रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभावतनिदान ॥ ७५॥ ज्योंनारायणउरश्रीवसंति । त्योंरघुप-
तिउरकछुद्युतिलसंति ॥ जगतितनैहैंसबभूमिभूप । सुरअसुर
नपूजैंरामरूप ॥ ७६ ॥ सीताजू-निशिपालिकाछंद ॥ मोहिं
परतीतियहिभाँतिनहिं आवई । प्रीतिकहिधोंसुनरबानरनि
क्यों भई ॥ बातसबवर्णिपरतीतिहरित्योंदई । आशुअन्हवा-
इउरलाइमुँदरीलई ॥ ७७ ॥ दोहा ॥ आशुबरषिहियरेहरषि,
सीतासुखदसुभाइ । निरखिनिरखिपियमुद्रिकहि, बरणतिहैं
बहुभाइ ॥ ७८ ॥
टी०-पच्छ जो हैज्ञाति वर्ग तासों विरूप कहे अन्य रूप ॥ ७१ ॥ खेद डर
पाप छल यह छंद छःचरणकोहै तासों गाथा जानो यथा वृत्तरत्नाकरे ॥ "शेषं गाथा-
स्त्रिभिः षड्भिश्चरणैश्चोपलक्षिताः" ॥ माघको दूसरो छंद छः चरणको है ॥ ७२ ॥
॥७३॥ कछु कहे गुणादिकनमें काहूकोलक्षणकहौ ॥७४॥ शक्तसमर्थ ॥७५॥
नपूजेकहेसभ्यता नहीं करत ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ भाइकहेअभिप्राय ॥ ७८ ॥
मू०-पद्धटिकाछंद ॥ यहसूरकिरणतमदुःखहारि । शशिक-
लाकिधौंउरशीतकारि ॥ कलकीरतिसीशुभसहितनाम । करौ
ज्यश्रीयह तजीराम ॥ ७९ ॥ कैनारायणउरसमलसंति । शुभ-
अंकनऊपरश्रीवसंति ॥ वरविद्यासीआनंददानि । युतअष्टाप-
दमनशिवामानि ॥ ८० ॥ जनुमायाअच्छरसहितदेखि । कै प-
त्रीनिश्चयदानिले खि । प्रियप्रतीहारनीसीनिहारि । श्रीरामो-
जयउच्चारकारि ॥ ८१ ॥ पियपठईमानौसखिसुजान । जगभू-
षणकोभूषणनिधान ॥ निजआईहमकोशीषदेन । यहिकिधौं-
हमारोमरमलेन ॥ ८२ ॥
टी०-हमारो तम अंधकार सदृश जो दुःख है ताकी रहनहारी है ताते कैधौं
सूर्य्य की किरण है कल कहे अविघ्न मुद्रिका में राम नाम लिख्यो है औ कीर-
तिहू जा प्राणीकी होति है ताके नाम के साथही रहति है प्रथम ताको नाम