रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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त्रयोदशप्रकाशः १३. (१४३)
विरह उद्दीपन होतहै तासों दिनमें इउत नहीं निरखत औ चंद्रमाको देखि
चक्रवाक समान जपत हैं चन्द्रमा विरह उद्दीपन है तासों औ केका जो मोर-
वाणी है ताको सुनि व्याल जो सर्प हैं ताके समान बिलात जातहैं सर्प भक्षनके
भयों रामचन्द्र विरह वर्द्धन भयों ॥ "केकावाणीमयूरस्येत्यमरः" औ घन-
श्याम कहे सजल जे घन मेघ हैं तिनको जो घोर शब्द है तासों जवाँसे सम तपत
हैं जवासे जल वृष्टिसों निज जरिवो जानिकै औ रामचन्द्रके विरहाग्नि ज्वलित
होति है तासों औ वनमें ठौर ठौर भौंरसम भँवत रहत हैं औ जैसे योगीध्यान
धारणादि करत राति बितावत हैं तैसे तुम्हारे वियोग सों विकल जे राम-
चंद्रहैं तिनको रात्रिहू में निद्रा नहीं आवती औ जैसे शाक्त कहे देवीको उपासक
देवीको नाम जपत हैं तैसे राम तिहारोई नाम रात्रि दिन जपत हैं ॥ ८८ ॥
मू०-हनूमान-बारिधरछंद ॥ राजपुत्रियकबातसुनौपुनि ।
रामचन्द्रमनमांहकहीगुनि ॥ रातिदीहयमराproductरजनीजनु ।
यात नानितनजानतकैमनु ॥ ८९ ॥
टी०-दीह कहे बडी जो राति है सो जानो यमराज की जनी कहे किंकरी
है ता राति करिकै कृत जो यातना पीडा है ताको कि हमारो तन जानत है कि
मन जानत है जापै बीतति है अर्थ कहिबे लायक नहीं है अति बडी है औ यम
किंकरन हूं करिकै कृत यातना कहिबे लायक नहीं होति अति कठोर होति है
तासों यमकिंकरी सम कह्यो ॥ ८९ ॥
मू०-दोहा ॥ दुखदेखैसुखहोहिगो, सुखवनदुःखविहीन ।
जैसेतपसीतपतपै, होतपरमपदलीन ॥ ९० ॥ वर्षावैभव
देखिकै, देखीशरदसकाम । जैसेरणमेंकालभट, भेंटिभेंटि-
यतबाम ॥ ९१ ॥ दुःखदेखिकैदेखिहौ, तवमुखआनँदकंद ।
तपनतातपिप्यौसनिशि, जैसेशीतलचन्द ॥ ९२ ॥ अपनी-
दशाकहाकहौं दीपद्दशासीदेह । जरतजातिबासरनिशा, केशव
सहितसनेह ॥ ९३ ॥ सुगति सुकेसिसुनैनिसुनि, सुमुखि-
सुदंतिसुश्रोणि । दरशावैगोबेगिही, तुमकोसरसिजयोनि
॥ ९४ ॥ हरिगीतछंद ॥ कछुजननिदेपरतीतिजासोंरामच-