प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५२ ] प्रतिमानाटकम्
मत्स्येषु महासफरः, पक्षिषु वार्ध्रीणसः, पशुषु गौः खड्गो वा, इत्येते मानुषाणां
विहिताः ।
रामः—भगवन् ! वाशब्देनावगतमन्यदप्यस्तीति ।
रावणः—अस्ति प्रभावसम्पाद्यम् ।
रामः—एष एव मे निश्चयः—
उभयस्यास्ति सान्निध्यं यद्येतत् साधयिष्यति ।
धनुर्वा तपसि श्रान्ते श्रान्ते धनुषि वा तपः ॥६॥
(अन्वयः—उभयस्य अपि सान्निध्यम् अस्ति, यद् एतत् साधयिष्यति । तपसि
श्रान्ते धनुः धनुषि वा श्रान्ते तपः ॥६॥)
हिन्दी रूपान्तर—
रावण—(अपने मन में) तो मैं भी अपने ब्राह्मण के योग्य आचरण का पालन
करूँगा । (प्रकट रूप में) हे राम ? मेरा गोत्र काश्यप है । मैंने अङ्गों और उपाङ्गों
सहित वेदों का अध्ययन किया है, मनु द्वारा रचित धर्मशास्त्र का, महेश्वर द्वारा
रचित योगशास्त्र का, बृहस्पति द्वारा रचित अर्थशास्त्र का, मेवातिथि द्वारा रचित
न्यायशास्त्र का और प्रचेतस् ऋषि द्वारा रचित श्राद्धकल्प का अध्ययन किया है ।
राम—क्या कहा, क्या कहा, श्राद्धकल्प का ?
रावण—सब विद्याओं को लांघकर आपने श्राद्धकल्प के प्रति इच्छा दिखाई
है । यह क्या बात है ?
राम—भगवन् ! पिता की मृत्यु हो जाने के कारण अब इस शास्त्र की
अपेक्षा है ।
रावण—आप इस विषय को न छोड़ें । आप पूछें ।
राम—भगवन् ! पिण्डदान के समय पितरों को किस वस्तु से तृप्त करूँ ?
रावण—श्रद्धा से दिया गया सब कुछ श्राद्ध ही है ।
राम—हे भगवन् ! अनादर से दिया गया तो त्याग देने योग्य होता है । मैं
विशेष रूप से देने योग्य के लिये पूछ रहा हूँ ।
रावण—सुनो । घासों में दर्भ, ओषधियों में तिल, शाकों में कलाय, मछलियों
में महासफर, पक्षियों में वार्ध्रीणस, पशुओं में गाय या गैंडा, मनुष्य जाति में तो
श्राद्धों में ये ही विहित हैं ।
राम—भगवन् ! वा शब्द से मैं समझता हूँ कि इस विषय में और भी
कुछ है ।
रावण—है तो, परन्तु उसको प्रभाव-सामर्थ्य से ही सम्पादित किया जा
सकता है ।
राम—भगवन् ! यही मेरा निश्चय है ।
अर्थ [श्लोक ६]—मेरे पास दोनों ही प्रकार के साधन तपस्या और धनुष भी
हैं, जिनसे कि मैं इस साध्य को सिद्ध करूँगा । तपस्या के विफल हो जाने पर धनुष
से कार्य सिद्ध करूँगा अथवा धनुष के विफल हो जाने पर तपस्या से सिद्ध
करूँगा ॥६॥