रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)
Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad
सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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सब घट अंतर रमसि निरंतर, मैंँ देखन नहिँ जाना ।
गुन सब तोर मोर सब औगुन, कृत उपकार न माना ॥३॥
मैंँ तैँ तोरि मोरि असमझि सौँ, कैसे करि निस्तारा ।
कह रैदास कृस्न करुनामय, जै जै जगत अधारा ॥४॥
॥ १३ ॥
राम बिन संसय गाँठि न छूटै ।
काम किरोध लोभ मद माया, इन पंचन मिलि लूटै ॥टेक॥
हम बड़ कबि कुलीन हम पंडित, हम जोगी संयासी ।
ज्ञानी गुनी सूर हम दाता, याहु कहे मति नासी ॥१॥
पढ़े गुने कछु समुझि न परई, जौँ लौँ भाव न दरसै ।
लोहा हिरन^१ होइ धौँ कैसे, जौँ पारस नहिँ परसै ॥२॥
कह रैदास और असमझ सी, चालि परे भ्रम भोरे ।
एक अधार नाम नरहरि को, जिवन प्रान धन मोरे ॥३॥
॥ १४ ॥
जब राम नाम कहि गावैगा, तब भेद अभेद समावैगा ॥टेक॥
जे सुख है या रस के परसे, सो सुख का कहि गावैगा ॥१॥
गुरुपरसाद भई अनुभौ मति, बिष अमृत सम धावैगा ॥२॥
कह रैदास मेटि आपा पर, तब वा ठौरहि पावैगा ॥३॥
॥ १५ ॥
संतो अनिन^२ भगति यह नाहीँ ।
जब लग सिरजत मन पाँचो गुन, ब्यापत है या माहीँ ॥टेक॥
सोई आन अंतर करि हरि सौँ, अपमारग को आनै ।
काम क्रोध मद लोभ मोह की, पल पल पूजा ठानै ॥१॥
सत्य सनेह इष्ट अँग लावै, अस्थल अस्थल खेलै ।
जो कछु मिलै आन आखत^३ सौँ, सुत दारा सिर मेलै ॥२॥
१ सोना। २ अनन्य, । ३ अक्षत, कुछ चावल ।