहे अवस्था ॥ १७ ॥ प्रिया प्रियके मनसों मनमिले
अति प्रेम प्रगट होत है यह प्रसिद्ध है सो रामचंद्र कहत हैं कि ता मणिको देखि
प्रेमरूपी जो दिया कहे दीपक है ताको तनु कहे स्वरूप ज्योति इति हमारे
उरमें प्रगट भयो तासों यह सीताको मन है जा दीपके प्रगट भये सो हमारे मनमें
जो तम अन्धकार छायो रहै सो सब भागिगयो तो इहां तम पदवै अज्ञान अथवा
वियोग दुःख जानौं ता तमसे हमारे मनको रावण वचनरूप अथवा कर्त्तव्य वस्तु
विचार रूप जो मत हिरानो रहै ताको पायो ॥ १८ ॥ अब यह दर्शायेरूहू कहे
हमारी ओर निहारो यह कहे हू पर हमको नहीं दरशै कहे देखति अर्थ हमारी
ओर नहीं निहारति औ जब बरिआई कहे जबरई अपने हाथनसों उरमें लगाइ-
यत है तब लागति है अपनी ओर सों नहीं लागति ॥ १९ ॥ चर कहे जंगम
मनुष्यादि जड वृक्षादि प्रतिबासर कहे रोज रोज अर्थ निरन्तर वासर जो दिन
है अथवा रागभेद जो रावणके मंदिरनमें नित्य राग होत है सो सीताके शर
कहे बाण सम लागत है सो शरके लागे तनुमें घाव होत है वा शरके लागे
तनमें घाव नहीं होत औ मन औ प्राण में खागै कहे लपटात है अर्थ मन औ
प्राणनको छेदत है "बासरो रागभेदेह्नित्यभिधानचिन्तामणिः" ॥ २० ॥
चतुर्दशप्रकाशः १४. ( १४९ )
मू०-प्रतिअंगनकेसँगहीदिननाशैं। निशिसोंमिलिबाढति
दीहउसासैं ॥ निशिनेकहुनींदनआवतिजानौं । रविकीछबि-
ज्यौंअधरातबखानौं ॥ २१ ॥ घनाक्षरी ॥ भौरनीज्यौं भ्रमत-
रहति बनबीथिकानि हंसिनीज्यौंमृदुलमृणालिकाचहतिहै ।
हरिणी ज्यौहेरतिनकेशरीकेकाननहिंकेकासुनिब्यालीज्यौं-
बिलानहींचहतिहै। पीउपीउरटरतहितिचिनचातकीज्यौंचंद-
चितैचकईज्यौंचुपह्वैरहतिहै । सुनहुनृपतिरामबिरहतिहारेऐ-
सीमूरतिनसीताजूकीमूरतिगहतिहै ॥ २२ ॥
टी०-शरद् ऋतु मों शिशिर पर्यन्त दिनमान घटत है रात्रि मान बाढत है
सो हनूमान शरदऋतु में गये सो लंका जारि कै शरद् मों अथवा हेमन्त मों
रामचन्द्र के पास आयेहैं हैं सो रामचन्द्र सों कहत हैं कि जैसे या समय के
दिन मर्याद कारिकै नाशत कहे घटत हैं तैसे सीताके सब अंग घटत हैं दूबरे
होतहैं औ ज्यों ज्यों निशा बाढति है त्यों त्यों दीह उसास बाढति हैं दूसरो अर्थ
खुल्यो है अधराति मों जैसे रविकी छबि नेक नहीं रहति तैसे सीताको रातिकै
नींद नहीं आवति अधरात कहे अति विनिद्रता जनायो जैसे तुलसीकृतमों
कह्यो है कि। "सिरिस कुसुम कहुं वेधत हीरा' ॥ २१ ॥ भौरनी सम बन
अशोक वाटिकाकी बीथिकानिमें कहे गलिन में भ्रमत रहति है अथवा मन
करिकै बन बीथिकानिमें भ्रमति रहति है तुम्हारा वियोग वनहींमों भयो है
तासों सीता को मन बन बन भ्रम्यो करत है हंसिनी सुखभावसे सीता शीतल
ताकेलिये केशरी सिंह औ कुंकुमहरिणीबधनयमोंसीता बिरहोद्दीपन भयनौं॥२२॥
मू०-सीताजू संदेश-दोहा ॥ श्रीनृसिंहप्रह्लादकी, वेदजोगा-
वतगाय । गयेमासदिनआशुही, झूठौ ह्वैहैनाथ ॥ २३ ॥ आग-
मकनककुरंगके, कहीबातसुखपाइ । कोपानलजरिजायजनि,
शोकसमुद्रबुडाइ ॥ २४ ॥
टी०-नृसिंहरूप ह्वै खंभको फारि निकसि प्रह्लादकी रक्षा करचो यह जो
गाथा वेद गावत हैं सो हम प्रति गवणकृत जे अवधि मास के दिन हैं तिनके
गये कहे बीते आशुही कहे थोरेही दिन मों झूठी है है अवधि दिन बीते रावण
हमको मारि डारि है तब सब कहि हैं कि साक्षात् स्त्री सीता की रक्षा रावण
सों न करवा तो असंबंधी प्रह्लाद की रक्षा कहा करचो है है इति भावार्थः ॥
जे वनकृत अवधि दिन तेरहें प्रकाश में कह्यो है । अवधि दई द्वै मासकी ।
सो जानो अथवा मास दिन कहे एक महीना गये कहे बीते अर्थ एक महीना
के बाद हम प्राण छोड़िदेहूँ वाल्मीकीयमें कह्यो है । “इदंब्रूयाश्चमेनाथं शूरं-
रामं पुनःपुनः । जीवितं धारयिष्यामि मासं दशरथात्मजम् । ऊर्ध्वं मासन्रंजीवेयं
सत्येनाहं ब्रवीमि ते” ॥ २३ ॥ “राजसुता यक मंत्र सुनो अब । चाहत हौं भुव
भार हरचो सब ॥ पावकमें निज देहहि राखहु । छायाशरीर मृगै अभिलाषहु ॥”
या प्रकार राक्षसन को मारि भुवभार हरिवो कह्यो रहै सो बात को या अनल-
में जरन न पावै औ शोकरूपी समुद्र में डूबन न पावे ता बात की रक्षा तुम
को नीके प्रकार सों करिवे है ॥ २४ ॥
मू०-राम-दंडक ॥ सांचोएकनामहरिलीन्हेसबदुःखहरिऔ-
रनामपरिहरिनरहरिठायेहौ । बानरनहींहौतुममेरेबाणरोषसम
बलीमुखशूरबलीमुखनिजगायेहौ।शाखामृगनाहीबुद्धिबलन-
केशाखामृगकैधौंवेदशाखामृगकेशवकोभायेहो । साधुहनुमन्त
बलवंतयशवंततुमगयेएककाजको अनेककरिआयेहौ ॥ २५॥
हनूमान-तोमरछंद ॥ गइमुद्रिकालैपार । मनिमोहिंल्याईवार॥
कहकरचोमैबलरंक । अतिमृतकजारीलंक ॥ २६ ॥
टी०-सीताको संदेश दै कै हमारो सब दुःख तुम हरिलीन्हां ताते हरि यह जो
तुम्हारो नामहै सो सांचो है 'हरतिदुःख मितिहरिः, । अर्थ जो दुःखको हरै सो
हरि कहावै सो तुम नरहरि कहे नृसिंह हौ और नाम जो नर है ताको परिहरि कहे
छोड़ि कै हरि एते नाम सों ठाये कहे युक्त हौ यासों या जनायो कि प्रह्लाद के
समान तुम हमारो दुःख हरचो है अथवा औरजे नामहैं इंद्रादिक तिनको परिहरि
कहे छोडिकै नरहरि कहे नृसिंह यह जो नाम है ताके सम ठाये हौ अर्थ इन्द्रादि-
कनकी समता करिवेलायक तुम नहीं हो विर्कमादि करिकै तुम नृसिंहके समान
हो मेरे बाण को जो रोष क्रोध है ताके समहो अर्थ जैसे हमारे बाणको क्रोध
निष्फल नहीं होत तैसे तुम निष्फल नहीं होते जो काज करिवो चाहौ सो करि
चतुर्दशप्रकाशः १४. ( १५१ )
ही आवो अथवा मेरे बाण के सम हौ औ मेरे रोष के सम हौ कहूं वाण रस
सम पाठ है तौ बाण को जो रस कहे बलहै ताके सम हौ अर्थ जैसे हमारे बाण-
में बल है तैसे तुम्हारे बलहै "शृंगारादौविषेवीर्येद्रवेरागेगुणेशरसः" इत्यमरः। हे बली-
मुख शूर अर्थ बलीमुख जे वानर हैं तिनमें शूर कहे वीरबली जे बलवान हैं
तिनके मुखन करिकै निज कहे निश्चय करिकै गाये हौ अर्थ बड़े बड़े बलवान तुम्हा-
रो बखान करत हैं औ शाखा जे वृक्षशाखा हैं तिनके मृग कहे गामी तुम नहीं
हौ बुद्धि बलनके जे शाखा हैं तिनके गामी हौ अर्थ अनेक बुद्धि बल करि कारज
साधत हौ औ कि वेदकी जे कलाआदि शाखा हैं तिनके मृग कहे गामी हौ
अर्थ वेदाध्ययन मां प्रवीण हो एक काज सीय खोज अनेक काज लंका
दाहादि ॥ २५ ॥ २६ ॥
मू०-अतिहत्योबालकअच्छ । लैगयोबांधिविपच्छ ॥ ज-
ड़वृक्षतोरेदीन । मैंकहाविक्रमकीन ॥ २७ ॥ तिथिविजयदश
मीपाइ ॥ उठिचलेश्रीरघुराइ ॥ हरियूथ यूथपसंग । बिनपच्छ
केतिपतंग ॥ २८ ॥
टी०-विपच्छ कहे शत्रु जो मेघनाद है सो मोहिं बांधि लैगयौ ॥ २७ ॥
शरत्कालमें सीताके ढूंढिबेके लिये वानरनको रामचन्द्र पठायो है औ मास
दिवसकी अवधि दईहै सो समुद्रतटमें अंगद कह्यो है कि। सीय न पाई अवधि
बिताई । तौ शीतकालके माससों अधिक दिन बीते औ अमरकोषमें कह्यो है कि
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( १५२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
राज्यौवलनिबलतिहै । पन्नगपतंगत रुगिरिगिरिराजगजराज
मृगमगराजराजनिदतिहै। जहांत हांडपरपतालपयआइजात
पुरइनिकेसेपातपुहुमीहलतिहै ॥ ३० ॥
टी०-वानरनके संगमें लक्षन ऋच्छ हैं सो वानर औ ऋच्छ कैसे शोभित हैं
जानौं जलधि औ गंगाके तरंग हैं जलधि तरंग सम ऋच्छ हैं गंगतरंगसम बानर
हैं ॥ २९ ॥ रोदसी कहे भू, आकाश “द्यावाभूमी च रोदसीत्यमरः ।” बलनि कहे
वानरयूथनि औ मेव समूहनिकरि दिशि दिशि कहे दशों दिशिनिको बलित कहे
आच्छादित करतितहैं पन्नग-सर्प, पतंग-पक्षी ॥ ३० ॥
मू०-लक्ष्मण ॥ भारकेउतारिबेको अवतरेहौरा मचन्द्रकिधौं
केशौदासभूरिभारतप्रबलदल । टूटतहैं तरुवरगिरेगणगिरिवर-
मूखेसबसरवरसरितासकलजल। उचकिचलतहरिदचकनिद-
चकतमंचैसे मचकत भूत लकेथलथल । लचकिलचकिजातशे-
षकेअशेषफणभागिगईभोगवतीअतलवितलतल ॥ ३१ ॥
गीतिकाछंद । रघुनाथजूहनुमंतऊपरशोभियेतेहिकालजू ।
उदयाद्रिशोभन शृंगमानहुंशुआसूरविशालजू । शुभअंग अंगद
संगलक्ष्मणलक्षियेबहुभांतिजू। जनु मेरुमंदर संगअद्भुतचंद्रराज
तरातिजू ॥ ३२ ॥दोहा ॥ बलसागरलक्ष्मणसहित, कपिसाग-
ररणधीर ॥ यशसागररघुनाथजू, मेलेसागरतीर ॥ ३३ ॥
टी०-भोगवती कहे नागपुरी ॥ ३१ ॥ अंगदके ऊपर शुभ अंग जे लक्षण
हैं तिन्हें रामचन्द्रके संग बहु भांतिसों लक्षये कहे देखियत है मेरु कहे सुमेरुके
शृंगमें कै मंदर कहे मंदराचलके शृंगमें रातिको चंद्र राजत है ॥ ३२ ॥ कपि-
सागर कहे कपिनकी सागर सदृश सेना ॥ ३३ ॥
मू०-विजयाछंद ॥ भूतिबिभूतिपियूषहुकी विषईशसरोरकि-
पार्यवियोहै। हैकिधौंकेशवकश्यपको घरदेव अदेवनकेमनमोहै।
संतहियोकिबसैहरिसन्ततशोभअनन्तकहेकविकोहै। चन्दन
नीरतरंगतरंगितनागरकोउकिसागरसोहै ॥ ३४ ॥ गीतिका
चतुर्दशप्रकाशः १४. ( १५३ )
छंद ॥ जलजालकालकरालमालतिमिगिलादिकसोंबसै । उर
लोभक्षोभविमोहकोहसकामज्यौं खलकोलसै ॥ बहुसंपदायुत
जानिये अतिपातकीसमलेखिये । कोउमांगनोअरुपाहुनोनहीं
नीरपीवतदेखिये ॥ ३५ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकाया-
मिन्द्रजिद्विरचितायांसमुद्रतटरामसैन्यनिवेशनंनाम
चतुर्दशः प्रकाशः ॥ १४ ॥
टी०-ईश कहे महादेव केशरीपच्छ भूति कहे अधिकहै बिभूति कहे भस्मकी
औ पीयूष कहे अमृतकी अमृत युक्त चंद्रमा धारण करे हैं तासों औ विषको
सागर पच्छ भूति कहे उत्पत्ति है बिभूति कहे रत्नादि द्रव्य औ पियूष कहे अमृत
औ विषकी जासों देव अदेव कश्यप के पुत्र हैं तासों पिताको घर पुत्रनको
लाग्योई चाहे औ समुद्रकी दीर्घता देखि देव अदेव मोहित कहे मूर्छित
होत हैं नागर कहे बगर श्रेष्ठ सो चंदनको जो नीर कहे उद्धर है ताके जे तरंग
हैं तासों तरंगित चित्रित हैं अर्थ अंगनमों नीकी विधि चंदन लेप करे है तागर
पच्छ चंदन वृक्ष करिकै नीरके तरंग तरंगित हैं जाके अर्थ जाके तरंगमें चंदन
वृक्ष बहत हैं जो कहो अमृतोत्पत्ति औ हरिशयन क्षीरसागरमों है तो इहां समु-
द्रकी जातिमात्रको वर्णन है लवण क्षीर भेदसों नहीं है सो जानौं ॥ ३४ ॥ जा
समुद्रके जलको जातिल कहे समूह जो है सो कालहूते कराल जे तिमिंगल
मत्स्यभेद हैं तिन्हें आदि जे जलजीव हैं तिनसों कहे तिनसहित बसत हैं अर्थ
जा जलमें तिमिंगिलादि रहत हैं आदि पदते ग्राहादि जानों सो कैसो शोभित
है जैसे लोभ औ क्षोभ कहे डर औ विमोह औ कोह कहे क्रोध औ काम सहित
खलको दुष्टको उर लसतहै औ बहुत संपत्ति रत्नादिसों युक्तहै ताहूपर कोऊ मां-
गनो कहे याचक अर्थ जे रत्नादि लेनेके लिये जात हैं पाहुनो कहे नातो विष्णु
आदि तिनको नीर जल पीवत नहीं देखियत ताते बडे पातकी सम लेखियत है
गोवधादि पाप युक्त बडे पातकीहूको जल अति संपत्तिहूके लोभसों कोऊ नहीं
पीवत इति भावार्थः ॥ ३५ ॥
इति श्रीमज्जगजननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्र-
सादनिर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां चतुर्दशः प्रकाशः ॥ १४ ॥
( १५४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मू०-दोहा ॥ याप्रकाशदशपंचमें, दशाशिरकरैबिचार ॥
मिलनबिभीषणसेतुरचि, रघुपतिजैहैंपार ॥ १ ॥
मू०-रावण-गीतिकाछंद ॥ सुरपालभूतलपालहौसबमूल
मंत्रतेजानिये । बहुमंत्रवेदपुराणउत्तममध्यमाधमगानिये ॥
करियेजोकारजआदिउत्तममध्यमाधमभानिये।उरमध्यआनि-
अनुत्तमैजेगयेतेकाजबखानिये ॥२॥ स्वागताछंद ॥ आजुमो-
हिंकरनेसोकहौजू ॥ आपुमांहजनिरोषगहौजू ॥ राजधर्मकहिये
छबिछाये । रामचन्द्रनहिंजौलंगिआये ॥ ३ ॥
टी०-सब महोदरादि जे राक्षस हैं तिनसों रावण कहत है कि तुम सब
सुरपाल जे इंद्रहैं तिनको जो भूतल स्वर्गहै ताके पालनहार हौ अर्थ इंद्रलोकमें
राज्य करचौ है आशय यह कि मंत्रनहीके जोरसों इंद्रको जीति इंद्रलोक अमलयौ
अथवा सुरपाल इंद्र सम भूतलपाल हौ इंद्रको ऐसो राज्य करत हौ सो मूलमंत्र
कहे सिद्धांतमंत्र अर्थ जिनसों शत्रु की पराजय आपनो जय होय ऐसे मंत्र जानिये
कहे जानत हौ वेद पुराणनमें बहुत जे मंत्र हैं तिन्हें उत्तम औ मध्यम औ अधम
नीति प्रकारके वेद पुराणनकारिकै गाइयत है अर्थ वेद पुराण कहत हैं यथा
शास्त्रकी दृष्टिसों अर्थ जैसो शास्त्र कहत हैं ताही विधिसों एक मत ह्वैकै मंत्र
ठहरावै सो मंत्र उत्तम है औ जहां मंत्रीजन अपने मतको मंत्र भिन्न भिन्न कहैं
फिरि राजभयादि कारणोंसों उदासीनतासों एकमत ठहरावैं सो मंत्र मध्यम है औ
मंत्री जो आपनेही अपने मनको मत भिन्न भिन्न कहैं एकमत कैसेहू ना होइ सो
मंत्र अधम है यथा । वाल्मीकीये । ऐकमत्यमुपागम्य शास्त्रदृष्टेन चक्षुषा । मंत्रि-
णो यत्र निरतास्तमाहुर्मंत्रमुत्तमम् ॥ १ ॥ बह्वीरपि मतीर्गत्वा मंत्रिणामर्थनिर्णयः॥
पुनर्यत्रैकतां प्राप्तः स मंत्रो मध्यमः स्मृतः ॥२॥अन्योन्यं मतिमास्थाय यत्र संप्र-
तिभाष्यते । नचैकर्मण्यश्रेयोस्ति मंत्रः सोधम उच्यते ॥ ३ ॥ तिन तीनहूं प्रका-
रके मंत्रनमें आदि उत्तम जो कारज है ताको करिये अर्थ एक मत ह्वै कारज
करिये औ मध्यम औ अधमको भानिये कहे दूरि करो ऐसे समयमें जे अनुत्तम
काज व्यतीत ह्वैगये अर्थ आपनेहीं अपने मनकी सब मिलि कह्यो तिन बात-
नको उरमें आनिकै बखानिये कहे कहत हौ अर्थ ऐसे समयमों ऐसी बात कहिबो
उचित नहींहै तासों एकमत ह्वै मंत्र करौ ॥ १ ॥ २ ॥ ३ ॥
पंचदशप्रकाशः १५. ( १५५ )
मू०-प्रहस्त ॥ वामदेवतुमकोवरदीन्हो । लोकलोकसिग-
रेशकीन्हो ॥ इन्द्रजीतसुतसोजगमोहै। रामदेवनरवानरको-
है॥४॥ मृत्युपाशभुजजोरनितोरे । कालदंडतुमसोंकरजोरे ॥
कुंभकर्णसमसोदरजाके । औरकौनमनआवतताके ॥ ५ ॥
कुंभकर्ण-चतुष्पदी० ॥ आपुनसबजानतकह्यौनमानतकीजै-
जोमनभावै।सीतातुमआनीमीचुनजानीआनकिमंग्रबतावै॥ जे
हिबरजगजीत्यौसर्वअतीत्यौतासोंकहाबसाई । अतिभूलिगई
तबशोचकरतबजबशिरऊपरआई ॥ ६ ॥ मंदोदरी-विजय-
छंद॥रामकिवामजोआनीचोराइसोलंकमेंमीचुकीबेलिवईजू ।
क्योंरणजीतहुगेतिनसोंजिनकीधनुरेखननांधिगईजू ॥ बीसबि-
सेबलवन्तहुतेजोहुतीदृगकेशवरूपपरईजू।तोरिशरासनशंकरको
पियसीयस्वयंवरक्यौंनलईजू ॥ ७ ॥
टी०-वामदेव महादेव सरस्वती उक्तार्थः ॥ रामचन्द्र देव हैं नर औ वानर
को हैं इहां देव पदते ईश्वर जानौ अर्थ रामचन्द्र ईश्वर हैं औ सुग्रीवादि
वानर सब देवसैन्य हैं ॥ ४ ॥ ५ ॥ बर कहे बल अर्थ तपोबल
अथवा शिवादिके वरमों सब अतीत्यौ कहे बीतो तासों कहा बसाइ कहे
जोर चलै अर्थ विनाशको समय आयो सोई तुमसों ऐसे सीयाहरणादि कार्य
करायो है अथवा जेहि शिव औ ब्रह्माके वरसों जगको जीत्यौ सो वरदान
सब वीतो काहेते कि यह वर दीन रह्यो कि नर वानरनको छोडिकै औरसों
तुमको भय न है है सो और औ वानर ही लरिबेको आवत हैं सो वानरको
प्रभाव तौ कछू यामें चलि है नहीं सो तुमको तब कहे सीयाहरणादि
समयमों यह सुधि भूलि गई कि हमको नर वानरसौं भय है जब शिर ऊपर
आई है तब शोच करत हौ तौ तासों कहा वसाइ कहे जोर चलै अर्थ अब
मृत्युते रक्षाको कछू उपाय नहीं है ॥ ६ ॥ जो तुम्हारो दृगनमों सीतारूप जो
सौंदर्य्य है ता करिकै रई कहे वसी रहे ॥ ७ ॥
मू०-बालिबली नबच्यो बरखोरिहिक्यौं बचिहौ तुम आपनिखो-
रहि।जालगिक्षीरसमुद्रमथ्यौ कहिकै सैन बांधिहैं वारिधितोरहि॥
श्रीरघुनाथगनौअसमर्थनदेखिबिनारथहाथिनचोरहि। तोरचो
शरासनशंकरकोजेहिसोवकहातुवलंकनतोरहि ॥८॥ मेघनाद-
दोहा ॥ मोकोंआयसुहोइजो, त्रिभुवनपालप्रवीन ॥ रामसहि-
तसबजगकरौं, नरबानरकरिहीन ॥९॥ विभीषण-मोटनकछंद॥
कोहैअतिकायजोदेखिसकै। कोकुंभनिकुंभवृथाजोबकै ॥ को
हैइन्द्रजीतजोभीरसहै । कोकुंभकर्णहथ्यारुगहै ॥ १० ॥
टी०-जालगि कहे जा लक्ष्मीरूप जे सीता हैं तिनके लिये ॥ ८ ॥ सरस्वती
उक्तार्थः मेघनाद कहत है कि जो मंत्र कहिबेको हमको आज्ञा होइ तौ हम
कहियत है कि त्रिभुवनपाल कहे तीनों लोकके रक्षा करणहार औ प्रवीण कहे
विवेकी यासों या जनायो कि केवल समदृष्टीहीसों नहीं प्रतिपाल करत भक्तन-
पर अतिकृपा शरणागतरक्षण शत्रुनाशादि कर्म यथोचित करत हैं ऐसे जे राम-
चन्द्र हैं तिनहीं करिकै सहित सब जग है अर्थ रामचंद्रही सर्वत्र व्याप्त हैं अर्थ कि
विष्णु हैं यथावृत्तरत्नाकरे ॥ म्यरस्तजन्नौग्लौंतैरेभिर्दशभिरक्षरैः ॥ समस्तं वाङ्-
मयं व्याप्तं त्रैलोक्यमिव विष्णुना ॥ इनको नर औ बानर करिकै हीन करौं कहे
करि मानत हौं अर्थ रामचन्द्र विष्णुहैं वानर सब देवताहैं अंगदहू सोरहे प्रकाशमें
कह्यो है कि। कौनइहांनरवानरकोरे ॥ ९ ॥ १० ॥
मू०-देखेरघुनायकधीररहै । जैसेतरुपल्लवबातबहै ॥ जौ-
लौंहरिसिंधुतरैइतरै । तौलौं सिय लैकिनपाइपरै ॥११॥ जौलौंन-
लनीलनासिंधुतरै । जौलौं हनुमंतनदृष्टिपरे ॥ जौलौनहिं अंगद
लंकदही । तौलौं प्रभुमानहुबातकही ॥१२॥ जौलौनहिं लक्ष्म-
णबाणधरै । जौलौं सुग्रीवनक्रोधकरै॥ जौलौरघुनाथनशीशहरै
तौलौंप्रभुमानहुपाइपरै ॥१३॥ रावण-कलहंसछंद ॥ अरिका-
जलाजतजिकैउठिधायो।धिकतोहिंमोहिंसमुझावनआयो।तजि
रामनामयहवोलउच्चारचो।शिरमांझलातपगलागतमारचो १४
टी०-अर्थ रघुनाथको देखि अतिकायदिकनके काहूके धीर न रहि है ॥
११ ॥ १२ ॥ १३ ॥ रामनामको तजि कहे छोड़ यह बोलु रावण उच्चारयो
पंचदशप्रकाशः १५. ( १५७ )
कहे कहो सरस्वतीउक्तार्थः अरि कहे शत्रुके काजसों लाज तजिकै उठि-
धायो है अर्थ रामचंद्रके हाथ मृत्युसों हमारी मुक्ति है है तामें चाहिये कि
तू भाई है सहाय करै सो तू शत्रुता करत है जामें याकी मुक्ति ना होई
यामें तोंकों लाज हीं है भाई हैकै शत्रुको काम करत है तोकों धिक्
है जो मोहिं समुझावैहै कि रामचंद्रसों न लरौ अथवा मोहि कहे मोहवश है
कै रामको नाम जो न रह्यो ताको तजिकै यह बोल उच्चारयो कहे एती कथा
कह्यौ यह कहिकै पाँय परत विभीषणके शिरमें लात मारयौ ॥ १४ ॥
मू०-करिहायहों गठेदेहसँभोरउ । लियअंगसंगसबमंत्रि-
यचारउ ॥ तजिअंगु दशकंधउडानयो । उररामचंद्रजगतौ-
पतिआन्यो ॥ १५। दोहा ॥ मंत्रिनसहितविभीषण,
बाढीशोभ अकाण ॥ चुअलिआवतभावतो, प्रभुपदपद्म-
निवास ॥ १६ ॥ चौपई निकटविभीषणआवतजाने ।
कपिपतियोंतबहींगुदराने, रघुपतिसोंतिनजाइसुनायो ।
दशमुखसोदरसेवहिआयो १७॥ श्रीराम० ॥ बुधिबलवं-
तसबैतुमनीके । मतसुनिलैँ तिनहीके ॥ तबजोबिचारप-
रैसोइकीजै । सहसाशत्रुन ३ दीजै ॥ १८ ॥ अंगद-
सुंदरीछंद ॥ रावणकोयहसांचउ ६ । आपुबलीबलवंत-
लियेअरु ॥ राकस वंशह मैं हनने १ काज कहातिनसों-
हमसों अब ॥ १९॥ बध्यबिरोध सोंअति । क्योंमि-
लिहैहमसोंतिनसोंमति ॥ रावणक्यौँ इतबहींइन । सी-
यहरीजवहींवहनिर्घुन ॥ २० ॥ नल- चारपठैनकोम-
तलीजिय । ऐसेहिकैसेबिदाकरिदीजिय रखियजोअति-
जानिय उत्तम । नाहिंतौमारियछोड़िसबै २१ ॥
टी०-॥ १५ ॥ १६ ॥ कपि सो बानर हैं तिनके प
गुदराने कहे कहत भये ॥ १७ ॥ १८ ॥ १९ ॥ बध्य वीर हैं तिनसों
करिबे लायक
( १५८ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
निर्घृण कहे निर्दय ॥ 'कारुण्यं करुणा घृणा इत्यमरः' ॥ २१ ॥ चार कहे
दूत ॥ २१ ॥
मू०-नील० ॥ सांचेहुजोयहहैशरणागत । राखियराजि-
वलोचनमोमत ॥ भीतनराखियतौअतिपातक । होइजोमा-
तुपिता कुलघातक ॥ २२ ॥ हनूमान-हरीलीलाछंद ॥
जानौबिभीषणनराकसरामराज । प्रह्लादनारदबिशारद-
बुद्धिसाज ॥ सुग्रीवनीलनलअंगदजाम्बवाँ । राजाधिराज-
बलिराजसमानसंत ॥ २३ ॥ दोहा ॥ कहननपाई बातसब-
हनूमंतगुणधाम ॥ कह्यौबिभीषण जुही, सबन सुनाइ-
प्रणाम ॥ २४ ॥ सवैया ॥ दयालुकहावतकेशवहौं
अतिदीनदशागह्यौगाढो । रावण अघओघमैंकेशवबूडतहौं
वरहींगहिकाढो । ज्योंगज ग्राहकीकीरतित्योंहींबिभी-
षणकोयशबाढो । आरतबंधु सुनो किन आरतहौं तौ-
पुकारतठाढो ॥ २५ ॥
टी०-जो माता औ पिता औ घात कहूं होय औ भीत है कै आवै
ताको न राखौ तौ बडो पातक जो माता पिता औ कुल घातकको
पातक होत है सोई पातक जो ना राखै ताको होत है ॥ २२ ॥ प्रह्लाद
औ नारदके समान हैं बिशा धृष्ट परिपक्व इति बुद्धिकी साज जिनकी
अर्थ प्रह्लाद नारद सम तु क है ॥ “विशारदः पंडिते च धृष्टे इतिमे-
दिनी” ॥ २३ ॥ २४ कहे बाढो ॥ २५ ॥
मू०-केशवउ सह्यौदुःखपैदासनदेखिसकेनदुखारे ।
जाकोभयोजेहि जहँदुखत्योंहींतहांतिहिभाँतिपधारे ॥
मोरियबारअबु कहूँनाहिंतुकाहुकेदोषबिचारे । बूडतहौँम-
हामोहसमुद्र वतकाहेनराखनहारे ॥ २६ ॥ हरीलीला-
छंद ॥ श्री चंद्रअतिआरतवंतजानि । लीन्होंबोलायशर-
णागतसुनि ॥ लंकेशआउचिरजीवहिलंकधाम । राजा-