रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)
Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
( २ )
फलकारन फूलै बनराई ।
उपजै फल तब पुहुप बिलाई ॥ ३ ॥
ज्ञानहि कारन करम कराई ।
उपजै ज्ञान त करम नसाई ॥ ४ ॥
बट क बीज जैसा आकार ।
पसरयौ तीन लोक पासार ॥ ५ ॥
जहँ का उपजा तहाँ बिलाइ ।
सहज सुन्नि मेँ रह्यो लुकाइ ॥ ६ ॥
जे मन बिंदै सोई बिंद ।
अमा¹ समय ज्योँ दीसै चंद ॥ ७ ॥
जल मेँ जैसे तूँबा तिरै ।
परिचै² पिंड जीव नहिँ मरै ॥ ८ ॥
सो मन कौन जो मन को खाइ ।
बिन \डोरे तिरलोक समाइ ॥ ९ ॥
मन की महिमा सब कोइ कहै ।
पंडित सो जो अनतै रहै ॥ १० ॥
कह रैदास यह परम बैराग ।
राम नाम किन³ जपहु सभाग ॥ ११ ॥
घृत कारन दधि मथै सयान ।
जीवनमुक्ति सदा निरबान ॥ १२ ॥
॥ २ ॥
अब मैं हार्योँ रे भाई ।
कित भयोँ सब हाल चाल ते, लोक न बेद बड़ाई ॥टेक॥
१ अमावस । २ परिचय हो जाने से पिंड़ का भेद जान ले तो जीवनमुक्त हो
य । ३ क्यों न ।
( ३ )
थकित भयो गायन अरु नाचन, थाकी सेवा पूजा ।
काम क्रोध ते देह थकित भइ, कहौँ कहाँ लौँ दूजा ॥१॥
राम जनहूँ ना भगत कहाऊँ, चरन पखारूँ न देवा ।
जोइ जोइ करौँ उलटि मोहिँ बाँधैँ, ता तैँ निकट न भेवा ॥२॥
पहिले ज्ञान क किया चाँदना, पाछे दिया बुझाई ।
सुन्न सहज मैं दोऊ त्यागे, राम न कहुँ दुखदाई ॥३॥
दूर बसे षट कर्म सकल अरु, दूरउ कीन्हे सेऊ ।
ज्ञान-ध्यान दूर दोउ कीन्हे, दूरिउ छाड़े तेऊ ॥४॥
पाँचो थकित भये हैं जहँ तहँ, जहाँ तहाँ थिति१ पाई ।
जा कारन मैं दौरौ फिरतो, सो अब घट मैं आई ॥५॥
पाँचो मेरी सखी सहेली, तिन निधि दई दिखाई ।
अब मन फूलि भयो जग महियाँ, आप मैं उलटि समाई ॥६॥
चलत चलत मेरो निज मन थाक्यो, अब मोसे चलो न जाई ।
सांई सहज मिलौ सोइ सनमुख, कह रैदास बड़ाई ॥७॥
॥ ३ ॥
गाइ गाइ अब का कहि गाऊँ ।
गावनहार को निकट बताऊँ ॥टेक॥
जब लग है या तन की आसा, तब लग करै पुकारा ।
जब मन मिल्यौ आस नहिँ तन की, तब को गावनहारा ॥१॥
जब लग नदी न समुद समावै, तब लग बढ़ै हँकारा ।
जब मन मिल्यौ राम सागर सौँ, तब यह मिटी पुकारा ॥२॥
जब लग भगति मुकति की आसा, परम तत्व सुनि गावै ।
जहँ जहँ आस धरत है यह मन, तहँ तहँ कछू न पावै ॥३॥
छाड़ै आस निरास परम पद, तब सुख सति कर होई ।
कह रैदास जासौँ और करत है, परम तत्त्व अब सोई ॥४॥
१ स्थिति=ठहराव ।
प्रथम भाग: साखी संग्रह (गुरु-भक्ति एवं आत्म-ज्ञान)
( ४ )
॥ ४ ॥
राम भगत को जन न कहाऊँ, सेवा करूँ न दासाँ ।
जोग जग्य गुन कछू न जानूँ, ताते रहूँ उदासा ॥टेक॥
भगत हुआ तो चढ़ै बड़ाई, जोग करूँ जग मानै ।
गुन हुआ तो गुनी जन कहै, गुनी आप को आनै ॥१॥
ना मैंँ ममता मोह न महिया१, ये सब जाहिँ बिलाई ।
दोजख भिस्त दोउ सम कर जानौँ, दुहुँ ते तरक है भाई ॥२॥
मैंँ अरु ममता देखि सकल जग, मैंँ से मूल गँवाई ।
जब मन ममता एक एक मन, तबहि एक है भाई ॥३॥
कृस्न करीम रोम हरि राघव, जब लग एक न पेखा ।
बेद कतेब कुरान पुरानन, सहज एक नहिँ देखा ॥४॥
जोइ जोइ पूजिय सोइ सोइ काँची, सहज भाव सत होई ।
कह रैदास मैंँ ताहि को पूजूँ, जाके ठावैँ नावैँ नहिँ होई ।
॥ ५ ॥
अब मेरी बूड़ी रे भाई, ताते चढ़ी लोक बड़ाई ॥टेक॥
अति अहंकार उर माँ सत रज तम, तामैँ रह्यौ उरझाई ।
कर्मन बझि पर्यौ कछू नहिँ सूझै, स्वामी नावैँ भुलाई ॥१॥
हम मानौ गुनी जोग सुनि जुगता, महा मुरुख रे भाई ।
हम मानो सूर सकल बिधि त्यागी, ममता नहीं मिटाई ॥२॥
हम मानो अखिल२ सुन्न मन सोध्यो, सब चेतन सुधि पाई ।
ज्ञान ध्यान सबही हम जान्यो, बूझौँ कौन सौँ जाई ॥३॥
हम जानौ प्रेम प्रेम रस जाने, नौबिधि भगति कराई ।
स्वाँग देखि सब ही जन लटक्यो, फिरि यौँ आन बँधाई ॥४॥
१ मथा । २ संपूर्ण ।
( ५ )
यह तौ स्वाँग साँच ना जानो, लोगन यह भरमाई ।
स्वच्छ रूप सेली जब पहरी, बोली तब सुधि आई ॥५॥
ऐसी भगति हमारी संतो, प्रभुता इहइ बड़ाई ।
आपन अनत और नहिँ मानत, ताते मूल गँवाई ॥६॥
भन रैदास उदास ताहि ते, अब कछु मो पै करयो न जाई ।
आपा खोए भगति होत है, तब रहै अंतर उरझाई ॥७॥
॥ ६ ॥
भाई रे भरम भगति सुजान ।
जौ लौँ साँच सौँ नहिँ पहिचान ॥टेक॥
भरम नाचन भरम गायन, भरम जप तप दान ।
भरम सेवा भरम पूजा, भरम सो पहिचान ॥१॥
भरम षट क्रम सकल सहता, भरम गृह बन जानि ।
भरम करि करि करम कीये, भरम की यह बानि ॥२॥
भरम इंद्री निग्रह कीया, भरम गुफा मेँ बास ।
भरम तौ लौँ जानिये, सुन्न की करै आस ॥३॥
भरम सुद्ध सरीर तौ लौँ, भरम नावाँ बिनावाँ ।
भरम भनि रैदास तौ लौँ, जौ लौँ चाहै ठावाँ ॥४॥
॥ ७ ॥
ज्योँ तुम कारन केसवे, अंतर लव लागी ।
एक अनूपम अनुभवी, किमि होइ विभागी ॥टेक॥
इक अभिमानी चातृगा१, बिचरत जग माहीं ।
यद्यपि जल पूरन मही, कहूँ वा रुचि नाहीं ॥१॥
जैसे कामी देखि कामिनी, हृदय सूल उपजाई ।
कोटि बैद बिधि उच्चरै, वा की बिथा न जाई ॥२॥
जो तेहि चाहै सो मिलै, आरत गति होई ।
कह रैदास यह गोप नहिँ, जानै सब कोई ॥ ३ ॥
१ चातक, पपीहा।
( ६ )
॥ ८ ॥
आयौँ हो आयौँ देव तुम सरना ।
जानि कृपा कीजे अपनौ जना ॥टेक॥
त्रिबिध जोनि वास जम को अगम त्रास,
तुम्हरे भजन बिन भ्रमत फिरौँ ।
ममता अहं विषै मद मातौ,
यह सुख कबहुँ न दुतर१ तिरौँ ॥१॥
तुम्हरे नावँ बिसाम छाड़ी है आन की आस,
संसार धरम मेरो मन न धीजै२ ।
रैदास दास की सेवा मानि हो देव विधि देव,
पतित पावन नाम प्रगट कीजै ॥२॥
॥ ९ ॥
भाई रे राम कहाँ मोहिँ बताओ ।
सत राम ता के निकट न आयौ ॥टेक॥
राम कहत सब जगत भुलाना, सो यह राम न होई ।
करम अकरम करुनामय केसो, करता नावँ सु कोई ॥१॥
जा रामहीँ सबै जग जानै, भरम भुले रे भाई ।
आप आप तैँ कोइ न जानै, कहै कौन सो जाई ॥२॥
सत तन लोभ परस जीतै मन, गुना प्रश्न नहिँ जाई ।
अलख नाम जाको ठौर न कतहूँ, क्यों न कहो समुझाई ॥३॥
भन रैदास उदास ताहि ते, करता क्यों है भाई ।
केवल करता एक सही सिर, सत्त राम तेहि ठाईँ ॥४॥
॥ १० ॥
ऐसो कछु अनभौ कहत न आवै ।
साहिब मिलै तो को बिलगावै ॥टेक॥
१ दुस्तर, कठिन । २ धीर धरै ।
( ७ )
सब मेँ हरि है हरि मेँ सब है, हरि अपनो जिन जाना ।
साखी नहीँ और कोइ दूसर, जाननहार सयाना ॥१॥
बाजीगर सौँ रचि रहा, बाजी का मरम न जाना ।
बाजी झूठ साँच बाजीगर, जाना मन पतियाना ॥२॥
मन थिर होइ तो कोइ न सूझै, जानै जाननहारा ।
कह रैदास बिमल बिबेक सुख, सहज सरूप सँभारा ॥३॥
॥ ११ ॥
अखिल खिलै नहिँ का कहि पंडित, कोइ न कहै समुझाई ।
अबरन बरन रूप नहिँ जा के, कहँ लौ लाइ समाई ॥टेक॥
चंद सूर नहिँ रात दिवस नहिँ, धरनि अकास न भाई ।
करम अकरम नहिँ सुभ असुभ नहिँ, का कहि देहुँ बड़ाई ॥१॥
सीत वायु ऊसन नहिँ सरवत१, काम कुटिल नहिँ होई ।
जोग न भोग क्रिया नहिँ जा के, कहौँ नाम सत सोई ॥२॥
निरंजन निराकार निरलेपी, निरबीकार निसासी ।
काम कुटिलता ही कहि गावैँ, हरहर२ आवै हाँसी ॥३॥
गगन३ धूर४ धूप५ नहिँ जा के, पवन पूर नहिँ पानी ।
गुन निर्गुन कहियत नहिँ जाके, कहौ तुम वात सयानी ॥४॥
याही सों तुम जोग कहत हौ, जब लग आस की पासी६ ।
छुटै तबहि जब मिलै एकही, भन रैदास उदासी ॥५॥
॥ १२ ॥
नरहरि७ चंचल है मति मेरी । कैसे भगति करूँ मैँ तेरी ॥टेक॥
तूँ मोहिँ देखै हौं तोहि देखूँ, प्रीति परस्पर होई ॥१॥
तूँ मोहिँ देखै तोहि न देखूँ, यह मति सब बुधि खोई ॥२॥
१ पानी के ऐसा हो कर चूना। २ ठठाय के। ३ आकाश। ४ पृथ्वी। ५ तेज,
अग्नि। ६ फाँसी। ७ नरसिंह जी अर्थात् ईश्वर के एक अवतार का नाम।
( ८ )
सब घट अंतर रमसि निरंतर, मैंँ देखन नहिँ जाना ।
गुन सब तोर मोर सब औगुन, कृत उपकार न माना ॥३॥
मैंँ तैँ तोरि मोरि असमझि सौँ, कैसे करि निस्तारा ।
कह रैदास कृस्न करुनामय, जै जै जगत अधारा ॥४॥
॥ १३ ॥
राम बिन संसय गाँठि न छूटै ।
काम किरोध लोभ मद माया, इन पंचन मिलि लूटै ॥टेक॥
हम बड़ कबि कुलीन हम पंडित, हम जोगी संयासी ।
ज्ञानी गुनी सूर हम दाता, याहु कहे मति नासी ॥१॥
पढ़े गुने कछु समुझि न परई, जौँ लौँ भाव न दरसै ।
लोहा हिरन^१ होइ धौँ कैसे, जौँ पारस नहिँ परसै ॥२॥
कह रैदास और असमझ सी, चालि परे भ्रम भोरे ।
एक अधार नाम नरहरि को, जिवन प्रान धन मोरे ॥३॥
॥ १४ ॥
जब राम नाम कहि गावैगा, तब भेद अभेद समावैगा ॥टेक॥
जे सुख है या रस के परसे, सो सुख का कहि गावैगा ॥१॥
गुरुपरसाद भई अनुभौ मति, बिष अमृत सम धावैगा ॥२॥
कह रैदास मेटि आपा पर, तब वा ठौरहि पावैगा ॥३॥
॥ १५ ॥
संतो अनिन^२ भगति यह नाहीँ ।
जब लग सिरजत मन पाँचो गुन, ब्यापत है या माहीँ ॥टेक॥
सोई आन अंतर करि हरि सौँ, अपमारग को आनै ।
काम क्रोध मद लोभ मोह की, पल पल पूजा ठानै ॥१॥
सत्य सनेह इष्ट अँग लावै, अस्थल अस्थल खेलै ।
जो कछु मिलै आन आखत^३ सौँ, सुत दारा सिर मेलै ॥२॥
१ सोना। २ अनन्य, । ३ अक्षत, कुछ चावल ।
( ९ )
हरिजन हरिहि और ना जाने, तजै आन तन त्यागी।
कह रैदास सोई जन निर्मल, निसि दिन जो अनुरागी ॥३॥
॥ १६ ॥
भगती ऐसी सुनहु रे भाई। आइ भगति तब गई बड़ाई ॥टेक॥
कहा भयो नाचे अरु गाये, कहा भयो तप कीन्हे।
कहा भयो जे चरन पखारे, जौँ लौँ तत्त्व न चीन्हे ॥१॥
कहा भयो जे मूँड़ मुड़ायो, कहा तीर्थ ब्रत कीन्हे।
स्वामी दास भगत अरु सेवक, परम तत्त्व नहिँ चीन्हे ॥२॥
कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै।
तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक१ ह्वै चुनि खावै ॥३॥
॥ १७ ॥
अब कछु मरम बिचारा हो हरि।
आदि अंत औसान राम बिन, कोइ न करै निवारा हो हरि ॥टेक॥
जब मैँ पंक पंक२ अमृत जल, जलहि सुद्ध होइ जैसे।
ऐसे करम भरम जग बाँध्यो, छूटै तुम बिन कैसे हो हरि ॥१॥
जप तप बिधी निषेध नाम करूँ, पाप पुन्न दोउ माया।
ऐसे मोहिँ तन मन गति बीमुख जनम जनम डँहकाया३ हो हरि ॥२॥
ताड़न४ छेदन५ त्रायन६ खेदन७, बहु बिधि कर ले उपाई।
लोनखड़ी८ संजोग बिना जस, कनक कलंक न जाई हो हरी ॥३॥
भन रैदास कठिन कलि के बल, कहा उपाय अब कीजै।
भव बूड़त भयभीत जगत जन, करि अवलंबन९ दीजै हो हरी ॥४॥
॥ १८ ॥
नरहरि प्रगटसि ना हो प्रगटसि ना हो।
दीनानाथ दयाल नरहरे ॥ टेक ॥
जनमेउँ तौही ते बिगरान। अहो कछु बूझै बहुरि सयान ॥१॥
१ पिपीलिका—चींटी। २ कीचड़। ३ ठगाया। ४ मारना। ५ काटना। ६ रक्षा करना।
७ शोक करना, त्याग करना। ८ नौसादर। ९ सहारा।
२
( १० )
परिवारि बिमुख मोहिँ लागि । कछु समुझि परत नहिँ जागि¹ ॥२॥
यह भौ बिदेस कलिकाल । अहो मैं आइ पर्योँ जमजाल ॥४॥
कबहुक तोर भरोस । जो मैं न कहूँ तो मोर दोस ॥ ४ ।
अस कहिये तेऊ न जान । अहो प्रभु तुम सरबस में सयान ॥५॥
सुत सेवक सदा असोच । ठाकुर पितहिँ सब सोच ॥ ६ ॥
रैदास बिनवै कर जोरि । अहो स्वामी तुम मोहिँ न खोरि² ॥७
सु³ तौ पुरबला अकरम मोर । बलि जाउँ करौ जिन कोर⁴ ॥८॥
॥ १९ ॥
त्यौँ तुम कारन केसवे, लालच जिव लागा ।
निकट नाथ प्रापत नहीँ, मन मोर अभागा ॥टेक॥
सागर सलिल⁵ सरोदिका⁶, जल थल अधिकाई ।
स्वाँति बुंद की आस है, पिउ प्यास न जाई ॥ १ ॥
जौँ रे सनेही चाहिये, चित्त बहु दूरी ।
पंगुल फल न पहुँच ही, कछु साध न पूरी ॥ २ ॥
कह रैदास अकथ कथा, उपनिषद⁷ सुनीजै ।
जस तूँ तस तूँ तस तुहीँ, कस उपमा दीजै ॥ ३ ॥
॥ २० ॥
गोबिंदे भवजल ब्याधि अपारा ।
ता में सूझै वार न पारा ॥टेक॥
अगम घर दूर उरतर, बोलि भरोस न देहू ।
तेरी भगति अरोहन संत अरोहन⁸, मोहिँ चढ़ाइ न लेहू ॥१॥
लोह की नाव पखान बोझी, सुकिरित भाव बिहीना ।
लोभ तरंग मोह भयो काला, मीन भयो मन लीना ॥२॥
दीनानाथ सुनहु मम बिनती, कवने हेत बिलंब करीजै ।
रैदास दास संत चरनन, मोहिँ अब अवलंबन दीजै ॥३॥
१ संसार या जगने पर। २ दोष न विचारो। ३ सो। ४ कसर। ५ पानी
६ तालाब का पानी। ७ वेद का एक अंग जिस में ब्रह्म का निरूपन है। ८ सीढ़ी।
( ५५ )
॥ २१ ॥
कहाँ सूते मुग्ध नर काल के मँझ मुख।
तजिय बस्तु राम चितवत अनेक सुख ॥टेक॥
असहज धीरज लोप कृस्न उधरंत कोप,
मदन भुवंग१ नहिँ मंत्र जंता।
बिखम पावक ज्वाल ताहि वार न पार,
लोभ की अयनी२ ज्ञान हंता ॥१॥
बिखम संसार ब्याल१ ब्याकुल तबै,
मोह गुन बिखै सँग बंधभूता३ ।
टेरि गुन गारुड़ी४ मंत्र स्रवना दियो,
जागि रे राम कहि कहि के सूता ॥२॥
सकल सिम्रित५ जिती सत मति कहै तिती,
हैँ इनही परम गति परम वेता६ ।
ब्रह्म ऋषि नारद संभु सनकादिक,
राम राम रमत गये पार तेता ॥३॥
जजन जाजन७ जाप रटन तीरथ दान,
ओषधी रसिक गदमूल८ देता।
नागदवनि जरजरी राम सुमिरन बरी,
भनत रैदास चेत निमेता९ ॥४॥
॥ २२ ॥
रामा हो जग जीवन मोरा।
तूँ न बिसोरि राम मैं जन तोरा ॥टेक॥
सकट सोच पोच दिन राती।
करम कठिन मोरि जाति कुजाती ॥१॥
१ सांप। २ सेना, फौज। ३ बँधा हुआ। ४ सांप के विष उतारने का मंत्र।
५ धर्मशास्त्र। ६ जानने वाला। ७ यज्ञ करना और कराना। ८ रोग की जड़ को पैदा
करता है। ९ नियम करने वाला।
( १२ )
हरहु बिपति भावै करहु सो भाव ।
चरन न छाड़ौँ जाव सो जाव ॥२॥
कह रैदास कछु देहु अलंबन ।
बेगि मिलौ जीन करौ विलंबन ॥३॥
॥ २३ ॥
तेरा जन काहे को बोलै ।
बोलि बोलि अपनी भगति को खोलै ॥टेक॥
बोलत बोलत बढ़ै वियाधी, बोल अबोलै जाई ।
बोलै बोल अबोल कोप करै, बोल बोल को खाई ॥१॥
बोलै ज्ञान मान परि बोलै, बोलै वेद बड़ाई ।
उर मेँ धरि धरि जब ही बोलै, तब ही मूल गँवाई ॥२॥
बोलि बोलि औरहि समझावै, तब लगि समझ न भाई ।
बोलि बोलि समझी जब बूझी, काल सहित सब खाई ॥३॥
बोलै गुरु अरु बोलै चेला, बोल बोल की परतीति आई ।
कह रैदास मगन भयो जबही, तबहि परमनिधि पाई ॥४॥
॥ २४ ॥
ऐसी भगति न होइ रे भाई ।
राम नाम बिन जो कछु करिये, सो सब भरम कहाई ॥टेक॥
भगति न रस दान भगति न कथै ज्ञान ।
भगति न बन मेँ गुफा खुदाई ॥१॥
भगति न ऐसी हाँसी भगति न आसापासी ।
भगति न यह सब कुल कान गँवाई ॥२॥
भगति न इंद्री बाँधा भगति न जोग साधा ।
भगति न अहार घटाई ये सब करम कहाई ॥३॥
भगति न इंद्री साधे भगति न बैराग बाँधे ।
भगति न ये सब वेद बड़ाई ॥४॥
भगति न मूड़ मुड़ाये भगति न माला दिखाये ।
भगति न चरन धुवाये ये सब गुनी जन कहाई ॥५॥
भगति न तौ लौं जाना आप को आप बखाना ।
जोइ जोइ करै सो सो करम बड़ाई ॥६॥
आपो गयो तब भगति पाई ऐसी भगति भाई ।
राम मिल्यो आपो गुन खोयो रिधि सिधि सबै गँवाई ॥७॥
कह रैदास छूटी आस सब तब हरि ताही के पास ।
आत्मा थिर भई तब सबही निधि पाई ॥८॥
॥ २५ ॥
है सब आतम सुख परकास साँचो ।
निरंतर निराहार कलपित ये पाँचो ॥टेक॥
आदि मध्य औसान१ एक रस, तार बन्यो हो भाई ।
थावर जंगम कीट पतंगा, पूरि रह्यो हरिराई ॥१॥
सर्बेस्वर सर्वांगी सब गति, करता हरता सोई ।
सिव न असिव न साध अस सेवक, उनै भाव नहिँ होई ॥२॥
धरम अधरम मोच्छ नहिँ बंधन, जरा मरन भव नासा ।
दृष्टि अदृष्टि गेय२ अरु ज्ञाना, एकमेक रैदासा ॥३॥
(राग गौरी)
॥ २६ ॥
कोई सुमार३ न देखूँ ये सब उपल४ चोभा ।
जा को जेता प्रकास ता को तेति ही सोभा ॥टेक॥
हम हिये सीखि सीखै हम हिये माड़े ।
थोरे ही इतराइ चलै पतिसाही५ छाड़े ॥१॥
अतिही आतुर वह काची ही तोरे ।
बूड़े जल पैसे६ नहिँ पड़ै रे खोरे ॥२॥
१ अंत । २ जानने योग्य । ३ गिनती । ४ पत्थर । ५ बादशाही । ६ पैठे ।
( १४ )
थोरे थोरे मुसियत परायो धना।
कह रैदास सुन संत जना ॥३॥
॥ २७ ॥
मरम कैसे पाइब रे।
पंडित कौन कहै समुझाई, जा ते मेरो आवा गमन बिलाई ॥टेक॥
बहु बिधि धरम निरूपिये, करते देखै सब कोई।
जेहि धरमे भ्रम छूटिहै, सो धरम न चीन्हे कोई ॥१॥
करम अकरम बिचारिये, सुनि सुनि वेद पुरान।
संसा सदा हिरदै बसै, हरि बिन कौन हरै अभिमान ॥२॥
बाहर मूँदि के खोजिये, घट भीतर बिबिध विकार।
सुची१ कौन बिधि होहिँगे, जस कुंजर बिधि व्यौहार ॥३॥
सतजुग सत त्रेता तप करते, द्वापर पूजा अचार।
तिहूँ जुगी तीनो दृष्टी, कलि केवल नाम अधार ॥४॥
रबि प्रकास रजन जथा, यौं गत दीसै संसार।
पारस मलि ताँबौ छिपा, कनक होत नहिँ बार३ ॥५॥
धन जोबन हरि ना मिलै, दुख दारुन अधिक अपार।
एकै एक बियोगियाँ, ता को जानै सब संसार ॥६॥
अनेक जतन करि टारिये, टारे न टरै भ्रम पास४।
प्रेम भगति नहिँ ऊपजै, ता ते जन रैदास उदास ॥७॥
( राग जगली गौडी )
॥ २८ ॥
पहिले पहरे रैन दे बनिजरिया५, तैँ जनम लिया संसार बे।
सेवा चूकी राम की, तेरी बालक बुद्धि गँवार बे ॥१॥
बालक बुद्धि न चेता तूँ, भूला मायाजाल बे।
कहा होइ पाछे पछिताये, जल पहिले न बाँधी पाल बे ॥२॥
१ पवित्र । (२) जैसे हाथी नहा कर फिर अपने ऊपर धूल डाल लेता है। ३ लोहा
पारस में लगाने से सोना हो जाता है, तांबा वार भर भी सोना नहीं होता। ४ फाँसी।
५ बनजारा, व्योपारी।
( १५ )
बीस बरस का भया अयाना, थाँभि न सका भाव बे ।
जन रैदास कहै बनिजरिया, जनम लिया संसार बे ॥३॥
दूजे पहरे रैन दे बनिजरिया, तूँ निरखत चाल्यौ छाँह बे ।
हरि न दमोदर ध्याइया बनिजरिया, तैँ लेय ना सका नाँव बे ॥४॥
नाँव न लीया औगुन कीया, जस जोबन दै तान बे ।
अपनी पराई गिनी न काई१, मंद करम कमान२ बे ॥५॥
साहिब लेखा लेसी तूँ भरि देसी, भीर परै तुझ ताँह बे ।
जन रैदास कहै बनिजरिया, तूँ निरखत चाला छाँह बे ॥६॥
तीजे पहरे रैन दे बनिजरिया, तेरे ढिलड़े पड़े पिय प्रान बे ।
काया रविनि का करै बनिजरिया, घट भीतर बसे कुजान बे ॥७॥
एक बसै कायागढ़ भीतर, पहला जनम गँवाय बे ।
अबकी बेर न सुकिरित कीया, बहुरि न यह गढ़ पाय बे ॥८॥
कंपी देह कायागढ़ खाना, फिरि लागा पछितान बे ।
जन रैदास कहै बनिजरिया, तेरे ढिलड़े पड़े परान बे ॥६॥
चौथे पहरे रैन दे बनिजरिया, तेरी कंपन लागी देह बे ।
साहिब लेखा माँगिया बनिजरिया, तेरी छाड़ि पुरानी थेह३ बे ॥१०॥
छाड़ि पुरानी जिह अजाना, बालदि४ हाँकि सबेरियाँ बे ।
जम के आये बाँधि चलाये, बारी पूगी५ तेरियाँ बे ॥११॥
पंथ अकेला बराउ६ हेला, किस को देह सनेह बे ।
जन रैदास कहै बनिजरिया, तेरी कंपन लागी देह बे ॥१२॥
॥ २९ ॥
देवा हमन पास करंत अनंता,
पतितपावन तेरा बिरद क्यों कहंता ॥टेक॥
तोहिँ मोहिँ मोहिँ तोहिँ अंतर ऐसा ।
कनक कटक७ जल तरंग जैसा ॥१॥
१ कोई। २ कमाया। ३ सहारा। ४ बरधौ। ५ पारी पूरी हो गई। ६ बराओ,
चुनलो। ७ कड़ा।
( १६ )
मैं केई नर तुहिँ अंतरजामी ।
ठाकुर थैँ जन जानिये जन थैँ स्वामी ॥
तुम सबन में सब तुम माहीं ।
रैदास दास असमझि सी कहौँ कहाँ हीँ ॥३
॥ ३० ॥
या रामा एक तूँ दाना, तेरी आदि भेख ना ।
तूँ सुलतान सुलतानां, बंदा सकिसता१ अजाना ॥टेक
मैं बेदयानत न नजर दे, दरमंद२ बरखुरदार३ ।
बेअदब बदबखत बौरा, बेअकल बदकार ॥१॥
मैं गुनहगार गरीब गाफिल, कमदिला दिलतार४ ।
तूँ कादिर५ दरियावजिहावन६, मैं हिरसिया हुसियार ॥
यह तन हस्त खस्त खराब, खातिर अंदेसाबिसियार७ ।
रैदास दासहि बोलि८ साहिब, देहु अब दीदार ॥३॥
॥ ३१ ॥
अब हम खूब वतन घर पाया,
ऊँचा खेर९ सदा मेरे भाया ॥टेक॥
बोगमपूर सहर का नाम ।
फिकर अँदेस नहीं तेहि ग्राम ॥१॥
नहिँ जहाँ साँसत लानत मार ।
हैफ न खता न तरस जवाल ॥२॥
आव न जान रहम औजूद ।
जहाँ गनी१० आप बसै माबूद११ ॥३॥
जोई सैलि करै सोई भावै ।
महरम महल मेँ को अटकावै ॥४॥
१ टूटा हुआ, निर्बल । २ दरमांदा, आजिज । ३ अयाना । ४ सियाह दिल ।
५ समरथ । ६ भवसागर लँघाने या पार कराने वाला । ७ बहुत । ८ बुला कर ।
९ गाँव । १० बेपरवाह । ११ जिस की इबादत याने पूजा की जाय ।
कह रैदास खलास१ चमारा,
जो उस सहर सो मीत हमारा ॥५॥
( राग आसावरी )
॥ ३२ ॥
केसवे बिकट माया तोर, ताते बिकल गति मति मोर ॥टेक॥
सुविषंग सन कराल अहिमुख, ग्रसति सुटल सुभेष ।
निरखि माखी बकै ब्याकुल, लोभ कालर देख ॥१॥
इंद्रियादिक दुक्ख दारुन, असंख्यादिक पाप ।
तोहि भजन रघुनाथ अंतर, ताहि त्रास न ताप ॥२॥
प्रतिज्ञा प्रतिपाल प्रतिज्ञा चिन्ह, जुग भगति पूरन काम ।
आस तोर भरोस है, रैदास जै जै राम ॥३॥
॥ ३३ ॥
बरजि हो बरजिवी उतूले२ माया ।
जग खेयां महाप्रबल सबही बसं करिये,
सुर नर मुनि भरमाया ॥टेक॥
बालक बृद्ध तरुन अरु सुन्दर, नाना भेष बनावै ।
जोगी जती तपी सन्यासी, पंडित रहन न पावै ॥१॥
बाजीगर के बाजी कारन, सब को कौतिग३ आवै ।
जो देखै सो भूलि रहै, वा का चेला मरम जो पावै ॥२॥
षड ब्रह्मण्ड लोक सब जीते, येहि बिधि तेज जनावै ।
सब ही का चित चोर लिया है, वा के पीछे लागे धावै ॥३॥
इन बातन से पचि मरियत है, सब को कहै तुम्हारी ।
नेक अटक किन राखो कैसो, मेटो बिपति हमारी ॥४॥
कह रैदास उदास भयो मन, भाजि कहाँ अब जैये ।
इत उत तुम गोविन्द गोसाईं, तुमहीँ माहिँ समैये ॥५॥
१ खालिस । २ अतुल्य । ३ कौतुक ।
३
( १८ )
॥ ३४ ॥
राम मैँ पूजा कहा चढ़ाऊँ ।
फल अरु फूल अनूप न पाऊँ ॥टेक॥
थनहर दूध जो बछरू जुठारी ।
पुहुप भँवर जल मीन बिगारी ॥१॥
मलयागिर बेधियो भुअंगा ।
बिष अमृत दोउ एकै संगा ॥२॥
मनही पूजा मनही धूप ।
मनही सेऊँ सहज सरूप ॥३॥
पूजा अरचा न जानूँ तेरी ।
कह रैदास कवन गति मेरी ॥४॥
॥ ३५ ॥
तुझ चरनारबिँद भँवर मन ।
पान करत मैँ पायो रामधन ॥टेक॥
संपति बिपति पटल माया घन ।
ता मैँ मगन होइ कैसे तेरो जन ॥१॥
कहा भयो जै गत तन छन छन,
प्रेम जाइ तौ डरै तेरो निज जन ॥२॥
प्रेमरजा१ लै राखो हृदै धरि,
कह रैदास छूटिबौ' कवन परि ॥३॥
॥ ३६ ॥
बंदे जानि साहिब गनी२ ।
समझि बेद कतेब बोलै काबे३ मैँ क्याँ मनी ॥टेक॥
स्याही सपेदी तुरँगी नाना रंग बिसाल बे ।
नापैद तैँ पैदा किया पैमाल करत न बार बे ॥१॥
१ आज्ञा वा प्रेम का रज अर्थात् धूर । २ बेपरवाह, धनी । ३ मुसलमानों का
तीरथ ।
( १९ )
ज्वानी जुमी१ जमाल सूरत देखिये थिर नाहिँ बे ।
दम छ सै सहस इकइस२ हर दिन खजाने थैँ जाहिँ बे ॥२॥
मनी मारे गर्व गाफिल बेमेहर बेपीर बे ।
दरी खाना३ पड़े चोबा४ होइ नहीँ तकसीर बे ॥३॥
कुछ गाँठि खरची मिहर तोसा, खैर खूबीहा थीर बे ।
तजि बदवा५ बेनजर कमदिल, करि खसम कान बे ।
रैदास की अरदास सुनि, कछु हक हलाल पिछान बे ॥४॥
॥ ३७ ॥
सुकछु बिचार्यो तातैं मेरो मन थिर ह्वै गयो ।
हारे रंग लाग्यो तब बरन पलटि भयो ॥टेक॥
जिन यह पंथी पंथ चलावा ।
अगम गवन मेँ गम दिखलावा ॥१॥
अबरन बरन कहै जनि कोई ।
घट घट व्यापि रह्यो हरि सोई ॥
जेइ पद सुन नर प्रेम पियासा ।
सो पद रमिरह्यो जन रैदासा ॥२॥
॥ ३८ ॥
माधो संगत सरति६ तुमारी, जगजीवन किसन मुरारी ॥टेक॥
तुम मखतूल७ चतुरभुज, मैं बपुरो जस कीरा ।
पीवत डाल फूल फल अमृत, सहज भई मति हीरा ॥१॥
तुम चंदन हम अरँड बापुरो, निकट तुम्हारी बासा ।
नीच बिरिछ ते ऊँच भये हैं, तेरी बास सुबासन बासा ॥२॥
१ जोश । २ इक्कीस हज़ार छः सौ श्वास दिन रात में चलते हैं । ३ दरगाह ।
४ छड़ी की मार । ५ ठग । ६ मानी है । ७ श्रेष्ठ ।
( २० )
जाति भी ओछी जनम भी ओछा, ओछा करम हमारा ।
हम रैदास रामराई को, कह रैदास विचारा ॥३॥
॥ ३९ ॥
माधो अविद्या हित कीन्ह,
तां ते मैं तोर नाम न लीन्ह ॥टेक॥
मृग मीन भृंग पतंग कुंजर, एक दोस विनास ।
पंच व्याधि असाधि यह तन, कौन ता की आस१ ॥१॥
जल थल जीव जहाँ तहाँ लौं, करम न या सन जाई ।
मोह पासी२ अबंध बंध्यो, करिये कौन उपाई ॥२॥
त्रिगुन जोनि अचेत भ्रम भरमे, पाप पुन्न न सोच ।
मानुखा औतार दुरलभ, तहूँ संकट पोच ॥३॥
रैदास उदास मन भौ, जप न तप गुन ज्ञान ।
भगत जन भवहरन कहिये, ऐसे परमनिधान ॥४॥
॥ ४० ॥
देहु कलाली एक पियाला, ऐसा अबधू है मतवाला ॥टेक॥
हे रे कलाली तैं क्या किया, सिरका सा तैं प्याला दिया ॥१॥
कहै कलाली प्याला देउँ, पीवनहारे का सिर लेउँ ॥२॥
चंद सूर दोउ सनमुख होई, पीवै प्याला मरै न कोई ॥३॥
सहज सुन्न मेँ भाठी संरवे, पावै रैदास गुरुमुख दरवे ॥४॥
॥ ४१ ॥
भाई रे सहज बंदो लोई, बिन सहज सिद्धि न होई ।
लौलीन मन जो जानिये, तब कीट भृंगी होई ॥टेक॥
आपा पर चीन्हे नहीं रे, और को उपदेस ।
कहाँ ते तुम आयो रे भाई, जाहुगे किस देस ॥१॥
१ हिरन, मछली, भौंरा, पतगा, हाथो, इन का एक एक इंद्री के बेग से न
होता है तो तन जोकि पाँचों इंद्रियों के वशीभूत है उसका क्या ठिकाना ? २ फाँसी
( २१ )
कहिये तो कहिये काहि कहिये, कहाँ कौन पतियाइ ।
रैदास दास अजान है करि, रह्यो सहज समाइ ॥२॥
( राग सोरठ )
॥ ४२ ॥
ऐसी मेरी जाति बिख्यात चमारं ।
हृदय राम गोबिँद गुनसारं ॥टेक॥
सुरसरि जल कृत बारुनी रे१,
जेहि संत जन नहिँ करत पानं ।
सुरा अपवित्र तिनि गंगजल आनिये,
सुरसरि मिलत नहिँ होत आनं२ ॥१॥
ततकरा३ अपबित्र कर मानिये,
जैसे कागदगर४ करत बिचारं ।
भगवत भगवंत जब ऊपरे लेखिये,
तब पूजिये करि नमस्कारं ॥२॥
अनेक अधम जिव नाम गुन ऊधरे,
पतित पावन भये परसि सारं ।
भनत रैदास ररंकार गुन गावते,
संत साधू भये सहज पारं ॥३॥
॥ ४३ ॥
पार गया चाहै सब कोई,
रहि उर वार पार नहिँ होई ॥टेक॥
पार कहै उर वार से पारा ।
बिन पद परचे भ्रमै गँवारा ॥१॥
१ गंगाजल से जो शराब बनाई जाय तौ भी उसे साधु लोग नहीं पीयेंगे।
२ अगर वही शराब गंगा मे डाल दी जाय तो वह गंगाजल हो जाती है।
३ तत्काल । ४ लेखक ।