प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५४ ] प्रतिमानाटकम्
तैस्तर्पिताः सुतफलं पितरो लभन्ते
हित्वा जरां खमुपयान्ति हि दीप्यमानाः ।
तुल्यं सुरैः समुपयान्ति विमानवास-
मावर्तिभिश्च विषयैर्न बलाद् ध्रियन्ते ॥१०॥
[अन्वयः—तैः तर्पिताः पितरः सुतफलं लभन्ते, जरां हित्वा च दीप्यमानाः हि
खम् उपयान्ति । सुरैः तुल्यं विमानवासं समुपयान्ति । आवर्तिभिः च विषयैः बलात् न
ध्रियन्ते ॥१०॥
हिन्दी रूपान्तर—
रावण—हँ । वे हिमालय पर रहते हैं ।
राम—हिमालय पर रहते हैं । उसके बाद ?
रावण—हिमालय के सातवें शिखर पर, प्रत्यक्ष रूप से शिव के सिर पर
गिरती हुई गङ्गा के जल का पान करने वाले, वैडूर्य मणि के समान श्यामल पीठ
वाले, वायु के समान वेगशाली, काञ्चनपार्श्व नाम के मृग हैं । वैखानस, बालखिल्य,
नैमिषीय आदि महर्षियों के ध्यान मात्र से उपस्थित होकर वे मृत हो जाते हैं ।
तथा उनके द्वारा वे ऋषि श्राद्ध कार्यों को करते हैं ।
अर्थ [श्लोक १०]—उन काञ्चनपार्श्व मृगों के मांस से तृप्त होकर पितर
लोग पुत्र होने के फल को प्राप्त कर लेते हैं और वृद्धावस्था को छोड़ कर वे दीप्ति-
शाली होते हुये स्वर्ग में पहुँचते हैं । देवताओं के समान वे विमानों में निवास करते
हैं । तथा आवागमन (पुनर्जन्म) को कराने वाले विषय भोग उनका बलपूर्वक अपहरण
नहीं कर सकते ॥१०॥
संस्कृत व्याख्या—तैः काञ्चनपार्श्वमृगैः तेषां मांसप्रयोगैः तर्पिताः संतृप्ता
सञ्जाताः पितरः पितृलोके विद्यमानाः पूर्वजाः सुतफलं पुत्रजन्मजन्यप्रयोजनं लभन्ते
प्राप्नुवन्ति । तेन च जरां वृद्धावस्थां त्यक्त्वा हित्वा सततं यौवनावस्थामनुभवन्तस्ते
दीप्यमानाः भ्राजमानाः सन्तः हि निश्चयेन खं स्वर्गम् उपयान्ति प्राप्नुवन्ति । वार्धक्य-
मपहाय स्वर्गं सेवन्ते । तत्र स्वर्गे च सुरैः देवैः तुल्यं समानं विमानवासं विमानेषु
सप्तभूमिकप्रासादेषु व्योमयानेषु वा वास निवसनं समुपयान्ति प्राप्नुवन्ति ।
आवर्तिभिः जननमरणावागमनकारिभिः विषयैः इन्द्रियार्थप्रदीपकैः सांसारिकभोगविषयैः
बलात् हठात् न ध्रियन्ते बाध्यन्ते । जन्ममरणकारणभूतानि विषयाणि तान् न
बाधन्ते ॥१०॥
व्याकरण—दीप् + यक् + शानच् (मुक् का आगम) = दीप्यमान ।
छन्दः—वसन्ततिलका ।
हिमवतः सप्तमे शृङ्गे...—पौराणिक कथाओं के अनुसार भगीरथ की
तपस्या के प्रभाव से स्वर्ग से गिरती हुई गंगा को शिव ने अपने सिर पर ग्रहण किया
था । उस समय वे हिमालय के शिखर पर स्थित थे ।
काञ्चनपार्श्वः—यह एक काल्पनिक मृग है, जिससे रावण ने राम को