प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः [ १५१ ]
छन्दः—अनुष्टुप्।
अलङ्कार—उदात्त। सीता के प्रभावातिशय का वर्णन करने से उदात्त
अलङ्कार है।
मायाप्रकाशपर्याकुलः--मायायाः प्रकाशतेनपर्याकुलः। { रावण को भय हुआ
कि पतिव्रता सीता के स्पर्श से कहीं उसकी माया प्रकट न हो जावे। } अतः उसने सीता
द्वारा चरणप्रक्षालन को स्वीकार करना नहीं चाहा।
रामः—तेन हि आनय, अहमेव शुश्रूषयिष्ये।
रावणः—अयि, छायां परिहृत्य शरीरं न लङ्घयामि। वाचानुवृत्तिः
खल्वतिथिसत्कारः। पूजितोऽस्मि। आस्यताम्।
रामः—बाढम्। (उपविशति)
हिन्दी रूपान्तर—
राम—तो ले आओ। मैं ही सेवा करूँगा।
रावण—अरे, छाया को छोड़कर मैं शरीर का लंघन नहीं करूँगा। सच्चा
अतिथिसत्कार तो वाणी से ही हो जाता है। मेरा सत्कार हो गया है। आप बैठिये।
राम—बहुत अच्छा। (बैठ जाते हैं)
छायां परिहृत्य शरीरं न लङ्घयामि—पत्नी को पति की छाया के समान
माना गया है। राम शरीर हैं तो सीता उनकी छाया है। जब रावण ने सीता से
सेवा कराना स्वीकार नहीं किया तो राम से सेवा कराना शिष्टाचार का उल्लङ्घन
होता।
रावणः—(अ त्मगतम्) यावदहमपि ब्राह्मणसमुदाचारमनुष्ठास्यामि।
(प्रकाशम्) भोः ! काश्यपगोत्रोऽस्मि। साङ्गोपाङ्गं वेदमधीये, मानवीयं धर्म-
शास्त्रं, माहेश्वरं योगशास्त्रं, बार्हस्पत्यमर्थशास्त्रं, मेधातिथेर्न्यायशास्त्रं,
प्राचेतसं श्राद्धकल्पं च।
रामः—कथं कथं श्राद्धकल्पमिति ?
रावणः--सर्वाः श्रुतीरतिक्रम्य श्राद्धकल्पे स्पृहा दर्शिता। किमेतत् ?
रामः—भगवन् ! भ्रष्टायां पितृमत्तायामागम इदानीमेषः।
रावणः—अलं परिहृत्य। पृच्छतु भवान्।
रामः—भगवन् ! निर्वपणक्रियाकाले केन पितॄंस्तर्पयामि ?
रामः [रावणः]--सर्वं श्रद्धया दत्तं श्राद्धम्।
रावणः [रामः]—भगवन् ! अनादरतः परित्यक्तं भवति। विशेषार्थं पृच्छामि।
रावणः—श्रूयताम्। विरूढेषु दर्भाः, ओषधीषु तिलाः, कलायं शाकेषु,