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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 269 में से

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पृष्ठ 150

( १४४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
न्द्रहिआवैं । शुभशीशकीमणिदईयहकहि सुयशतवजगगा-
वैं ॥ सबकालहैहौं अमर अरु तुमसमरजयपदपाइहौ । सुत
आजुतेरघुनाथकेतुमपरमभक्तकहाइहौ ॥ ९५ ॥
टी०--तुमको हमारे विरह कृत जो दुःखहै ताके अनन्तर मिलापरूप सुख है है
इति भावार्थः॥ ९० ॥ वैभव ऐश्वर्य जैसे वर्षा बिताई शरदको भेट्यो तैसे रावणा-
दिकनको मारि तुमको भेटिहैं इति भावार्थः ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ और अपनी दशा
कहा कहिये तुम्हारे स्नेह प्रेम सहित जो देह है सो स्नेह तैल सहित दीप दशा
कहे दीपकी बाती सम बासर निशा कहे रातोंदिन जरतजातिहै ॥ ९३ ॥ सुन्दर
है श्रोणि कहे कटि जाकी । “कटि श्रोणीककुद्मतीत्यमरः ॥” सरसिजयोनि ब्रह्मा
तुमको मोहिं दर्शावैगो मोहिं इति शेषः ॥ ९४ ॥ ९५ ॥
मू०-करजोरिपगपरितोरिउपबनकोरिकिंकरमारियो । पुनि
जंबुमालीमंत्रिसुतअरुपंचमंत्रिसंहारियो ॥ रणमारिअक्षकुमार
बहुबिधिइंद्रजीतसोंयुद्धकै । अतिब्रह्मशस्त्रप्रमाणमानिसोबश्य
भोमनशुद्धकै ॥ ९६ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचंद्रिकाया-
मिन्द्रजिद्विरचितायांहनूमद्बंधनंनामत्रयोदशः प्रकाशः ॥ १३ ॥
टी०-जंबुमाली प्रहस्तनामा मंत्रीको पुत्र है यथा वाल्मीकीये ॥ संदृष्टो राक्षसेन्-
द्रेण प्रहस्तस्य सुतो बली ॥ जम्बुमाली महादंष्ट्रो निर्जगाम धनुर्द्धरः ॥ १ ॥ पुनः
पंचमंत्रिणउक्ताः वाल्मीकीये ॥ सविरूपाक्षयूपाक्षौ दुर्द्धर्षं चैव राक्षसम् । प्रघसम्भ्रास
कर्णं च पंच सेनाग्रनायकान् ॥ ९६ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्रसाद
निर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां त्रयोदशः प्रकाशः ॥ १३॥
मू०-दोहा ॥ याचौदहेंप्रकाशमें, हैहैलंकादाह ॥ सागरती-
रमिलानपुनि, करिहैरघुकुलनाह ॥ १ ॥ रावण-विजयछंद ॥
रेकपिकौनतुअक्षकोघातक दूतबलीरघुनंदनजीको। कोरघुनंदन
रेत्रिशिराखरदूषणदूषणभूषणभूषनभूको। सागरकैसेतरयौजैसेगोपद