रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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( १५२ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
राज्यौवलनिबलतिहै । पन्नगपतंगत रुगिरिगिरिराजगजराज
मृगमगराजराजनिदतिहै। जहांत हांडपरपतालपयआइजात
पुरइनिकेसेपातपुहुमीहलतिहै ॥ ३० ॥
टी०-वानरनके संगमें लक्षन ऋच्छ हैं सो वानर औ ऋच्छ कैसे शोभित हैं
जानौं जलधि औ गंगाके तरंग हैं जलधि तरंग सम ऋच्छ हैं गंगतरंगसम बानर
हैं ॥ २९ ॥ रोदसी कहे भू, आकाश “द्यावाभूमी च रोदसीत्यमरः ।” बलनि कहे
वानरयूथनि औ मेव समूहनिकरि दिशि दिशि कहे दशों दिशिनिको बलित कहे
आच्छादित करतितहैं पन्नग-सर्प, पतंग-पक्षी ॥ ३० ॥
मू०-लक्ष्मण ॥ भारकेउतारिबेको अवतरेहौरा मचन्द्रकिधौं
केशौदासभूरिभारतप्रबलदल । टूटतहैं तरुवरगिरेगणगिरिवर-
मूखेसबसरवरसरितासकलजल। उचकिचलतहरिदचकनिद-
चकतमंचैसे मचकत भूत लकेथलथल । लचकिलचकिजातशे-
षकेअशेषफणभागिगईभोगवतीअतलवितलतल ॥ ३१ ॥
गीतिकाछंद । रघुनाथजूहनुमंतऊपरशोभियेतेहिकालजू ।
उदयाद्रिशोभन शृंगमानहुंशुआसूरविशालजू । शुभअंग अंगद
संगलक्ष्मणलक्षियेबहुभांतिजू। जनु मेरुमंदर संगअद्भुतचंद्रराज
तरातिजू ॥ ३२ ॥दोहा ॥ बलसागरलक्ष्मणसहित, कपिसाग-
ररणधीर ॥ यशसागररघुनाथजू, मेलेसागरतीर ॥ ३३ ॥
टी०-भोगवती कहे नागपुरी ॥ ३१ ॥ अंगदके ऊपर शुभ अंग जे लक्षण
हैं तिन्हें रामचन्द्रके संग बहु भांतिसों लक्षये कहे देखियत है मेरु कहे सुमेरुके
शृंगमें कै मंदर कहे मंदराचलके शृंगमें रातिको चंद्र राजत है ॥ ३२ ॥ कपि-
सागर कहे कपिनकी सागर सदृश सेना ॥ ३३ ॥
मू०-विजयाछंद ॥ भूतिबिभूतिपियूषहुकी विषईशसरोरकि-
पार्यवियोहै। हैकिधौंकेशवकश्यपको घरदेव अदेवनकेमनमोहै।
संतहियोकिबसैहरिसन्ततशोभअनन्तकहेकविकोहै। चन्दन
नीरतरंगतरंगितनागरकोउकिसागरसोहै ॥ ३४ ॥ गीतिका