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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 269 में से

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पृष्ठ 159

चतुर्दशप्रकाशः १४. ( १५३ )
छंद ॥ जलजालकालकरालमालतिमिगिलादिकसोंबसै । उर
लोभक्षोभविमोहकोहसकामज्यौं खलकोलसै ॥ बहुसंपदायुत
जानिये अतिपातकीसमलेखिये । कोउमांगनोअरुपाहुनोनहीं
नीरपीवतदेखिये ॥ ३५ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचन्द्रिकाया-
मिन्द्रजिद्विरचितायांसमुद्रतटरामसैन्यनिवेशनंनाम
चतुर्दशः प्रकाशः ॥ १४ ॥
टी०-ईश कहे महादेव केशरीपच्छ भूति कहे अधिकहै बिभूति कहे भस्मकी
औ पीयूष कहे अमृतकी अमृत युक्त चंद्रमा धारण करे हैं तासों औ विषको
सागर पच्छ भूति कहे उत्पत्ति है बिभूति कहे रत्नादि द्रव्य औ पियूष कहे अमृत
औ विषकी जासों देव अदेव कश्यप के पुत्र हैं तासों पिताको घर पुत्रनको
लाग्योई चाहे औ समुद्रकी दीर्घता देखि देव अदेव मोहित कहे मूर्छित
होत हैं नागर कहे बगर श्रेष्ठ सो चंदनको जो नीर कहे उद्धर है ताके जे तरंग
हैं तासों तरंगित चित्रित हैं अर्थ अंगनमों नीकी विधि चंदन लेप करे है तागर
पच्छ चंदन वृक्ष करिकै नीरके तरंग तरंगित हैं जाके अर्थ जाके तरंगमें चंदन
वृक्ष बहत हैं जो कहो अमृतोत्पत्ति औ हरिशयन क्षीरसागरमों है तो इहां समु-
द्रकी जातिमात्रको वर्णन है लवण क्षीर भेदसों नहीं है सो जानौं ॥ ३४ ॥ जा
समुद्रके जलको जातिल कहे समूह जो है सो कालहूते कराल जे तिमिंगल
मत्स्यभेद हैं तिन्हें आदि जे जलजीव हैं तिनसों कहे तिनसहित बसत हैं अर्थ
जा जलमें तिमिंगिलादि रहत हैं आदि पदते ग्राहादि जानों सो कैसो शोभित
है जैसे लोभ औ क्षोभ कहे डर औ विमोह औ कोह कहे क्रोध औ काम सहित
खलको दुष्टको उर लसतहै औ बहुत संपत्ति रत्नादिसों युक्तहै ताहूपर कोऊ मां-
गनो कहे याचक अर्थ जे रत्नादि लेनेके लिये जात हैं पाहुनो कहे नातो विष्णु
आदि तिनको नीर जल पीवत नहीं देखियत ताते बडे पातकी सम लेखियत है
गोवधादि पाप युक्त बडे पातकीहूको जल अति संपत्तिहूके लोभसों कोऊ नहीं
पीवत इति भावार्थः ॥ ३५ ॥
इति श्रीमज्जगजननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्र-
सादनिर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां चतुर्दशः प्रकाशः ॥ १४ ॥