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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

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पृष्ठ 157

चतुर्दशप्रकाशः १४. ( १५१ )
ही आवो अथवा मेरे बाण के सम हौ औ मेरे रोष के सम हौ कहूं वाण रस
सम पाठ है तौ बाण को जो रस कहे बलहै ताके सम हौ अर्थ जैसे हमारे बाण-
में बल है तैसे तुम्हारे बलहै "शृंगारादौविषेवीर्येद्रवेरागेगुणेशरसः" इत्यमरः। हे बली-
मुख शूर अर्थ बलीमुख जे वानर हैं तिनमें शूर कहे वीरबली जे बलवान हैं
तिनके मुखन करिकै निज कहे निश्चय करिकै गाये हौ अर्थ बड़े बड़े बलवान तुम्हा-
रो बखान करत हैं औ शाखा जे वृक्षशाखा हैं तिनके मृग कहे गामी तुम नहीं
हौ बुद्धि बलनके जे शाखा हैं तिनके गामी हौ अर्थ अनेक बुद्धि बल करि कारज
साधत हौ औ कि वेदकी जे कलाआदि शाखा हैं तिनके मृग कहे गामी हौ
अर्थ वेदाध्ययन मां प्रवीण हो एक काज सीय खोज अनेक काज लंका
दाहादि ॥ २५ ॥ २६ ॥
मू०-अतिहत्योबालकअच्छ । लैगयोबांधिविपच्छ ॥ ज-
ड़वृक्षतोरेदीन । मैंकहाविक्रमकीन ॥ २७ ॥ तिथिविजयदश
मीपाइ ॥ उठिचलेश्रीरघुराइ ॥ हरियूथ यूथपसंग । बिनपच्छ
केतिपतंग ॥ २८ ॥
टी०-विपच्छ कहे शत्रु जो मेघनाद है सो मोहिं बांधि लैगयौ ॥ २७ ॥
शरत्कालमें सीताके ढूंढिबेके लिये वानरनको रामचन्द्र पठायो है औ मास
दिवसकी अवधि दईहै सो समुद्रतटमें अंगद कह्यो है कि। सीय न पाई अवधि
बिताई । तौ शीतकालके माससों अधिक दिन बीते औ अमरकोषमें कह्यो है कि
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