प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
१५० ] प्रतिमानाटकम्
सीता—जं अय्यउत्तॊ आणवेदि । [यदार्यपुत्र आज्ञापयति ।]
रावणः—(मायाप्रकाशनपर्याकुलो भूत्वा) भवतु, भवतु—
इयमेका पृथिव्यां हि मानुषीणामरुन्धती ।
यस्या भर्तेति नारीभिः सत्कृतः कथ्यते भवान् ॥८॥
अन्वयः—हि इयं पृथिव्यां मानुषीणाम् एका अरुन्धती ; यस्याः भर्ता भवान्
नारीभिः सत्कृतः इति कथ्यते ॥८॥
हिन्दी रूपान्तर—
(घूमकर और देखकर) यह राम के आश्रम के द्वार का स्थान है। तो
उतरता हूँ । (उतरता है) तो अब मैं अतिथियों के आचरण का पालन करूंगा। मैं
अतिथि हूँ। हे ! यहाँ कौन है ?
राम—(सुन कर) अतिथि का स्वागत है।
रावण—इस सुन्दर रूप को मधुर स्वर ने निश्चय से बहुत अधिक विशिष्ट
बना दिया है।
राम—(देख कर) अये, भगवान् हैं ? हे भगवन् ! अभिवादन करता हूँ ।
रावण—कल्याण हो ।
राम—भगवन् ! यह आसन है । बैठिये ।
रावण—(अपने मन में) क्या, इसने मुझको आदेश सा दिया है । (प्रकट रूप
में) अच्छा । (बैठ जाता है)
राम—सीते ! भगवान् के लिये पैर धोने का जल ले आओ ।
सीता—आर्यपुत्र जैसा आदेश देते हैं । (निकल कर और प्रवेश करके) ये
जल है।
राम—भगवान् की सेवा करो ।
सीता—आर्यपुत्र जैसा आदेश देते हैं ।
रावण—(माया के खुल जाने के भय से व्याकुल होकर) रहने दो, रहने दो।
अर्थ [श्लोक ८]—निश्चय से यह सीता मानव स्त्रियों में अकेली अरुन्धती
है, पतिव्रताओं में शिरोमणि है । जिसके पति आपका नारियां बहुत अधिक यशोगान
करती हैं ॥८॥
संस्कृत-व्याख्या—हि निश्चयेन इयम् एषा सीता पृथिव्याम् अस्यां धरायां
मानुषीणां मानवस्त्रीणाम् एका अद्वितीया अरुन्धती अरुन्धती इव पतिव्रताशिरोमणि-
भूता वर्तते । अरुन्धती नाम्नी वसिष्ठपत्नी स्वपातिव्रत्यप्रभावेण सप्तर्षिमध्ये निवसति ।
सा पतिव्रतासु मानवीषु सर्वश्रेष्ठरूपेण गण्यते । यस्याः सीतायाः भर्ता पतिः भवान्
नारीभिः विश्वस्य सर्वाभिः वनिताभिः सत्कृतः पूजितः इति कथ्यते लोके वर्ण्यते ।
इयं सीता पातिव्रत्यप्रभावेण सकलजनमाननीया । भवांश्चास्या पतिः । तत्पातिव्रत्य-
प्रभावेण भवान् सर्वाभिः नारीभिः वन्द्यमानत्वात् सकलजनपूजनीया । अतः नाहं
योग्यो यदेषा मम पादप्रक्षालनं कुर्यात् ॥८॥
व्याकरण—√प्रथ् + ष्वन् + ङीप् (इट् का आगम तथा सम्प्रसारण) =
पृथिवी । मनुष्य + अण् + ङीप् = मानुषी ।
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पञ्चमोऽङ्कः [ १५१ ]
छन्दः—अनुष्टुप्।
अलङ्कार—उदात्त। सीता के प्रभावातिशय का वर्णन करने से उदात्त
अलङ्कार है।
मायाप्रकाशपर्याकुलः--मायायाः प्रकाशतेनपर्याकुलः। { रावण को भय हुआ
कि पतिव्रता सीता के स्पर्श से कहीं उसकी माया प्रकट न हो जावे। } अतः उसने सीता
द्वारा चरणप्रक्षालन को स्वीकार करना नहीं चाहा।
रामः—तेन हि आनय, अहमेव शुश्रूषयिष्ये।
रावणः—अयि, छायां परिहृत्य शरीरं न लङ्घयामि। वाचानुवृत्तिः
खल्वतिथिसत्कारः। पूजितोऽस्मि। आस्यताम्।
रामः—बाढम्। (उपविशति)
हिन्दी रूपान्तर—
राम—तो ले आओ। मैं ही सेवा करूँगा।
रावण—अरे, छाया को छोड़कर मैं शरीर का लंघन नहीं करूँगा। सच्चा
अतिथिसत्कार तो वाणी से ही हो जाता है। मेरा सत्कार हो गया है। आप बैठिये।
राम—बहुत अच्छा। (बैठ जाते हैं)
छायां परिहृत्य शरीरं न लङ्घयामि—पत्नी को पति की छाया के समान
माना गया है। राम शरीर हैं तो सीता उनकी छाया है। जब रावण ने सीता से
सेवा कराना स्वीकार नहीं किया तो राम से सेवा कराना शिष्टाचार का उल्लङ्घन
होता।
रावणः—(अ त्मगतम्) यावदहमपि ब्राह्मणसमुदाचारमनुष्ठास्यामि।
(प्रकाशम्) भोः ! काश्यपगोत्रोऽस्मि। साङ्गोपाङ्गं वेदमधीये, मानवीयं धर्म-
शास्त्रं, माहेश्वरं योगशास्त्रं, बार्हस्पत्यमर्थशास्त्रं, मेधातिथेर्न्यायशास्त्रं,
प्राचेतसं श्राद्धकल्पं च।
रामः—कथं कथं श्राद्धकल्पमिति ?
रावणः--सर्वाः श्रुतीरतिक्रम्य श्राद्धकल्पे स्पृहा दर्शिता। किमेतत् ?
रामः—भगवन् ! भ्रष्टायां पितृमत्तायामागम इदानीमेषः।
रावणः—अलं परिहृत्य। पृच्छतु भवान्।
रामः—भगवन् ! निर्वपणक्रियाकाले केन पितॄंस्तर्पयामि ?
रामः [रावणः]--सर्वं श्रद्धया दत्तं श्राद्धम्।
रावणः [रामः]—भगवन् ! अनादरतः परित्यक्तं भवति। विशेषार्थं पृच्छामि।
रावणः—श्रूयताम्। विरूढेषु दर्भाः, ओषधीषु तिलाः, कलायं शाकेषु,
१५२ ] प्रतिमानाटकम्
मत्स्येषु महासफरः, पक्षिषु वार्ध्रीणसः, पशुषु गौः खड्गो वा, इत्येते मानुषाणां
विहिताः ।
रामः—भगवन् ! वाशब्देनावगतमन्यदप्यस्तीति ।
रावणः—अस्ति प्रभावसम्पाद्यम् ।
रामः—एष एव मे निश्चयः—
उभयस्यास्ति सान्निध्यं यद्येतत् साधयिष्यति ।
धनुर्वा तपसि श्रान्ते श्रान्ते धनुषि वा तपः ॥६॥
(अन्वयः—उभयस्य अपि सान्निध्यम् अस्ति, यद् एतत् साधयिष्यति । तपसि
श्रान्ते धनुः धनुषि वा श्रान्ते तपः ॥६॥)
हिन्दी रूपान्तर—
रावण—(अपने मन में) तो मैं भी अपने ब्राह्मण के योग्य आचरण का पालन
करूँगा । (प्रकट रूप में) हे राम ? मेरा गोत्र काश्यप है । मैंने अङ्गों और उपाङ्गों
सहित वेदों का अध्ययन किया है, मनु द्वारा रचित धर्मशास्त्र का, महेश्वर द्वारा
रचित योगशास्त्र का, बृहस्पति द्वारा रचित अर्थशास्त्र का, मेवातिथि द्वारा रचित
न्यायशास्त्र का और प्रचेतस् ऋषि द्वारा रचित श्राद्धकल्प का अध्ययन किया है ।
राम—क्या कहा, क्या कहा, श्राद्धकल्प का ?
रावण—सब विद्याओं को लांघकर आपने श्राद्धकल्प के प्रति इच्छा दिखाई
है । यह क्या बात है ?
राम—भगवन् ! पिता की मृत्यु हो जाने के कारण अब इस शास्त्र की
अपेक्षा है ।
रावण—आप इस विषय को न छोड़ें । आप पूछें ।
राम—भगवन् ! पिण्डदान के समय पितरों को किस वस्तु से तृप्त करूँ ?
रावण—श्रद्धा से दिया गया सब कुछ श्राद्ध ही है ।
राम—हे भगवन् ! अनादर से दिया गया तो त्याग देने योग्य होता है । मैं
विशेष रूप से देने योग्य के लिये पूछ रहा हूँ ।
रावण—सुनो । घासों में दर्भ, ओषधियों में तिल, शाकों में कलाय, मछलियों
में महासफर, पक्षियों में वार्ध्रीणस, पशुओं में गाय या गैंडा, मनुष्य जाति में तो
श्राद्धों में ये ही विहित हैं ।
राम—भगवन् ! वा शब्द से मैं समझता हूँ कि इस विषय में और भी
कुछ है ।
रावण—है तो, परन्तु उसको प्रभाव-सामर्थ्य से ही सम्पादित किया जा
सकता है ।
राम—भगवन् ! यही मेरा निश्चय है ।
अर्थ [श्लोक ६]—मेरे पास दोनों ही प्रकार के साधन तपस्या और धनुष भी
हैं, जिनसे कि मैं इस साध्य को सिद्ध करूँगा । तपस्या के विफल हो जाने पर धनुष
से कार्य सिद्ध करूँगा अथवा धनुष के विफल हो जाने पर तपस्या से सिद्ध
करूँगा ॥६॥
पञ्चमोऽङ्कः । १५३
संस्कृत-व्याख्या-उभयस्य अपि मयि सदृशे जने उभयप्रकारस्यापि धनुषो
तपसश्च साधनद्वयस्य सान्निध्यं सामीप्यमस्ति । द्वयोरपि साधनयोः मयि सामीप्यं
वर्तते । धनुषा वा तपसा वा अहं सर्वमपि कार्यजातं साधयितुं शक्नोमीति भावः ।
तपसि तपस्यायां श्रान्ते अतिशयेन खिन्ने विफले सञ्जाते धनुः वा कोदण्डो वा वर्तते ।
धनुषि कोदण्डे वा श्रान्ते सञ्जाते तपः विद्यते । यत्कार्यं तपसा साधयितुं न शक्यते
तत् धनुषा साधयितुं शक्यते, यच्च कार्यं धनुषा साधयितुं न शक्यते, तत् तपसा साध-
यितुं शक्यते । अनेन प्रकारेण अहं सर्वाण्यपि कार्याणि प्रभावातिशयेन साधयितुं
शक्नोमि ॥६॥
व्याकरण—सम् + नि + धा + कि = सन्निधि । सन्निधेः भावः = सन्निधि +
ष्यञ् = सान्निध्यम् । श्रम् + क्त = श्रान्त ।
छन्दः—अनुष्टुप् ।
साङ्गोपाङ्गम्—वेदों का अध्ययन अङ्गों तथा उपाङ्गों सहित किया जाता है ।
शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्दः, ज्योतिष ये छः वेदाङ्ग हैं। पुराण, न्याय,
मीमांसा और धर्मशास्त्र ये चार उपाङ्ग हैं।
मानव्यम्—मनुना प्रोक्तम् = मनु + अण् = मानव । मानवस्येदम् = मानव
- छ (ईय) = मानवीय । मनु ने धर्मशास्त्र की रचना करके धर्म का अनुशासन
किया था । योगशास्त्र की रचना महेश्वर (शिव) ने की थी, जो पतञ्जलि के योग-
दर्शन का मूल है। अर्थशास्त्र का प्रवर्तन बृहस्पति ने किया था, जो चाणक्य के अर्थ-
शास्त्र का मूल है । न्यायशास्त्र का प्रवर्तन मेधातिथि ने किया था, जो गौतम के
न्यायदर्शन का मूल है। श्राद्धकल्प का प्रवर्तन प्रचेतस् ने किया था । प्रचेतस् का अर्थ
वरुण देवता है। प्रचेतस् नाम के ऋषि भी हुये हैं।
भ्रष्टायां पितृमञ्जायाम्—पितृत्व से वञ्चित हो जाने पर । भ्रंश् + क्त + टाप् =
भ्रष्टा ।
वार्ध्रीणसः—वार्ध्रीणस एक विशेष पक्षी का नाम है । मार्कण्डेय पुराण में
इसका लक्षण है:—
रक्तपादो रक्तशिरा रक्तचक्षुर्विहङ्गमः ।
कृष्णवर्णेन न तथा पक्षी वार्ध्रीणसो मतः ॥
रावणः—सन्ति । हिमवति प्रतिवसन्ति ।
रामः—हिमवतीति । ततस्ततः ।
रावणः—हिमवतः सप्तमे शृङ्गे प्रत्यक्षस्थाणुशिरःपतितगङ्गाम्बुगायिनो
वैदूर्यश्याम्पृष्ठाः पवनसमजवाः काञ्चनपार्श्वा नाम मृगाः यैर्वैखानसबालखिल्य-
नैमोषादयो महर्षयश्चिन्तितमात्रोपस्थितविपन्नैः श्राद्धान्यभिवर्धयन्ति ।
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१५४ ] प्रतिमानाटकम्
तैस्तर्पिताः सुतफलं पितरो लभन्ते
हित्वा जरां खमुपयान्ति हि दीप्यमानाः ।
तुल्यं सुरैः समुपयान्ति विमानवास-
मावर्तिभिश्च विषयैर्न बलाद् ध्रियन्ते ॥१०॥
[अन्वयः—तैः तर्पिताः पितरः सुतफलं लभन्ते, जरां हित्वा च दीप्यमानाः हि
खम् उपयान्ति । सुरैः तुल्यं विमानवासं समुपयान्ति । आवर्तिभिः च विषयैः बलात् न
ध्रियन्ते ॥१०॥
हिन्दी रूपान्तर—
रावण—हँ । वे हिमालय पर रहते हैं ।
राम—हिमालय पर रहते हैं । उसके बाद ?
रावण—हिमालय के सातवें शिखर पर, प्रत्यक्ष रूप से शिव के सिर पर
गिरती हुई गङ्गा के जल का पान करने वाले, वैडूर्य मणि के समान श्यामल पीठ
वाले, वायु के समान वेगशाली, काञ्चनपार्श्व नाम के मृग हैं । वैखानस, बालखिल्य,
नैमिषीय आदि महर्षियों के ध्यान मात्र से उपस्थित होकर वे मृत हो जाते हैं ।
तथा उनके द्वारा वे ऋषि श्राद्ध कार्यों को करते हैं ।
अर्थ [श्लोक १०]—उन काञ्चनपार्श्व मृगों के मांस से तृप्त होकर पितर
लोग पुत्र होने के फल को प्राप्त कर लेते हैं और वृद्धावस्था को छोड़ कर वे दीप्ति-
शाली होते हुये स्वर्ग में पहुँचते हैं । देवताओं के समान वे विमानों में निवास करते
हैं । तथा आवागमन (पुनर्जन्म) को कराने वाले विषय भोग उनका बलपूर्वक अपहरण
नहीं कर सकते ॥१०॥
संस्कृत व्याख्या—तैः काञ्चनपार्श्वमृगैः तेषां मांसप्रयोगैः तर्पिताः संतृप्ता
सञ्जाताः पितरः पितृलोके विद्यमानाः पूर्वजाः सुतफलं पुत्रजन्मजन्यप्रयोजनं लभन्ते
प्राप्नुवन्ति । तेन च जरां वृद्धावस्थां त्यक्त्वा हित्वा सततं यौवनावस्थामनुभवन्तस्ते
दीप्यमानाः भ्राजमानाः सन्तः हि निश्चयेन खं स्वर्गम् उपयान्ति प्राप्नुवन्ति । वार्धक्य-
मपहाय स्वर्गं सेवन्ते । तत्र स्वर्गे च सुरैः देवैः तुल्यं समानं विमानवासं विमानेषु
सप्तभूमिकप्रासादेषु व्योमयानेषु वा वास निवसनं समुपयान्ति प्राप्नुवन्ति ।
आवर्तिभिः जननमरणावागमनकारिभिः विषयैः इन्द्रियार्थप्रदीपकैः सांसारिकभोगविषयैः
बलात् हठात् न ध्रियन्ते बाध्यन्ते । जन्ममरणकारणभूतानि विषयाणि तान् न
बाधन्ते ॥१०॥
व्याकरण—दीप् + यक् + शानच् (मुक् का आगम) = दीप्यमान ।
छन्दः—वसन्ततिलका ।
हिमवतः सप्तमे शृङ्गे...—पौराणिक कथाओं के अनुसार भगीरथ की
तपस्या के प्रभाव से स्वर्ग से गिरती हुई गंगा को शिव ने अपने सिर पर ग्रहण किया
था । उस समय वे हिमालय के शिखर पर स्थित थे ।
काञ्चनपार्श्वः—यह एक काल्पनिक मृग है, जिससे रावण ने राम को
पञ्चमोऽङ्कः [ १५५
लुभाने का विचार किया था। इनकी पीठ श्यामवर्ण तथा पार्श्व भाग सुनहरे कल्पित
किये गये थे।
वैखानसबालखिल्यनैमोषादयः—वैखानस नाम वानप्रस्थियों का है।
बालखिल्य नाम के ६० हजार ऋषियों का समुदाय पुराणों में प्रसिद्ध है। इनका
आकार एक अंगुष्ठमात्र माना गया था। नैमिषारण्य में रहने वाले ऋषि नैमिषीय
कहलाते थे।
चिन्तितमात्रोपस्थितविपन्नैः—चिन्तितमात्रेण उपस्थितैः विपन्नैः मृतैश्च।
ऋषियों के विचारमात्र से वे उपस्थित हो जाते हैं तथा मर जाते हैं। इससे उनका
मांस श्राद्ध में दिया जा सकता है।
रामः—मैथिलि !
आपृच्छ पुत्रकृतकान् हरिणान् द्रुमांश्च
विन्ध्यं वनं तव सखीर्दयिता लताश्च।
वत्स्यामि तेषु हिमवद्गिरिकाननेषु
दीप्तैरिवौषधिवनैरुपरञ्जितेषु ॥११॥
[अन्वय—पुत्रकृतकान् हरिणान्, द्रुमान्, विन्ध्यं वनं, तव दयिताः सखीः लताः
च आपृच्छ। दीप्तैः औषधिवनैः उपरञ्जितेषु इव तेषु हिमवद्गिरिकाननेषु वत्स्यामि
।।११।।]
हिन्दी रूपान्तर—
राम—सीते।
अये [श्लोक ११]—अपने पुत्रों के समान हरिणों से, वृक्षों से, विन्ध्य वन
से और प्रिय सखी लताओं से विदा ले लो। मैं चमकती हुई औषधियों से युक्त वनों
से प्रकाशित होते हुये, हिमालय पर्वत के उन अरण्यों में निवास करूंगा ॥११॥
संस्कृत व्याख्या—पुत्रकृतकान् सुततुल्यपालितान् हरिणान् मृगान्, द्रुमान्
वृक्षान्, विन्ध्यं वनं विन्ध्यारण्यं, दयिताः स्नेहशीलाः तव त्वदीया सखीः प्रियवयस्या-
भूताः लताः वल्लर्यः च आपृच्छ गमनकालिकामन्त्रणेन सम्भावय। यतोऽहं दीप्तैः
सततं प्रकाशमानैः औषधिवनैः ज्योतिष्मत्यादिप्रकाशमानवनस्पतियुक्तैररण्यैः प्रकाश-
मानेषु तेषु काञ्चनपार्श्वमृगशालिषु हिमवद्गिरिकाननेषु हिमवद्गिरेः हिमालयपर्वतस्य
काननेषु अरण्येषु वत्स्यामि निवासं करिष्यामि। मया पितृणामुत्तमतर्पणं कर्तव्यम्।
तच्च काञ्चनपार्श्वमृगैः भविष्यति। ते च हिमालयारण्येषु निवसन्ति। अतोऽहं तेषा-
मानयनाय हिमवन्तं गत्वा तत्र तपसा धनुषा वा तानानयिष्यामि। अतः तत्रैव मे
वासो रोचते ॥११॥
व्याकरण—पुत्र + कृत + कन् = पुत्रकृतक। √दय् + क्त (इडागम) + टाप् =
दयिता।
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१५६ ] प्रतिमानाटकम्
छन्दः—वसन्ततिलका ।
अलंकार—उदात्त और दीपक हिमालय को उदात्त शोभा का वर्णन करने से
उदात्त अलंकार है । हरिणान्, द्रुमान्, वनं, लताः इन सब कर्म कारकों का एक क्रिया
आपृच्छ से सम्बन्ध होने के कारण दीपकं अलङ्कार है ।
—o-o-o—
सीता--जं अज्जउत्तो आणवेदि । [यदार्यपुत्र आज्ञापयति ।]
रावणः—कौसल्यामातः ! अलमतिमनोरथेन, न ते मानुषैर्दृश्यन्ते ।
रामः—भगवन् ! किं हिमवति प्रतिवसन्ति ?
रावणः—अथ किम् ?
रामः—तेन हि पश्यतु भवान्—
सौवर्णान् वा मृगांस्तान् मे हिमवान् दर्शयिष्यति ।
भिन्नो मद्बाणवेगेन क्रौञ्चत्वं वा गमिष्यति ॥१२॥
[अन्वयः—सौवर्णान् तान् मृगान् मे हिमवान् वा दर्शयिष्यति । वा मद्बाण-
वेगेन भिन्नः क्रौञ्चत्वं गमिष्यति ।।१२।।
हिन्दी रूपान्तर—
सीता—आर्यपुत्र जो आदेश देते हैं ।
रावण—हे कौसल्यापुत्र ! बहुत अधिक मन की अभिलाषा मत करो ।
मनुष्यों को वे हरिण दिखाई नहीं देते ।
राम—भगवन् ! क्या वे हिमालय पर रहते हैं ?
रावण—और क्या ?
राम—तो आप देखें—
अर्थ [श्लोक १२]—स्वर्ण के रंग के उन काञ्चनमृगों को मुझे हिमालय
दिखा देगा, अथवा मेरे बाणों के वेग से विदीर्ण होकर क्रौञ्च पर्वत की दशा को
प्राप्त होगा । यदि हिमालय मुझे उन स्वर्णमृगों को नहीं दिखायेगा, तो मैं उसको
बाणों के प्रहार से विदीर्ण कर दूंगा । उसकी वैसी ही अवस्था होगी, जैसे कि
परशुराम ने बाणों से बींध कर क्रौञ्च पर्वत की कर दी थी ।।१२।।
संस्कृत-व्याख्या—सौवर्णान् सुवर्णभान् तान् काञ्चनपाश्र्वाभिधेयान् मृगान्
हरिणान् मे मह्यं हिमवान् हिमालयपर्वतः वा दर्शयिष्यति प्रत्यक्षीकारयिष्यति, वा
अथवा मद्बाणवेगेन मम रामस्य बाणानां शराणां वेगेन रंहसा भिन्नः विदीर्णः सन्
क्रौञ्चत्वं क्रौञ्चपर्वतस्य दशां गमिष्यति प्राप्स्यति । यदि हिमालयपर्वतः हिमगिरि-
निवासिनः मुनिजनश्राद्धोपयुक्तान् काञ्चनपाश्र्वाभिधेयान् मृगान् मे न दर्शयिष्यति,
तस्यामवस्थायामहं तं पर्वत स्वबाणपातैः विदारयिष्यामि । तदा स क्रौञ्चपर्वतस्य
षष्ठ एवं सप्तमांक: रावण-वध, राम-प्रत्यागमन, भरतवाक्य व राज्याभिषेक
पञ्चमोऽङ्कः [ १५७
अवस्थां गमिष्यति । कदाचित् शिवशिष्ययोः परशुरामकार्तिकेययोः स्वविद्योत्कृष्टतां
परीक्षितुं स्पर्धा जाता । क्रौञ्चगिरिं य एव स्वबाणैः विदारयिष्यति, स एव विजेता
भविष्यतीति समयः समजति । तदा परशुरामस्य बाणैः विदीर्णः क्रौञ्चपर्वतः सछिद्रः
सञ्जातः । तदेव छिद्रं साहित्ये क्रौञ्चरन्ध्रमिति नाम्ना प्रसिद्धि गतम् । कालिदासेनापि
मेघदूते वर्णितम्-हंसद्वारं भृगुपतियशोवर्त्म यत्क्रौञ्चरन्ध्रम्" । तदेव रन्ध्रं मानससरसो
यात्रां चिकीर्षतां हंसानां मार्गः ॥१२॥
व्याकरण—सुवर्णस्य इदम् = सुवर्ण + अण् = सौवर्ण । मम बाणानां वेगेन =
मद्वाणवेगेन । √भिद् + क्त = भिन्न । क्रोञ्चस्य भावः = क्रोञ्च + त्व =
क्रौञ्चत्व ।
छन्दः—अनुष्टुप् ।
अलंकार—पर्यायोक्त । प्रस्तुत शब्दों से व्यञ्जित होने वाली वस्तु को अन्य
प्रकार से कहना पर्यायोक्त अलङ्कार है । मेरे बाणों से बिंध कर उस हिमालय में
क्रौञ्च पर्वत के समान छिद्र हो जायगा, इस अर्थ के लिए कहा गया कि वह हिमालय
क्रौञ्चत्व को प्राप्त हो जायगा । अतः यहां अन्य प्रकार से कहने से पर्यायोक्त
अलङ्कार है ।
रावणः—(स्वगतम्) अहो, असह्यः खल्वस्यावलेपः । (प्रकाशम्) अये,
विद्युत्सम्पात इव दृश्यते । कौसल्यामातः ! इहस्थमेव भवन्तं पूजयति हिमवान् ।
एष काञ्चनपार्श्वः ।
रामः—भगवतो वृद्धिरेषा ।
सीता—दिट्ठिआ अय्यउत्तो वड्डइ । [दिष्ट्या आर्यपुत्रो वर्धते ।]
रामः—न न—
तातस्यैतानि भाग्यानि यदि स्वयमिहागतः ।
अर्हन्त्येष हि पूजायां लक्ष्मणं ब्रूहि मैथिलि ॥१३॥
। अन्वयः—यदि स्वयम् इह आगतः, तातस्य एतानि भाग्यानि । मैथिली लक्ष्मणं !
ब्रूहि, एष हि पूजायाम् अर्हन्ति ॥१३॥
हिन्दी रूपान्तर—
रावण—(मन में) अहो, इसका घमण्ड तो निश्चय से सहा नहीं जा रहा ।
(प्रकट रूप में) अये, बिजली गिर रही सी प्रतीत होती है । हे कौसल्या के पुत्र !
यहाँ स्थित होते हुये आपका हिमालय पूजन कर रहा है । यह काञ्चनपार्श्व मृग
है ।
राम—यह तो आप भगवान् की महिमा है ।
सीता—भाग्य से आर्यपुत्र की महिमा बढ़ रही हैं ।
१५८ ] प्रतिमानाटकम्
राम—नहीं, नहीं—
अर्थ [श्लोक १३]—यदि यह स्वयं ही यहां आगया है, तो ये पिता जी के अच्छे
भाग्य हैं। हे सीते ! लक्ष्मण से कहो कि यह मृग निश्चय से पूजा के योग्य
है ॥१३॥
संस्कृत-व्याख्या—यदि अयं काञ्चनमृगः स्वयम् आत्मनैव इह अस्मिन् स्थाने
विन्ध्यवने मत्सन्निधौ आगतः विनेव मे प्रयासेन समायातः, एतानि इमानि तु तातस्य
जनकस्यैव भाग्यानि भागधेयानि । पितुः भाग्यैरेवायं काञ्चनमृगस्तस्याभ्युदयायात्र
समायातः । हे मैथिलि सीते ! लक्ष्मणं सौमित्रिं ब्रूहि कथय, एष मृगः हि निश्चयेन
पूजायां वार्षिकश्राद्धविधौ अर्हति उपयुक्तो विद्यते । एनमानीय अनेनैव शीघ्रं श्राद्धकर्म
समापनीयम् ॥१३॥
व्याकरण—भज् + ण्यत् = भाग्य । अस्मिन् अर्थ में = इदम् + ह (इदम् को
इ आदेश) = इह ।
छन्दः—अनुष्टुप् ।
─── ••• ───
सीता—अय्यउत्त ! णं तित्थअत्तादो उवावत्तमाणं कुलवदिं पच्चुग्गच्छेहि
त्ति सन्दिट्ठो सोमित्ती । [आर्यपुत्र ! ननु तीर्थयात्रात उपावर्तमानं कुलपतिं प्रत्यु-
द्गच्छेति सन्दिष्टः सौमित्रिः ।]
रामः--तेन हि अहमेव यास्यामि ।
सीता—अय्यउत्त अहं किं करिस्सं ? [आर्यपुत्र ! अहं किं करिष्यामि ?]
रामः--शुश्रूषयस्व भगवन्तम् ।
सीता—जं अज्जउत्तो आणवेदि । [यदार्यपुत्र आज्ञापयति ।]
(निष्क्रान्तो रामः)
रावणः—अये, अयमर्घ्यमादायोपसर्पति राघवः । एष इदानीं पूजामन-
वेक्ष्य धावन्तं मृगं दृष्ट्वा धनुरारोपयति राघवः—
अहो बलमहो वीर्यमहो सत्त्वमहो जवः ।
राम इत्यक्षरैरल्पैः स्थाने व्याप्तमिदं जगत् ॥१४॥
अन्वय—अहो बलम्, अहो वीर्यम्, अहो सत्त्वम्, अहो जवः । स्थाने, राम
इति अल्पैः अक्षरैः इदं जगद् व्याप्तम् ॥१४॥
हिन्दी रूपान्तर—
सीता—आर्यपुत्र ! निश्चय से आपने ही, तीर्थयात्रा से वापिस लौटे हुये
कुलपति की अगवानी करने के लिये लक्ष्मण को आदेश दिया है।
राम—इसलिये मैं ही जाऊँगा।
पञ्चमोऽङ्कः । १५६
सीता—आर्यपुत्र ! मैं क्या करूंगी ?
राम—भगवान् की सेवा करो।
सीता—आर्यपुत्र जो आदेश देते हैं।
(राम निकल जाते हैं)
रावण—अरे, ये राम तो मेरे सत्कार की पूजन सामग्री की लेकर आ रहे
थे। अब पूजा-सामग्री की उपेक्षा करके, मृग को दौड़ते हुये देखकर ये राम धनुष पर
बाण चढ़ा रहे हैं।
अर्थ [श्लोक १४]—राम का बल आश्चर्यजनक है, राम का पराक्रम
आश्चर्यजनक है, राम का पौरुष आश्चर्यजनक है और राम का वेग आश्चर्यजनक है।
यह बात ठीक है कि राम इन थोड़े से अक्षरों से यह संसार व्याप्त हो गया है।
राम का यश सारे संसार में व्याप्त हो गया है ॥१४॥
संस्कृत-व्याख्या—अहो बलं रामस्य शारीरिकी शक्तिः आश्चर्यभूता वर्तते,
अहो वीर्यं रामस्य आन्तरिकपराक्रमः विस्मयास्पदः वर्तते, अहो सत्त्वं रामस्य धैर्यमा-
श्चर्यजनकं वर्तते, अहो जवः रामस्य वेगः शीघ्रगमनं धनुषि च वेगेन बाणसंयोजनं
विस्मयास्पदतां गतः । अतः स्थाने, उचितमेवेदं यत् राम इति अल्पैः त्रित्त्वमपि भजद्भिः
अक्षरैः इदमेतत् जगत् विश्वं व्याप्तम् । अस्य रामस्य कीर्तिः सर्वस्मिन्नेव जगति
प्रथिता इति भावः ॥१४॥
व्याकरण—वीरे साधु अथवा वीर्यते अनेन = वीर + यत् = वीर्यं । सतोभावः =
सत् + त्व = सत्त्व । √ गम् + क्विप् = जगत् । वि + √ आप् + क्त = व्याप्त ।
छन्दः—अनुष्टुप् ।
अलङ्कार—उदात्त । राम के अतिशय गुणों का कथन करने से उदात्त
अलङ्कार है।
कुलपतिम्—शिक्षा का प्रधान अधिकारी कुलपति होता था । वह दस हजार
छात्रों का भरण-पोषण करने तथा शिक्षा का प्रबन्ध करने में समर्थ होता था—
मुनीनां दश साहस्त्रं योऽन्नदानादिपोषणात् ।
अध्यापयति विप्रर्षिरसौ कुलपतिः स्मृतः ॥
एष मृग एकप्लुतातिक्रान्तशरविषयो वनगहनं प्रविष्टः ।
सीता—(आत्मगतम्) अय्यउत्तविरहिदाए भअं मे एत्थ उप्पज्जइ । [आर्य-
पुत्रविरहिताया भयं मेऽत्रोत्पद्यते ।
रावणः—(आत्मगतम्)
माययापहृते रामे सीतामेकां तपोवनात् ।
हरामि रुदतीं बालाम्मन्त्रोक्तामिव आहुतिम् ॥१५॥
१६० ] प्रतिमानाटकम्
अन्वयः—मायया रामे अपहृते एकां रुदतीं बालां सीतां तपोवनात् अमन्त्रो-
क्ताम् आहुतिम् इव हरामि ॥१५॥
हिन्दी रूपान्तर—
एक ही कूद में बाण के लक्ष्य को लांघ कर यह मृग घने वनों में घुस गया है।
सीता—(अपने मन में) आर्यपुत्र से वियुक्त होकर मुझ में यह भय उत्पन्न
हो रहा है ।
रावण—(अपने मन में)
अर्थ [श्लोक १५]—काञ्चनमृग की माया के द्वारा राम को दूर कर देने
पर, मैं, अकेली, रोती हुई और स्वल्पायु सीता को तपोवन से, मन्त्रोच्चारण से रहित
आहुति के समान हर लेता हूँ ॥१५॥
संस्कृत व्याख्या—मायया काञ्चनपार्श्वमृगोपस्थानरूपेण छलेन रामे दाशरथो
अपहृते दूरदेशं प्रापिते सति, एकाम् असहायां रुदतीं क्रन्दन्तीं बालां स्वल्पवयस्कां
सीतां जानकीं तपोवनात् मुन्याश्रमस्थानात्, अमन्त्रोक्तां मन्त्रोच्चारणविरहितां स्वा-
हेतिवचनशून्याम् आहुतिं हव्यम् इव हरामि अपनयामि । यथा मन्त्रोच्चारणरहिता
यज्ञाहुतिः राक्षसैैरपह्रियते, तथैव रामरहितामेकाकिनीं सीतामहं हरामि ॥१५॥
व्याकरण—अप + हृ + क्त = अपहृत । मीयते अनया = √ मा + य + टाप् =
माया ।
छन्द—अनुष्टुप् ।
अलङ्कार—उपमा । यहाँ सीता उपमेय, आहुति उपमान, इव उपमा-
वाचक शब्द और हरण करना साधारण धर्म हैं । उपमा के चारों अंग होने से
पूर्णोपमा है ।
एकप्लुतातिक्रान्तशरविषयः—एकेन प्लुतेन अतिक्रान्तः शराणां विषयः
येन स ।
सीता—जाव उडजं पविसाभि । [यावदुटजं प्रविशामि।] । (गन्तुमीहते) ।
रावणः—(स्वरूपं गृहीत्वा) सीते ! तिष्ठ तिष्ठ ।
सीता—(सभयम्) हं को दाणि अअं ? [हं क इदानीमयम् ? ]
रावणः—किं न जानीषे ?
युद्धे येन सुराः सदानवगणाः शक्रादयो निर्जिताः
दृष्ट्वा शूर्पणखाविरूपकरणं श्रुत्वा हतौ भ्रातरौ ।
दर्पाद दुर्मतिमप्रमेयबलिनं रामं विलोभ्यच्छलैः
स त्वां हर्तु मना विशालनयने प्राप्तोऽस्म्यहं रावणः ॥१६॥
पञ्चमोऽङ्कः । १६१
[अन्वयः—येन युद्धे सदानवगणाः शक्रादयः सुराः निर्जिताः, शूर्पणखाविरूप-
करणं दृष्ट्वा, भ्रातरौ हतौ श्रुत्वा, विशालनयने ! स अहं रावणः अप्रमेयबलिनं दुर्मतिं
रामं छलैः विलोभ्य दर्पात् त्वां हर्तुमनाः प्राप्तः अस्मि ॥१६॥]
हिन्दी रूपान्तर—
सीता—तो मैं कुटी में प्रविष्ट होती हूँ। (जाने की चेष्टा करती है) ।
रावण—(अपने वास्तविक स्वरूप को धारण करके) सीते ! ठहरो,
ठहरो।
सीता—(भयभीत होकर) हं, अब यह कौन है ?
रावण—क्या तुम नहीं जानती—
अर्थ [श्लोक १६]—जिसने युद्ध में दानवों सहित इन्द्र आदि देवताओं को
जीत लिया था, शूर्पणखा को नाक-कान कर विरूप किया गया देखकर तथा खर-
दूषण दोनों भाइयों को मारा गया सुनकर, हे विशाल नेत्रों वाली सीते ! वह
मैं रावण, असीम बलशाली तथा दुष्ट बुद्धि वाले राम को कपट द्वारा विलोभित
करके, घमण्ड में भरकर तुम्हारा अपहरण करने के लिये आ पहुँचा हूँ ॥१६॥
संस्कृत-व्याख्या—येन रावणेन युद्धे समरे सदानवगणाः दैत्यानां संघैः सहिताः
शक्रादयः इन्द्रादयः सुराः देवताः निर्जिताः निरवशेषं परास्ताः, शूर्पणखाविरूपकरणं
शूर्पणखायाः एतदभिधेयायाः स्वभगिन्याः विरूपकरणं रामलक्ष्मणाभ्यां नासाकर्णच्छेदनेन
विरूपतासम्पादनं दृष्ट्वा अवलोक्य, मे भ्रातरौ खरदूषणौ हतौ रामेण । व्यापादितौ
इति श्रुत्वा आकर्ण्य, विशालनयने विशाले आयते नयने नेत्रे यस्याः तादृशी हे सीते !
स अहं एतद्गुणविशिष्टः अहं रावणः दशाननः, अप्रमेयबलिनम् अप्रमेयं न मातुं
शक्यम् अप्रतिमं बलं शारीरिकसामर्थ्यं यस्य तादृशं दुर्मतिं दुष्टा भ्रष्टा मतिः बुद्धिः
यस्य तं रामं दाशरथि छलैः कपटैः मायामृगरूपैः विलोभ्य लोभयित्वा प्रतार्य इत्यर्थः,
दर्पात् स्वभुजवीर्याभिमानात् त्वां जानकीं हर्तुमनाः अपहर्तुमिच्छुः सन् प्राप्तः अस्मि
अत्र दण्डकारण्य समागतोऽस्मि ॥१६॥
व्याकरण—दानवानां गणाः दानवगणाः तैः सा...
पत्यम् = दनु + अण् = दानव । शूर्पणखायाः विरूपस्य वा, लक्ष्मणं वा स्वदेवरं
करणम् । शूर्पा इव नखाः यस्या सा शूर्पणखा । √कृ + ल्युट्न्तानामानं स्वश्वशुरं वा,
मतिः यस्य स = दुर्मतिः । मन् + क्तिन् = मति । हर्तुं मनः मति । कुपुरुषसंश्रितैः
√हृ + तुमुन् = हर्तुम् । तान् प्रति प्रयुक्तैः
छन्दः—शार्दूलविक्रीडित । ऽपि प्रयोजनसिद्धिः
हरिणानां शिशवः
सीता—हं लावणो णाम ? [हुं रावणो नाम ?] (प्रतिष्ठते) रामलक्ष्मण-
रावणः—आः, रावणस्य चक्षुर्विषयमागता क्व यास्यसि ? शक्यन्ति ।
१६२ ] प्रतिमानाटकम्
सीता—अय्यउत्त ! परित्ताआहि परित्ताआहि । सोमित्ती ! परित्ताआहि,
परित्ताआहि मं । [आर्यपुत्र ! परित्रायस्व, परित्रायस्व । सौमित्रे ! परित्रायस्व
परित्रायस्व माम् ।]
रावणः—सीते ! श्रूयतां मत्पराक्रमः—
भग्नः शक्रः कम्पितो वित्तनाथः
कृष्टः सोमो मर्दितः सूर्यपुत्रः ।
धिग् भा स्वर्गं भीतदेवैर्निविष्टं
धन्याभूमिर्वर्तते यत्र सीता ॥१७॥
[अन्वयः—शक्रः भग्नः, वित्तनाथः कम्पितः, सोमः कृष्टः, सूर्यपुत्रः मर्दितः
भो ! भीतदेवैः निविष्टं स्वर्गं धिक्, भूमिः धन्या, यत्र सीता वर्तते ॥१७॥]
हिन्दी रूपान्तर—
सीता—हुँ, तो यह रावण है ? (चलने लगती है) ।
रावण—आः, रावण की दृष्टि में आकर कहाँ जायगी ?
सीता—आर्यपुत्र ! रक्षा करो, रक्षा करो । हे लक्ष्मण ! मेरी रक्षा करो;
रक्षा करो ।
रावण—सीते ! मेरे पराक्रम के विषय में सुनो—
अर्थ [श्लोक १७]—युद्ध में मैंने इन्द्र को पराजित कर दिया, धन के देवता
कुबेर को कँपा दिया, चन्द्रमा को खींच लिया और सूर्य के पुत्र यम को मसल डाला ।
हे सीते ! डरे हुये देवता जिसमें प्रविष्ट होकर छिप गये उस स्वर्ग को धिक्कार है ।
वह भूमि धन्य है, जहाँ सीता विद्यमान है ॥१७॥
संस्कृत-व्याख्या—शक्रः इन्द्रः भग्नः मया युद्धे पराजितः, वित्तनाथः वित्तानां :
धनानां नाथः स्वा... ...वणः कम्पितः भयेन चालितः, सोमः चन्द्रः कृष्टः
स्वदेशात्... ...हर्म्यशिखरे निहितः, सूर्यपुत्रः सूर्यस्य पुत्रः यमः
म... ...तः । एतादृशो मे रावणस्य पराक्रमः । भीतदेवैः भीतैः
सीता—जाव ...विष्टं निलिय स्थितं यत्र तथाभूतं स्वर्गं नाकं धिक् । अतीव-
रावणः—( ...तरजननिवासयोग्यम् । भूमि सा धरित्री एव धन्या प्रशंसनीया
सीता— ...स्थाने सीता त्वादृशी रमणीयसौन्दर्यादिगुणशालिनी स्त्री वर्तते
रावणः
य—√भञ्ज् + क्त = भग्न । √विद् + क्त = वित्त । सु + मन् =
र
—शालिनी ।
ङ्कार—उदात्त । रावण द्वारा अपने पराक्रमरूप उदार सम्पत्ति का वर्णन
...दात्त अलङ्कार है ।
पञ्चमोऽङ्कः । १६३
चक्षुर्विषयम्—चक्षुषोः विषयम् । रावण की दृष्टि में जो पड़ गया, वह बच
नहीं सकता ।
सीता—अय्यउत्त ! परित्ताआहि, परित्ताआहि । सोमित्ती परित्ताआहि,
परित्ताआहि मं । [आर्यपुत्र ! परित्रायस्व, परित्रायस्व । सौमित्रे ! परित्रायस्व,
परित्रायस्व माम् ।]
रावणः—
रामं वा शरणमुपेहि लक्ष्मणं वा
स्वर्गस्थं दशरथमेव वा नरेन्द्रम् ।
किं वा स्यात् कुपुरुषसंश्रितैर्वचोभि-
र्न व्याघ्रं मृगशिशवः प्रधर्षयन्ति ॥१८॥
[अन्वयः—रामं वा, लक्ष्मणं वा, स्वर्गस्थं नरेन्द्रं दशरथम् एव वा शरणम्
उपेहि, कुपुरुषसंश्रितैः वचोभिः किं वा स्यात् ? मृगशिशवः व्याघ्रं न प्रधर्ष-
यन्ति ॥१८॥]
हिन्दी रूपान्तर—
सीता—आर्यपुत्र ! रक्षा करो, रक्षा करो । हे लक्ष्मण ! मेरी रक्षा करो,
रक्षा करो ।
रावण—
अर्थ [श्लोक १८]—चाहे तुम राम की, अथवा लक्ष्मण की अथवा स्वर्ग में
स्थित राजा दशरथ की ही शरण में जाओ, कायर पुरुषों का आश्रय लेकर
कहे गये इन वचनों से क्या लाभ है ? मृगों के बच्चे बाघ को घर्षित नहीं कर
सकते । तुम किसी की शरण को क्यों न पुकारो, मुझसे तुमको कोई बचा नहीं
सकता ॥१८॥
संस्कृत-व्याख्या—रामं वा स्वभर्त्तारं दाशरथिं वा, लक्ष्मणं वा स्वदेवरं
सौमित्रिं वा, स्वर्गस्थं स्वर्गे वर्तमानं नरेन्द्रं राजानं दशरथं तन्नामानं स्वश्वसुरं वा,
शरणं त्रातारम् उपेहि आश्रयस्व, अनेन तव किमपि न सिध्यति । कुपुरुषसंश्रितैः
कुत्सिताः दुर्बलत्वेन कुत्साविषयाः पुरुषाः रामलक्ष्मणदशरथाः तान् प्रति प्रयुक्तैः
वचोभिः परित्रायस्वेति कथनैः किं वा स्यात् को लाभः ? न कोऽपि प्रयोजनसिद्धिः
भविष्यति । न कोऽपि तव रक्षां विधातुं समर्थः । मृगशिशवः मृगाणां हरिणानां शिशवः
बालकाः व्याघ्रं द्वीपिनं न प्रधर्षयन्ति पराजेतुं समर्थाः भवन्ति । एते सर्वे रामलक्ष्मण-
दशरथाः पराक्रमे मृगशिशुसदृशाः अहं च व्याघ्रतुल्यः । न ते मां पराजेतुं शक्ष्यन्ति ।
अतः व्यर्थमेव ते समुद्दिश्य विलापः ॥१८॥
१६४ ] प्रतिमानाटकम्
व्याकरण—शृणाति दुःखम् अनेन = √शृ + ल्युट् (अन) = शरण। कुत्सितः
पुरुषः = कुपुरुषः ।
छन्दः—प्रहर्षिणी ।
अलङ्कार—दृष्टान्त । उपमान में उपमेय के सामान्य धर्म का प्रतिबिम्बित
होना दृष्टान्त अलङ्कार है । राम आदि मुझको पराजित नहीं कर सकते इस उपमेय
के सामान्य धर्म का, मृगशिशु व्याघ्र को पराजित नहीं कर सकते, इस उपमान में
प्रतिबिम्बन होने से दृष्टान्त अलङ्कार है ।
सीता—अय्यउत्त ! परित्ताआहि, परित्ताआहि । सोमित्ती ! परित्ताआहि,
परित्ताआहि मं । [आर्यपुत्र ! परित्रायस्व, परित्रायस्व । सौमित्रे ! परित्रायस्व,
परित्रायस्व माम् ।]
रावणः—
विलपसि किमिदं विशालनेत्रे
विगणय मां च यथा तवार्यपुत्रम् ।
विपुलबलयुतो ममैवयोद्धुं
ससुरगणोऽप्यसमर्थ एव रामः ॥१६॥
[अन्वयः—विशालनेत्रे ! इदं किं विलपसि ? यथा तव आर्यपुत्रं मां
च विगणय । विपुलबलयुतः ससुरगणः अपि रामः मम एव योद्धुम् असमर्थ
एव ।।१६।।]
हिन्दी रूपान्तर—
सीता—आर्यपुत्र ! रक्षा करो, रक्षा करो । हे लक्ष्मण ! मेरी रक्षा करो,
रक्षा करो ।
रावण—
अर्थ [श्लोक १६]—विशाल नेत्रों वाली हे सीते ! यह तुम क्या विलाप
कर रही हो ? जैसे तुम्हारे आर्यपुत्र हैं, मुझको तुम वैसा ही समझ लो । बहुत अधिक
बल से युक्त होते हुये और समस्त देवताओं को साथ लेकर भी राम मेरे साथ युद्ध
करने में असमर्थ ही हैं ।।१६।।
संस्कृत-व्याख्या—विशालनेत्रे विशाले आयते नेत्रे यस्याः तथाभूते हे सीते !
इदं किं विलपसि कस्माद्धेतोस्त्वमेवं विलापं कुरुषे ? व्यर्थमेव तव इदं विलपनम्, न
कोऽपि ते साहाय्यं करिष्यति । यथा येन प्रकारेण तव ते आर्यपुत्रं भर्तारं रामं तमिव
मां रावणमपि विगणय सम्भावय । अहं रामादपि बलशाली वर्ते, अतः मामेव त्वं
भर्तृरूपेण जानीहि । विपुलबलयुतः विपुलेन महता बलेन शारीरिकसामर्थ्येन सैन्येन
वा युतः सहितः, ससुरगणः सुराणां देवानां गणेन संघेन सहितः देवानां साहाय्यं प्राप्य
अपि रामः ते भर्ता मम एव रावणस्य युद्धे समरे अवस्थातुम् असमर्थः अशक्तः।
विपुलसैन्यसहितः देवगणसहितश्चापि स न मां युद्धे पराजेतुं समर्थः। अतस्त्वं मामेव
पतिरूपेण सम्भावय ॥१६॥
व्याकरण—विशाले नेत्रे यस्याः सा = विशालनेत्रा। नीयते अनेन = √नी +
ष्ट्रन् = नेत्र। √ऋ + ण्यत् = आर्य। विपुलेन बलेन युतः = विपुलबलयुतः। √यु +
क्त = युत।
छन्दः—पुष्पिताग्रा।
अलङ्कार—हेतु। तुम मुझको पति समझो, इस कथन का हेतु कहा गया
है कि राम मुझको युद्ध में हरा नहीं सकता। हेतु और हेतुमान् का कथन करने से
हेतु अलङ्कार है।
सीता—(सरोषम्) सत्तो सि। [शप्तोऽसि।]
रावणः—अहह अहो पतिव्रतायास्तेजः—
योऽहमुत्पतितो वेगान्न दग्धः सूर्यरश्मिभिः।
अस्याः परिमितैर्दग्धः शप्तोऽसीत्येभिरक्षरैः ॥२०॥
[अन्वयः—वेगाद् उत्पतितः यः अहं सूर्यरश्मिभिः न दग्धाः, अस्याः परिमितैः,
शप्तः असि, इति एभिः अक्षरैः दग्धः ॥२०॥]
हिन्दी रूपान्तर—
सीता—मैं तुझको शाप देती हूँ।
रावण—हाय, हाय। पतिव्रता का तेज आश्चर्यजनक है—
अर्थ [श्लोक २०]—वेग से ऊपर आकाश में उड़ता हुआ भी जो मैं सूर्य की
किरणों से जलाया नहीं जा सका, इस सीता के थोड़े से ही, "मैंने तुझको शाप दिया
है", इस प्रकार के इन अक्षरों से झुलस गया हूँ ॥२०॥
संस्कृत-व्याख्या—वेगात् अतिशीघ्रगत्यो उत्पतितः व्योम्नि उड्डीयमानः यः अहं
रावणः सूर्यरश्मिभि भास्करप्रखरकिरणैरपि न दग्धः परितापितः, सोऽहम् अस्याः
सीतायाः परिमितैः अतिस्वल्पैः "शप्तः असि", इति एभिः अक्षरैः वर्णैः दग्धः
परितापितोऽस्मि सूर्यस्य तेजसोऽपि अभिभवने समर्थोऽहं सीतायाः शापेन व्याकुली-
भूतः ॥२०॥
व्याकरण—सूर्यस्य रश्मिभिः = सूर्यरश्मिभिः। √सृ + क्यप् (निपातनात्) =
सूर्य। √अश् + मि (धातु को रशादेश) = रश्मि। दह् + क्त = दग्ध। शप् + क्त =
शप्त।
छन्दः—अनुष्टुप्।
१६६ [ ] प्रतिमानाटकम्
अलङ्कार—व्यतिरेक । उपमा सूर्य की अपेक्षा उपमेय सीता में तेज के
आधिक्य का वर्णन करने से व्यतिरेक अलङ्कार है ।
सीता—अय्यउत्त ! परित्ताआहि, परित्ताआहि । [आर्यपुत्र ! परित्रायस्व;
परित्रायस्व ।]
रावणः—(सीतां गृहीत्वा) भो भोः ! जनस्थाननिवासिनस्तपस्विनः !
शृण्वन्तु भवन्तः—
बलादेव दशग्रीवः सीतामादाय गच्छति ।
क्षात्रधर्मे यदि स्निग्धः कुर्याद् रामः पराक्रमम् ॥२१॥
[अन्वयः—दशग्रीवः बलाद् एव सीताम् आदाय गच्छति । यदि रामः क्षात्र-
धर्मे स्निग्धः, पराक्रमं कुर्यात् ॥२१॥]
हिन्दी रूपान्तर—
सीता—आर्यपुत्र ! रक्षा करो, रक्षा करो ।
रावण—(सीता को पकड़कर) हे हे ! जनस्थान में रहने वाले तपस्वियों !
आप सुनें—
अर्थ [श्लोक २१]—यह रावण जबरदस्ती सीता को लेकर जा रहा है ।
यदि राम को क्षात्रधर्म के प्रति आस्था है, तो पराक्रम प्रकट करे ॥२१॥
संस्कृत-व्याख्या—दशग्रीवः दश ग्रीवाः कण्ठाः यस्य स दशग्रीवः दशमनुष्य-
तुल्यपराक्रमशाली अयं रावणः बलात् स्वभुजसामर्थ्यादेव सीतां जानकीम् आदाय
अपहृत्य गच्छति स्वपुरीं याति । यदि रामः क्षात्रधर्मे स्वक्षत्रियाणां कर्तव्ये स्निग्धः
अनुरागवान्, पराक्रमं कुर्यात् प्रकटयेत् । रावणेन मयेयं सीता बलादपह्रियते । यदि
रामः सत्यमेव क्षत्रियोऽस्ति, युद्धे मां विजित्य स्वभार्यायाः सीतायाः मोक्षणं
कुर्यात् ॥२१॥
व्याकरण—दश ग्रीवाः यस्य स = दशग्रीवः । क्षात्राणां धर्मं = क्षात्रधर्मं ।
क्षतात् त्रायते = क्षत + √त्रै + क = क्षत्र । क्षत्रस्येदम् = क्षत्र + अण् = क्षात्र । धरति
लोकान्, ध्रियते वा यः पुण्यशालिभिः = √धृ + मन् = धर्म । √स्निह् + क्त =
स्निग्ध ।
छन्दः—अनुष्टुप् ।
सीता—अय्यउत्त ! परित्ताआहि, परित्ताआहि ।
रावणः—(परिक्रामन् विलोक्य) अये, स्वपक्षपवनोत्क्षेपक्षुभितवनखण्ड-
श्चण्डचञ्चुरभिधावत्येष जटायुः । आः, तिष्ठेदानीम्—
मद्भुजाकृष्टनिस्त्रिंशकृत्तपक्षक्षतच्युतैः ।
रुधिरैराद्रपक्षस्त्वां नयामि यमसादनम् ॥२२॥
पञ्चमोऽङ्कः [ १६७
(निष्क्रान्तौ)
[अन्वयः—मद्भुजाकृष्टनिस्त्रिंशकृत्तपक्षक्षतच्युतैः रुधिरैः आर्द्रगात्रं त्वां यम-
सादनं नयामि ॥२२॥]
हिन्दी रूपान्तर—
सीता—आर्यपुत्र ! रक्षा करो, रक्षा करो ।
रावण—(घूमते हुये देखकर) अरे, अपने पंखों की वायु के तेज प्रवाह से इस
वनप्रान्त को क्षुब्ध कर देने वाला तथा कठोर भयानक चोंच वाला यह जटायु मेरी
ओर दौड़ा आ रहा है। आः, अब ठहर—
अर्थ [श्लोक २२]—अपनी भुजाओं से खींचे गये तीक्ष्ण खड्ग से काटे
गये पंखों के घाव से गिरते रुधिर से भीगे शरीर वाले तुमको मैं यम के घर पहुँचा
देता हूँ ॥२२॥
(सीता और रावण दोनों निकल जाते हैं।)
इति पञ्चमोऽङ्कः
पाँचवा अङ्क पूरा हुआ।
संस्कृत-व्याख्या—मद्भुजाकृष्टनिस्त्रिंशकृत्तपक्षक्षतच्युतैः मम रावणस्य भुजाभ्यां
बाहुभ्याम् आकृष्टेन उद्धृतेन निस्त्रिंशेन तीक्ष्णखड्गेन कृत्तयोः छिन्नयोः पक्षयोः यत्
क्षतं व्रणः तस्मात् च्युतैः प्रवहमानैः रुधिरैः शोणितैः आर्द्रगात्रं आर्द्राणि क्लिन्नानि
गात्राणि अङ्गानि यस्य तथाभूतं त्वां जटायुषं यमसादनं यमस्य सादनं गृहं यमलोक-
मित्यर्थः नयामि प्रापयामि। त्वं मामभिभवितुमुद्यतः । अहं स्वभुजबलसामर्थ्येन खड्ग-
माकृष्य तव पक्षच्छेदं करिष्यामि तदनन्तरं ततः प्रवहमानैः रुधिरैः तव वपुः क्लिन्नं
भविष्यति । तदनन्तरं त्वं मरणमवाप्य यमलोकं गमिष्यसि ॥२२॥
व्याकरण—मम भुजाभ्याम् आकृष्टेन निस्त्रिंशेन कृत्तयोः पक्षयोः क्षतात्
च्युतैः = मद्भुजाकृष्टनिस्त्रिंशकृत्तपक्षक्षतच्युतैः । आ + √कृष् + क्त = आकृष्ट ।
निस् + त्रिंश = निस्त्रिंश । √क्षण् + क्त = क्षत । आर्द्राणि गात्राणि यस्य तम् =
आर्द्रगात्रम् । √अर्द् + रक् (दीर्घ) = आर्द्र । √गम् + त्रन् = गात्र । यमस्य साद-
नम् = यमसादनम् ।
छन्दः—अनुष्टुप् ।
अलङ्कार—पर्यायोक्त । मैं तुम्हारे प्राण नष्ट कर दूंगा, इस अर्थ का कथन
अन्य प्रकार से, यम के घर पहुँचा दूंगा, करने से पर्यायोक्त अलङ्कार है ।
स्वपक्षपवनोत्क्षेपक्षुभितवनखण्डः—स्वस्य पक्षयोः पवनस्य उत्क्षेपेण क्षुभितः
वनखण्डः येन सः ।
चण्डचञ्चुः—चण्डा चञ्चूः यस्य स । √चण्ड् + अच् = चण्ड । चञ्च् +
उन् = चञ्चु । स्त्रीलिङ्ग में—चञ्चु + अङ् = चञ्चू ।
इति भासविरचितप्रतिमानाटके डा० कृष्णकुमारकृतव्याख्यायाः
पञ्चमोऽङ्कः समाप्तः
—:०:—
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA
षष्ठोऽङ्कः
(ततः प्रविशतो वृद्धतापसौ)
उभौ—परित्रायन्तां परित्रायन्तां भवन्तः ।
प्रथमः— इयं हि नीलोत्पलदामवर्चसा
मृणालशुक्लोज्ज्वलदंष्ट्रहासिना ।
निशाचरेन्द्रेण निशार्धचारिणा
मृगीव सीता परिभूय नीयते ॥१॥
[अन्वय—नीलोत्पलदामवर्चसा मृणालशुक्लोज्ज्वलदंष्ट्रहासिना निशार्धचारिणा
निशाचरेन्द्रेण इयं सीता मृगी इव हि परिभूय नीयते ॥१॥]
हिन्दी रूपान्तर—
(तदनन्तर दो वृद्ध तपस्वी प्रवेश करते हैं)
दोनों—आप सब रक्षा करें, रक्षा करें।
पहला—
अर्थ [श्लोक १]—नीले कमलों की माला के समान कान्ति वाला अर्थात्
काले रंग का, कमलनाल के समान शुभ्र तथा उज्ज्वल दाढ़ों को दिखा कर हंसने
वाला आधी, रात में विचरण करने वाला यह राक्षसराज इस सीता को हरिणी के
समान, बलपूर्वक अपहरण करके ले जा रहा है ॥१॥
संस्कृत व्याख्या—नीलोत्पलदामवर्चसा नीलं कृष्णवर्णं यदुत्पलं नीलकमल-
मित्यर्थः तेषां दाम माला इव वर्चः कान्तिः वर्णः यस्य तादृशः, अत्यधिक श्यामल-
कान्तिः, मृणालशुक्लोज्ज्वलदंष्ट्रहासिना मृणालानि कमलनालाः तानीव शुक्लाः
शुभ्रवर्णाः उज्ज्वलाः कान्तिमत्यः याः दंष्ट्राः ताभिः हसति इति तादृशेन यदैव हसति
तदैव तस्य मृणालवत् शुक्लाः उज्ज्वलाश्च दंष्ट्राः भासन्ते, निशार्धचारिणा निशायाः
रजन्याः अर्धं निशार्धं तस्मिन् समये भ्रमति इति तथाभूतेन निशाचरेन्द्रेण निशा-
चराणां राक्षसानाम् इन्द्रेण स्वामिना राक्षसराजेन रावणेन इयम् एषा सीता जानकी
मृगी इव हरिणी इव परिभूय तिरस्कृत्य बलात् नीयते अपह्रियते । अयं राक्षसराजो
रावणः सीतां हठाद् अपहृत्य नयति ॥१॥
व्याकरण—नीलं च तदुत्पलं नीलोत्पलम् तेषां दाम इव वर्चः यस्य तेन =
नीलोत्पलदामवर्चसा । √वर्च् + असुन् = वर्चस् । उन् + √पल् + अच् = उत्पल ।
मृणालानीव शुक्लाः उज्ज्वलाश्च याः दंष्ट्राः ताभिः हसितुं शीलं यस्य तेन । मृण् +
कालन् = मृणालम् । √दंश् + ष्ट्रन् + टाप् = दंष्ट्रा । हसितुं शीलं यस्य स = हस् +
षष्ठोऽङ्कः [ १६६ ]
णिनि = हासिन् । निशायां चरति = निशा + √ चर् + ट = निशाचर । निशाचरणाम्
इन्द्रः = निशाचरेन्द्रः । निशायाः अर्धम् = निशार्धम् । परि + √ भू + क्त्वा (ल्यप्) =
परिभूय ।
छन्दः—वंशस्थ ।
अलङ्कार—यमक और उपमा । निशाचरेन्द्रेण और निशार्धचारिणा में यमक
अलङ्कार है । नीलोत्पलदाम वर्चसा में नीलोत्पलदाम उपमान निशाचरेन्द्र उपमेय
वर्चस् साधारण धर्म है । उपमा वाचक पद का लोप होने से वाचकलुप्तोपमा
समासगा अलङ्कार है । मृणालशुक्लोज्ज्वलदंष्ट्रहासिना में मृणाल उपमान, दंष्ट्रा
उपमेय, शुक्ल और उज्ज्वल साधारण धर्म है । उपमा वाचक पद का लोप होने से
वाचकलुप्तोपमा समासगा अलङ्कार है । मृगीव सीता में मृगी उपभान, सीता उपमेय
इव उपमावाचक पद तथा परिभूय नीयते साधारण धर्म हैं । अतः पूर्णोपमा है ।
द्वितीयः—एषा खलु तत्रभवती वैदेही—
विचेष्टमानेव भुजङ्गमाङ्गना
विधूयमानेव च पुष्पिता लता ।
प्रसह्य पापेन दशाननेन सा
तपोवनात् सिद्धिरिवापनीयते ॥२॥
[अन्वयः—विचेष्टमाना भुजङ्गमाङ्गना इव, विधूयमाना प्रष्पिता लता इव; सा
पापेन दशाननेन प्रसह्य तपोवनात् सिद्धिः इव अपनीयते ॥२॥ ]
हिन्दी रूपान्तर—
दूसरा—ये आदरणीय सीता—
अर्थ [श्लोक २]—तड़पती हुई सर्पिणी से समान और कांपती हुई पुष्पित
लता के समान वह सीता, पापी रावण के द्वारा बलपूर्वक तपोवन से मानो सिद्धि हो,
इस प्रकार ले जाई जा रही हैं ॥२॥
संस्कृत-व्याख्या—विचेष्टमाना समुपस्थितविपत्प्रतीकाराम विविर्ध चेष्टमाना
भुजङ्गमाङ्गना सर्पिणी यथा निगृह्य नीयमाना सर्पिणी आत्मानं मोचयितुं विविधं
चेष्टते, तथैवेयं सीता चेष्टमाना वर्तते । विधूयमाना पवनादिवेगेन कम्पमाना पुष्पिता
पुष्पादि समृद्धिसमृद्धा लता वल्लरी इव सा तत्र भवती जानकी पापेन पापकमंकारिणा
दशाननेन दश आननानि मुखानि यस्य तेन रावणेन प्रसह्य हठात् बलप्रयोगं
कृत्वा तपोवनात् अस्मात् आश्रमात् सिद्धिः इयं तपःफल सम्पद वर्तते सेव अपनीयते
अपहृत्यनीयते । अतः अस्य रक्षा कर्तव्येतिभावः ॥२॥
व्याकरण—वि + √ चेष्ट् + शानच् + टाप् = विचेष्टमाना । भुजङ्गमानाम्
अङ्गना = भुजङ्गमाङ्गना । भुजं कुटिलं गच्छति = भुजम् + √ गम् + खच् (मुम् का