रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
पृष्ठ 154, कुल 269 में से
संदर्भ में पढ़ेंयहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:
( १४८ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
कि यामें सीताहू जरि गई हैं हैं तासों फेरि सीताके पास जाइ सीता को शुभ
कहे संकुशल देखिकै मणिसम पाइकै आनन्द जीमें भरत भये जैसे कछु मणि
रत्न पाये आनन्द होत है तैसे भयो ॥ १४ ॥ १५ ॥ १६ ॥
मू०-दोधकछंद ॥ श्रीरघुनाथजबैमणिदेखी। जीमहँभाग
दशासमलेखी ॥ फूलिउठ्योमनुज्योंनिधिपाई। मानहुँअंधसों
दीठिसोहाई ॥ १७॥ तारकछंद ॥ मणिहोहिनहींमनुआ-
हिसियाको। उरमेंप्रगट्योतनुप्रेमदियाको ॥ सबभागिग-
यो जो हुतो तमछायो। अबमैंअपनेमनकोमतपायो ॥ १८ ॥
दरशैहमको बनहीदरशाये । उरलागतिआइबस्याइलगाये ॥
कुछउत्तरदेति नहींचुपसाधी ॥ जियजानतिहैहमकोअपराधी
॥ १९॥ हनुमान ॥ कछुसीयदशाकहिमोहिंनआवै । चर-
काजडबातसुने दुखपावै ॥ सरसोप्रतिबासरबासरलागै ।
तनधावनहींमनप्राणनखागै ॥ २० ॥
टी०-भाग्यकी दशा कहे अवस्था ॥ १७ ॥ प्रिया प्रियके मनसों मनमिले
अति प्रेम प्रगट होत है यह प्रसिद्ध है सो रामचंद्र कहत हैं कि ता मणिको देखि
प्रेमरूपी जो दिया कहे दीपक है ताको तनु कहे स्वरूप ज्योति इति हमारे
उरमें प्रगट भयो तासों यह सीताको मन है जा दीपके प्रगट भये सो हमारे मनमें
जो तम अन्धकार छायो रहै सो सब भागिगयो तो इहां तम पदवै अज्ञान अथवा
वियोग दुःख जानौं ता तमसे हमारे मनको रावण वचनरूप अथवा कर्त्तव्य वस्तु
विचार रूप जो मत हिरानो रहै ताको पायो ॥ १८ ॥ अब यह दर्शायेरूहू कहे
हमारी ओर निहारो यह कहे हू पर हमको नहीं दरशै कहे देखति अर्थ हमारी
ओर नहीं निहारति औ जब बरिआई कहे जबरई अपने हाथनसों उरमें लगाइ-
यत है तब लागति है अपनी ओर सों नहीं लागति ॥ १९ ॥ चर कहे जंगम
मनुष्यादि जड वृक्षादि प्रतिबासर कहे रोज रोज अर्थ निरन्तर वासर जो दिन
है अथवा रागभेद जो रावणके मंदिरनमें नित्य राग होत है सो सीताके शर
कहे बाण सम लागत है सो शरके लागे तनुमें घाव होत है वा शरके लागे
तनमें घाव नहीं होत औ मन औ प्राण में खागै कहे लपटात है अर्थ मन औ
प्राणनको छेदत है "बासरो रागभेदेह्नित्यभिधानचिन्तामणिः" ॥ २० ॥