रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 153, कुल 269 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशप्रकाशः १४. ( १४७ )
मानो ग्रहण समयमें सूर्य शोभित हैं इत्यर्थः । औ कि मानो सूर्य मेघवनमें
शोभित हैं यथा सिद्धांत रहस्ये 'छादयत्यर्कमिन्दुर्गिति' । सर्पसम शिखैं चन्दन
गंधसम गंधहै ॥ १० ॥ महादेव त्रिपुरका भस्म करिबे को बाण चलायो है ते
बाण दैत्य जाया जे देत्यस्त्री हैं तिनके भागत में तनुमें लागे भस्म कऱ्योहैं
मानो तेईहैं बाणावली सम ज्वाला माला हैं दैत्यजाया सम राक्षसी हैं ॥ ११ ॥
पाच कहे पन्नामणि अथवा पाचि कहे पाकि कै फटे कहे फूटती हैं ते मणि
बहुधा उचटती हैं कहे उछरती हैं गंगको सहस्रमुखी कहे सहस्रधारा ह्वै समुद्रको
मिलीं गुणिकै गिरा जो सरस्वती हैं सो मानो अति सुखी ह्वै कै अपार कहे
अगन्यमुखी ह्वै कै समुद्रको मिली हैं सुवर्णद्रव सरस्वतीके जल समहै ॥ १२ ॥
मू०-दोहा ॥ हनुमतलाईलंकसब, बच्योबिभीषणधाम ॥
ज्योंअरुणोदयबेरमें, पंकजपूरबयाम ॥ १३ ॥ संयुताछंद ॥
हनुमंतलंकलगाइकै। पुनिपूछसिंधुबुझाइकैकै॥शुभदेखिसीतहि
पाँपरे। मनिपायआनँदजीभरे ॥ १४ ॥ रघुनाथपैजबहीगये।
उठिअंकलावनकोभये॥ प्रभुमैं कहाकरणीकरी। शिरपायकीध-
रणीधरी ॥ १५॥ दोहा ॥ चिन्तामणिसोमणिदई,रघुपतिकरह-
नुमंत ॥ सीताजूकोमनरँग्यो, जनुअनुरागअनंत ॥ १६ ॥
टी०-हनुमान करिकै लाई कहे जारी जो जरति सब लंका है तामें बच्यो
जो विभीषणको धाम है सो ज्वालमध्य कैसो शोभित है जैसे पूर्व याम कहे
प्रथम पहर अरुण जे सूर्य हैं तिनके उदयके बेरमें कहीं समयमें पङ्कज कमल
शोभित है जैसे कमल रात्रिको मुकुलित रहत है प्रातही सूर्योदय होत अति
प्रफुल्लित है प्रकाशको प्राप्त होत है तैसें रावणको प्रभावरूपी जो रात्रि है तामें
विभीषणको धाम उदासीन रह्यो सो लङ्कामें रामप्रतापरूपी सूर्योदय सोँ धाम
सम जो अग्नितेज है तामें शोभित भयो पूर्वयाम कहि या जानियो कि ज्यों ज्यों
सूरज सम प्रताप अधिक उदय को प्राप्त ह्वै है त्यों त्यों कमल सम विभीषणको
घर अधिक प्रकाशको प्राप्त ह्वै है इतिभावार्थः ॥ पूर्वयाम यासों कह्यो कि मेघादि
करिकै आच्छादित है मेघनसों कहि तृतीयादि पहरू मे:उदित कहावत है॥१३॥
वाल्मीकीय रामायण में कह्यो है कि, लंक दाहिकै हनुमान पश्चात्ताप करयो है