प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः । १५६
सीता—आर्यपुत्र ! मैं क्या करूंगी ?
राम—भगवान् की सेवा करो।
सीता—आर्यपुत्र जो आदेश देते हैं।
(राम निकल जाते हैं)
रावण—अरे, ये राम तो मेरे सत्कार की पूजन सामग्री की लेकर आ रहे
थे। अब पूजा-सामग्री की उपेक्षा करके, मृग को दौड़ते हुये देखकर ये राम धनुष पर
बाण चढ़ा रहे हैं।
अर्थ [श्लोक १४]—राम का बल आश्चर्यजनक है, राम का पराक्रम
आश्चर्यजनक है, राम का पौरुष आश्चर्यजनक है और राम का वेग आश्चर्यजनक है।
यह बात ठीक है कि राम इन थोड़े से अक्षरों से यह संसार व्याप्त हो गया है।
राम का यश सारे संसार में व्याप्त हो गया है ॥१४॥
संस्कृत-व्याख्या—अहो बलं रामस्य शारीरिकी शक्तिः आश्चर्यभूता वर्तते,
अहो वीर्यं रामस्य आन्तरिकपराक्रमः विस्मयास्पदः वर्तते, अहो सत्त्वं रामस्य धैर्यमा-
श्चर्यजनकं वर्तते, अहो जवः रामस्य वेगः शीघ्रगमनं धनुषि च वेगेन बाणसंयोजनं
विस्मयास्पदतां गतः । अतः स्थाने, उचितमेवेदं यत् राम इति अल्पैः त्रित्त्वमपि भजद्भिः
अक्षरैः इदमेतत् जगत् विश्वं व्याप्तम् । अस्य रामस्य कीर्तिः सर्वस्मिन्नेव जगति
प्रथिता इति भावः ॥१४॥
व्याकरण—वीरे साधु अथवा वीर्यते अनेन = वीर + यत् = वीर्यं । सतोभावः =
सत् + त्व = सत्त्व । √ गम् + क्विप् = जगत् । वि + √ आप् + क्त = व्याप्त ।
छन्दः—अनुष्टुप् ।
अलङ्कार—उदात्त । राम के अतिशय गुणों का कथन करने से उदात्त
अलङ्कार है।
कुलपतिम्—शिक्षा का प्रधान अधिकारी कुलपति होता था । वह दस हजार
छात्रों का भरण-पोषण करने तथा शिक्षा का प्रबन्ध करने में समर्थ होता था—
मुनीनां दश साहस्त्रं योऽन्नदानादिपोषणात् ।
अध्यापयति विप्रर्षिरसौ कुलपतिः स्मृतः ॥
एष मृग एकप्लुतातिक्रान्तशरविषयो वनगहनं प्रविष्टः ।
सीता—(आत्मगतम्) अय्यउत्तविरहिदाए भअं मे एत्थ उप्पज्जइ । [आर्य-
पुत्रविरहिताया भयं मेऽत्रोत्पद्यते ।
रावणः—(आत्मगतम्)
माययापहृते रामे सीतामेकां तपोवनात् ।
हरामि रुदतीं बालाम्मन्त्रोक्तामिव आहुतिम् ॥१५॥