रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्दशप्रकाशः १४. ( १४९ )
मू०-प्रतिअंगनकेसँगहीदिननाशैं। निशिसोंमिलिबाढति
दीहउसासैं ॥ निशिनेकहुनींदनआवतिजानौं । रविकीछबि-
ज्यौंअधरातबखानौं ॥ २१ ॥ घनाक्षरी ॥ भौरनीज्यौं भ्रमत-
रहति बनबीथिकानि हंसिनीज्यौंमृदुलमृणालिकाचहतिहै ।
हरिणी ज्यौहेरतिनकेशरीकेकाननहिंकेकासुनिब्यालीज्यौं-
बिलानहींचहतिहै। पीउपीउरटरतहितिचिनचातकीज्यौंचंद-
चितैचकईज्यौंचुपह्वैरहतिहै । सुनहुनृपतिरामबिरहतिहारेऐ-
सीमूरतिनसीताजूकीमूरतिगहतिहै ॥ २२ ॥
टी०-शरद् ऋतु मों शिशिर पर्यन्त दिनमान घटत है रात्रि मान बाढत है
सो हनूमान शरदऋतु में गये सो लंका जारि कै शरद् मों अथवा हेमन्त मों
रामचन्द्र के पास आयेहैं हैं सो रामचन्द्र सों कहत हैं कि जैसे या समय के
दिन मर्याद कारिकै नाशत कहे घटत हैं तैसे सीताके सब अंग घटत हैं दूबरे
होतहैं औ ज्यों ज्यों निशा बाढति है त्यों त्यों दीह उसास बाढति हैं दूसरो अर्थ
खुल्यो है अधराति मों जैसे रविकी छबि नेक नहीं रहति तैसे सीताको रातिकै
नींद नहीं आवति अधरात कहे अति विनिद्रता जनायो जैसे तुलसीकृतमों
कह्यो है कि। "सिरिस कुसुम कहुं वेधत हीरा' ॥ २१ ॥ भौरनी सम बन
अशोक वाटिकाकी बीथिकानिमें कहे गलिन में भ्रमत रहति है अथवा मन
करिकै बन बीथिकानिमें भ्रमति रहति है तुम्हारा वियोग वनहींमों भयो है
तासों सीता को मन बन बन भ्रम्यो करत है हंसिनी सुखभावसे सीता शीतल
ताकेलिये केशरी सिंह औ कुंकुमहरिणीबधनयमोंसीता बिरहोद्दीपन भयनौं॥२२॥
मू०-सीताजू संदेश-दोहा ॥ श्रीनृसिंहप्रह्लादकी, वेदजोगा-
वतगाय । गयेमासदिनआशुही, झूठौ ह्वैहैनाथ ॥ २३ ॥ आग-
मकनककुरंगके, कहीबातसुखपाइ । कोपानलजरिजायजनि,
शोकसमुद्रबुडाइ ॥ २४ ॥
टी०-नृसिंहरूप ह्वै खंभको फारि निकसि प्रह्लादकी रक्षा करचो यह जो
गाथा वेद गावत हैं सो हम प्रति गवणकृत जे अवधि मास के दिन हैं तिनके