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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 148, कुल 269 में से

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पृष्ठ 148

( १४२ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
वढावन हारी है ॥ "शृंगारादौविषेवीर्येगुणेरागेद्रवेरसः ॥ इत्यमरः ॥ ८३ ॥ बहु
वरणा कहे बहुत हैं वरण रंग अक्षर जिनके औ सहज प्रिया दुवौ हैं तमगुण
अंधकार औ अज्ञान सूरज किरण जगके मारग राह देखावत हैं औ मुद्रिकाहू
जगमारग दशावनी है काहेते जहाँ रामचंद्र हैं तहांकी राह देखायो जा मारग
हैं हमारो मन रामचंद्रके निकट गयो दोहा क्षेपक है ॥ ८४ ॥
सू०-दोहा-श्रीपुरमेंवनमध्यहों, तुमगकरीअनीति। कहिसुँ-
दरीअबतियनकी, कोकरिहैपरतीति ॥ ८५ ॥ पद्धटिकाछंद॥
कहि कुशलमुद्रिकेरामगात । पुनिलक्ष्मणसहितसमानतात ॥
यहउत्तरदेतिनबुद्धिवंत ॥ केहिकारणधौंहनुमंतसंत ॥ ८६ ॥
हनूमान-दोहा ॥ तुमपूंछतकहिमुद्रिकै, मौनेहातियहिनाम ॥
कंकनकीपदवीदई तुमबिनयाकहँराम ॥ ८७ ॥ दंडक ॥
दीरघदरीनबसैंकेशोदासकेशरीज्योंकेशरीकोदेखिबनकरी-
ज्योंकपतहैं । बासरकीसंपतिउलूकज्योंनचितवतचकवाज्यों-
चंदचितैचौगुनोंचपतहैं । केकासुनिब्यालज्योंबिलातजात-
घनश्यामघननकेघोरनजवासोज्योंतपतहैं ॥ भँवरज्योंभवत-
वनयोगीज्योंजगतैरैनिसाकतज्योंरामनामतेरोईजपतहैं॥८८॥
टी०-श्रीजो राज्यश्रीहै तेहिपुरमें अयोध्यामें रामचन्द्रको छोडिदियो औ
बनके मध्यमें हमछाँड्यौ राम हमें तू छोड्यो सो हे सुन्दरी ! कहौ तियनको
अबको परतीतिकारि है अर्थ कोऊ ना करि है ॥ ८५ ॥ ८६ ॥ तुम्हारे
विरह सों रामचन्द्र ऐसे दुर्बल भये हैं जासों याको कंकनके स्थानमों पहिरत हैं
इति भावार्थः ॥ ८७ ॥ सीताजू सों हनुमान कहतहैं कि हे सीता ! तुम्हारे विरह
सों रामचंद्र ऐसी दशाको प्राप्त हैं कि दीरघ दरीन में केशरी जो सिंहहै ताके
समान बसत हैं जैसे सिंह भूमिहीमें सोवत बैठत है कछू सेजादि सुख की इच्छा
नहीं करत तैसे रामचंद्र हैं औ केशरी पदश्लेष है करी कहे हस्ती पच्छ सिंह
जानौ रामपक्ष केशरी केशरी उदीप कहे तासों औ बासर जो दिन है ताकी
संपत्ति कहे लक्ष्मी शोभा इति ताको उलूक जो घूघू पक्षी विशेष है ताके समान
नहीं देखत घूघू को दिनको देखि नहीं परत औ रामचन्द्रको अनेक वस्तु देखि