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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 220, कुल 296 में से

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पृष्ठ 220

१५६ ] प्रतिमानाटकम्
छन्दः—वसन्ततिलका ।
अलंकार—उदात्त और दीपक हिमालय को उदात्त शोभा का वर्णन करने से
उदात्त अलंकार है । हरिणान्, द्रुमान्, वनं, लताः इन सब कर्म कारकों का एक क्रिया
आपृच्छ से सम्बन्ध होने के कारण दीपकं अलङ्कार है ।
—o-o-o—
सीता--जं अज्जउत्तो आणवेदि । [यदार्यपुत्र आज्ञापयति ।]
रावणः—कौसल्यामातः ! अलमतिमनोरथेन, न ते मानुषैर्दृश्यन्ते ।
रामः—भगवन् ! किं हिमवति प्रतिवसन्ति ?
रावणः—अथ किम् ?
रामः—तेन हि पश्यतु भवान्—
सौवर्णान् वा मृगांस्तान् मे हिमवान् दर्शयिष्यति ।
भिन्नो मद्बाणवेगेन क्रौञ्चत्वं वा गमिष्यति ॥१२॥
[अन्वयः—सौवर्णान् तान् मृगान् मे हिमवान् वा दर्शयिष्यति । वा मद्बाण-
वेगेन भिन्नः क्रौञ्चत्वं गमिष्यति ।।१२।।
हिन्दी रूपान्तर—
सीता—आर्यपुत्र जो आदेश देते हैं ।
रावण—हे कौसल्यापुत्र ! बहुत अधिक मन की अभिलाषा मत करो ।
मनुष्यों को वे हरिण दिखाई नहीं देते ।
राम—भगवन् ! क्या वे हिमालय पर रहते हैं ?
रावण—और क्या ?
राम—तो आप देखें—
अर्थ [श्लोक १२]—स्वर्ण के रंग के उन काञ्चनमृगों को मुझे हिमालय
दिखा देगा, अथवा मेरे बाणों के वेग से विदीर्ण होकर क्रौञ्च पर्वत की दशा को
प्राप्त होगा । यदि हिमालय मुझे उन स्वर्णमृगों को नहीं दिखायेगा, तो मैं उसको
बाणों के प्रहार से विदीर्ण कर दूंगा । उसकी वैसी ही अवस्था होगी, जैसे कि
परशुराम ने बाणों से बींध कर क्रौञ्च पर्वत की कर दी थी ।।१२।।
संस्कृत-व्याख्या—सौवर्णान् सुवर्णभान् तान् काञ्चनपाश्र्वाभिधेयान् मृगान्
हरिणान् मे मह्यं हिमवान् हिमालयपर्वतः वा दर्शयिष्यति प्रत्यक्षीकारयिष्यति, वा
अथवा मद्बाणवेगेन मम रामस्य बाणानां शराणां वेगेन रंहसा भिन्नः विदीर्णः सन्
क्रौञ्चत्वं क्रौञ्चपर्वतस्य दशां गमिष्यति प्राप्स्यति । यदि हिमालयपर्वतः हिमगिरि-
निवासिनः मुनिजनश्राद्धोपयुक्तान् काञ्चनपाश्र्वाभिधेयान् मृगान् मे न दर्शयिष्यति,
तस्यामवस्थायामहं तं पर्वत स्वबाणपातैः विदारयिष्यामि । तदा स क्रौञ्चपर्वतस्य