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रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

रैदास जी की बानी (सन्त रविदास - बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सम्पूर्ण साखी व पद)

Raidas Ji Ki Bani: Belvedere Steam Printing Press Allahabad

सन्त रविदास / रैदास (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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पृष्ठ 10

( ३ )
थकित भयो गायन अरु नाचन, थाकी सेवा पूजा ।
काम क्रोध ते देह थकित भइ, कहौँ कहाँ लौँ दूजा ॥१॥
राम जनहूँ ना भगत कहाऊँ, चरन पखारूँ न देवा ।
जोइ जोइ करौँ उलटि मोहिँ बाँधैँ, ता तैँ निकट न भेवा ॥२॥
पहिले ज्ञान क किया चाँदना, पाछे दिया बुझाई ।
सुन्न सहज मैं दोऊ त्यागे, राम न कहुँ दुखदाई ॥३॥
दूर बसे षट कर्म सकल अरु, दूरउ कीन्हे सेऊ ।
ज्ञान-ध्यान दूर दोउ कीन्हे, दूरिउ छाड़े तेऊ ॥४॥
पाँचो थकित भये हैं जहँ तहँ, जहाँ तहाँ थिति१ पाई ।
जा कारन मैं दौरौ फिरतो, सो अब घट मैं आई ॥५॥
पाँचो मेरी सखी सहेली, तिन निधि दई दिखाई ।
अब मन फूलि भयो जग महियाँ, आप मैं उलटि समाई ॥६॥
चलत चलत मेरो निज मन थाक्यो, अब मोसे चलो न जाई ।
सांई सहज मिलौ सोइ सनमुख, कह रैदास बड़ाई ॥७॥
॥ ३ ॥
गाइ गाइ अब का कहि गाऊँ ।
गावनहार को निकट बताऊँ ॥टेक॥
जब लग है या तन की आसा, तब लग करै पुकारा ।
जब मन मिल्यौ आस नहिँ तन की, तब को गावनहारा ॥१॥
जब लग नदी न समुद समावै, तब लग बढ़ै हँकारा ।
जब मन मिल्यौ राम सागर सौँ, तब यह मिटी पुकारा ॥२॥
जब लग भगति मुकति की आसा, परम तत्व सुनि गावै ।
जहँ जहँ आस धरत है यह मन, तहँ तहँ कछू न पावै ॥३॥
छाड़ै आस निरास परम पद, तब सुख सति कर होई ।
कह रैदास जासौँ और करत है, परम तत्त्व अब सोई ॥४॥
१ स्थिति=ठहराव ।