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रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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पृष्ठ 12

( ५ )

यह तौ स्वाँग साँच ना जानो, लोगन यह भरमाई ।
स्वच्छ रूप सेली जब पहरी, बोली तब सुधि आई ॥५॥
ऐसी भगति हमारी संतो, प्रभुता इहइ बड़ाई ।
आपन अनत और नहिँ मानत, ताते मूल गँवाई ॥६॥
भन रैदास उदास ताहि ते, अब कछु मो पै करयो न जाई ।
आपा खोए भगति होत है, तब रहै अंतर उरझाई ॥७॥
॥ ६ ॥
भाई रे भरम भगति सुजान ।
जौ लौँ साँच सौँ नहिँ पहिचान ॥टेक॥
भरम नाचन भरम गायन, भरम जप तप दान ।
भरम सेवा भरम पूजा, भरम सो पहिचान ॥१॥
भरम षट क्रम सकल सहता, भरम गृह बन जानि ।
भरम करि करि करम कीये, भरम की यह बानि ॥२॥
भरम इंद्री निग्रह कीया, भरम गुफा मेँ बास ।
भरम तौ लौँ जानिये, सुन्न की करै आस ॥३॥
भरम सुद्ध सरीर तौ लौँ, भरम नावाँ बिनावाँ ।
भरम भनि रैदास तौ लौँ, जौ लौँ चाहै ठावाँ ॥४॥
॥ ७ ॥
ज्योँ तुम कारन केसवे, अंतर लव लागी ।
एक अनूपम अनुभवी, किमि होइ विभागी ॥टेक॥
इक अभिमानी चातृगा१, बिचरत जग माहीं ।
यद्यपि जल पूरन मही, कहूँ वा रुचि नाहीं ॥१॥
जैसे कामी देखि कामिनी, हृदय सूल उपजाई ।
कोटि बैद बिधि उच्चरै, वा की बिथा न जाई ॥२॥
जो तेहि चाहै सो मिलै, आरत गति होई ।
कह रैदास यह गोप नहिँ, जानै सब कोई ॥ ३ ॥

१ चातक, पपीहा।