रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)
Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४ )
॥ ४ ॥
राम भगत को जन न कहाऊँ, सेवा करूँ न दासाँ ।
जोग जग्य गुन कछू न जानूँ, ताते रहूँ उदासा ॥टेक॥
भगत हुआ तो चढ़ै बड़ाई, जोग करूँ जग मानै ।
गुन हुआ तो गुनी जन कहै, गुनी आप को आनै ॥१॥
ना मैंँ ममता मोह न महिया१, ये सब जाहिँ बिलाई ।
दोजख भिस्त दोउ सम कर जानौँ, दुहुँ ते तरक है भाई ॥२॥
मैंँ अरु ममता देखि सकल जग, मैंँ से मूल गँवाई ।
जब मन ममता एक एक मन, तबहि एक है भाई ॥३॥
कृस्न करीम रोम हरि राघव, जब लग एक न पेखा ।
बेद कतेब कुरान पुरानन, सहज एक नहिँ देखा ॥४॥
जोइ जोइ पूजिय सोइ सोइ काँची, सहज भाव सत होई ।
कह रैदास मैंँ ताहि को पूजूँ, जाके ठावैँ नावैँ नहिँ होई ।
॥ ५ ॥
अब मेरी बूड़ी रे भाई, ताते चढ़ी लोक बड़ाई ॥टेक॥
अति अहंकार उर माँ सत रज तम, तामैँ रह्यौ उरझाई ।
कर्मन बझि पर्यौ कछू नहिँ सूझै, स्वामी नावैँ भुलाई ॥१॥
हम मानौ गुनी जोग सुनि जुगता, महा मुरुख रे भाई ।
हम मानो सूर सकल बिधि त्यागी, ममता नहीं मिटाई ॥२॥
हम मानो अखिल२ सुन्न मन सोध्यो, सब चेतन सुधि पाई ।
ज्ञान ध्यान सबही हम जान्यो, बूझौँ कौन सौँ जाई ॥३॥
हम जानौ प्रेम प्रेम रस जाने, नौबिधि भगति कराई ।
स्वाँग देखि सब ही जन लटक्यो, फिरि यौँ आन बँधाई ॥४॥
१ मथा । २ संपूर्ण ।