सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

६६ * प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र १६ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
ओं आसीत्सर्व्वमहीक्षितामनुरिव क्षत्त्रस्थितेर्द्देशिकः श्रीमान्मत्तगजे-
न्द्रखेलगमनः श्रीयज्ञवर्म्मा नृपः यस्याहूतसहस्रनेत्त्रविरहक्षामा
सदैवाध्वरैः पौलोमी चिरमश्रुपातमलिनं(नां) धत्ते कपोलश्रियं ॥
श्रीशार्दूलनृपात्मजः परहितः श्रीपौष्णः श्रूयते लोके चन्द्रम-

लिपिपत्र २० वां.
यह लिपिपत्र उदयपुर के विक्टोरिया हॉल में रक्खे हुए मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा अपराजित
के समय के वि. सं. ७१८ (ई. स. ६६१) के लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से बनाया
गया है. इसके 'थ' और 'श' नागरी के 'थ' और 'श' से मिलते जुलते ही हैं केवल ऊपर की
गांठें उलटी हैं. 'य' के प्राचीन और नवीन (नागरी के सदृश) दोनों रूप मिलते हैं. 'आ' की
मात्रा चार प्रकार से बनाई है. 'जा' और 'हा' के ऊपर 'आ' की मात्रा ( ऐसी लगी है, जिसकी
स्मृति अब तक कितने एक पुस्तकलेखकों को है क्योंकि जब वे भूल से कहीं 'आ' की मात्रा छोड़
जाते हैं और व्यंजन की दाहिनी ओर उसको लिखने का स्थान नहीं होता तब वे उस के ऊपर ऽ
चिह्न लगा देते हैं. इस लेख में अक्षरों तथा स्वरों की मात्राओं में सुंदरता लाने का यत्न कर लेखक
ने अपनी चित्रनिपुणता का परिचय दिया है (देखो, जा, टा, रा, धि, रि, हि, ही, ते, ले, नै, वै, यो, कौ,
शौ, सौ, त्य, प्र, व्य, श्री).
लिपिपत्र २० वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
राजा श्रीगुहिलान्वयामलपयोधराशौ स्फुरद्दीधितिर्ध्वस्तध्वान्तसमूहदृष्ट-
सकलव्यालावलेपान्तकृत् । श्रीमानित्यपराजितः क्षितिभृतामभ्यर्चितो
मूर्धभिः(भि)र्वृत्तस्वच्छतयैव कौस्तुभमणिश्र्जातो जगद्भूषणं ॥ शिवात्म-
जोखण्डितशक्तिसंपद्धुर्यः समाक्रान्तभुजङ्गशत्रु [:]। तेनेन्द्रवत्स्कन्द इव
प्रणेता कृतो महाराजवराहसिंहः जनगृहीतमपि क्षयवर्जितं
धवलमप्यनुरञ्जितभूतलं स्थिरमपि प्रविकासि दिशो दश भ्रमति

लिपिपत्र २१ वां.
यह लिपिपत्र बांसखेड़ा से मिले हुए राजा हर्ष (हर्षवर्द्धन) के दानपत्र१, नेपाल के राजा अंशु-
वर्मन् के लेख२, राजा दुर्गगण के झालरापाटन के लेख३, कुदारकोट के लेख४ तथा राजा शिवगण के
कोटा के लेख५ से तय्यार किया गया है. हर्ष के दानपत्र से प्राचीन अक्षरों की पहिली पंक्ति के 'ह'
से 'प्र' तक के अक्षर उद्धृत किये हैं और अंतिम पांच अक्षर ('ध' से 'श्री' तक) उक्त दानपत्र
के अंत के हर्ष के हस्ताक्षरों६ से लिये गये हैं जो चित्रलिपि का नमूना होने के साथ ही साथ उक्त राजा
की चित्रविद्या की निपुणता प्रकट करते हैं. झालरापाटन के लेख में विसर्ग की दोनों बिंदियों को ჻

१. ये मूल पंक्तियां मौखरी (मुखर) वंशी राजा अनंतवर्मन् के नागार्जुनी गुफा के लेख से उद्धृत की गई हैं (फ्ली;
गु. इं; प्लेट ३१ A.)
२. ऍ. इं; जि. ४, पृ. २१० के पास का प्लेट. ३. इं. पँ; जि. १०, पृ. १७० के पास का प्लेट.
४. झालरापाटन (छावनी) में रक्खे हुए मूल लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई दोनों ओर की छापों से.
५. ऍ. इं; जि. १, पृ. १८० के पास का प्लेट. ६. इं. पँ; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट.

कुटिल लिपि. ६७
लिखा है. कुदारकोट के लेख में हलंत का चिह्न ऊपर से तथा वर्तमान चिह्न के समान नीचे से भी
बनाया है. कोटा के लेख में 'अ' (पहिला) वर्तमान नागरी 'अ' से बहुत कुछ मिलता हुआ है और
'त्' को चलती कलम से लिख कर हलंत के चिह्न को मूल अक्षर से मिला दिया है जिससे उसका
रूप कुदारकोट के लेख के 'त्' से भिन्न प्रतीत होता है.
लिपिपत्र २१ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
ओं नमः शिवाय ओं नमः स्स(स)कलसंसारसागरो-
त्तारहेतवे । तमोगर्त्ताभिसंपातहस्तालंबाय शम्भवे ॥
श्वेतद्वीपानुकारा X क्वचिदपरिमितैर्रिन्दुपादैः पतद्भिनिर्त्यस्थै-
लिपिपत्र २२ वां.
यह लिपिपत्र चंबा के राजा मेरुवर्मा के ५ लेखों से तय्यार किया है. उक्त लेखों में से गूंगाह
का लेख² शिला पर खुदा है और बाकी के पित्तल की मूर्त्तियों पर³. मूर्त्तियों पर के लेखों से उद्धृत
किये हुए अक्षरों में कितने एक अक्षरों के एक से अधिक रूप मिलते हैं जिसका कारण यह है कि ये
सब लेख एक ही लेखक के हाथ से लिखे नहीं गये और कुछ अक्षर कलम को उठाये बिना लिखे हों ऐसा
प्रतीत होता है. 'न' का पहिला रूप नागरी के 'म' से मिलता हुआ है. उक्त अक्षर का ऐसा रूप
अन्यत्र भी मिलता है (देखो लिपिपत्र २२ में बुचकला के लेख के अक्षरों में). 'न' के तीसरे रूप में
बीच की ग्रंथि उलटी लगाई है, 'र' का दूसरा रूप उलटा लिखा गया है, 'ब' को 'व' के समान
लिखा है और रेफ को पंक्ति के ऊपर नहीं किंतु पंक्ति की सीध में लिखा है.
लिपिपत्र २२ वें की मूल पंक्तियों⁴ का नागरी अक्षरांतर-
ओं प्रासाद⁵ मेरुसदृशं हिमवन्मूर्द्भिः⁶ कृत्वा स्वयं
प्रवरकर्म्मशुभैरनेकः तच्चन्द्रशाल⁷रचितं⁸ नयनाभनाम⁹
प्राग्ग्रीवकैर्व्विविधमण्डपनैः काचित्तैः¹⁰ ॥ तस्याग्रतो वृषभ पी¹¹-
नकपोलकायः संक्षिष्टवक्ष्ककुदोन्नतदेवयानः¹² ओमेरु-
वर्म्मचतुरुदधिकीर्त्तिरेषाः¹³ मातापित्रोः¹⁴ सततात्मफ-
लिपिपत्र २३ वां.
यह लिपिपत्र प्रतिहार राजा नागभट के समय के बुचकला के लेख¹⁵, प्रतिहार बाउक के जोध-
पुर के लेख¹⁶ तथा प्रतिहार कक्कुुक के घटियाले के लेख¹⁷ से तय्यार किया गया है. बुचकला के
लेख में 'न' नागरी के 'म' से मिलता हुआ है, 'ह' की आकृति नागरी के 'ड' के समान है
और 'स' में 'त' उलटा जोड़ा है. जोधपुर के लेख के अधिकतर अक्षर नागरी के समान हो गये हैं.
१. ये मूल पंक्तियां कोटा के लेख से हैं (इं. ऐं; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट ).
२. फो; ऐं. चं. स्टे; प्लेट ११. ३. फो; ऐं. चं. स्टे; प्लेट १०.
४. ये मूल पंक्तियां नंदी की मूर्ति के लेख से उद्धृत की गई हैं (फो; ऐं. चं स्टे; प्लेट १०). इनमें अशुद्धियां
बहुत हैं इस लिये उन्हें मूल के साथ ( ) चिह्न के भीतर नहीं किंतु टिप्पणों में शुद्ध किया है.
५. 'सादं. ६. वन्मूर्ध्नि. ७. 'शाला. ८. 'चितो. ९. नयनाभिरामा.
१०. 'विधमण्डपैनैकै'. ११. 'षभः पी'. १२. 'वक्षःककुदुन्नतदेवयानं.
१३. चतुरुदधिकीर्त्तिरेषा. १४. मातापित्रोः. १५. ऐं. इं; जि. ६, पृ. २०० के पास का प्लेट.
१६. राजपूताना म्युजिअम् (अजमेर) में रक्खे हुए मूल लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से.
१७. प्रसिद्ध इतिहासवेत्ता जोधपुर के मुन्शी देवीप्रसाद की भेजी हुई छाप से.

६८ प्राचीनलिपिशाला.

लिपिपत्र २३ वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
ओं नमो विष्णवे ॥ यस्मिन्विशन्ति भूतानि यत-
स्सर्गस्थितौ मते । स वः पायादृषीकेशो निर्गुण-
स्सगुणश्च यः ॥ गुणाः पूर्व्वपुरुषाणां कीर्त्यन्ते तेन
पण्डितैः । गुणकीर्त्तिर्ननश्यन्तो स्वर्गवासकरो यतः ॥
अतः श्रीबाउको धौमां(मान्) स्वप्रतीहारवड्शजां(वंशजान्) । प्रश-

८—नागरीलिपि
ई. स. की १० वीं शताब्दी से (लिपिपत्र २४-२७).

जैसे वर्तमान काल में भारतवर्ष की आर्य लिपियों में नागरी का प्रचार सब से अधिक है और सारे देश में इसका आदर है वैसे ही ई. स. की १० वीं शताब्दी के प्रारंभ से लगा कर अब तक भारत के अधिकतर हिस्सों अर्थात् राजपूताना, गुजरात, काठियावाड़, कच्छ, मध्यभारत, युक्तप्रदेश और मध्यप्रदेश में तो इसका अटल राज्य बना रहा है. बिहार और बंगाल में भी १० वीं शताब्दी तक तो यही लिपि रही जिसके पीछे इसीके कुछ कुछ परिवर्तित रूप अर्थात् बंगला लिपि का प्रचार रहा, जो इसकी पुत्री ही है. पंजाब और कश्मीर में इसकी बहिन शारदा का प्रचार १० वीं शताब्दी के आसपास से होने लगा. दक्षिण के भिन्न भिन्न विभागों में जहां तेलुगु-कनडी, ग्रंथ और तामिळ लिपियों का प्रचार रहा वहां भी उनके साथ साथ इसका आदर बना रहा. इसीसे उत्तरी और दक्षिणी कोंकण तथा कोल्हापुर के शिलारवंशी राजाओं के शिलालेखों और दानपत्रों², दक्षिण (मान्यखेट) के राष्ट्रकूटों (राठौड़ों) के कई दानपत्रों³, गुजरात के राष्ट्रकूटों के कुछ दानपत्रों४, पश्चिमी चालुक्यों५ तथा सेउणदेश और देवगिरि⁶ के यादवों के शिलालेख और दानपत्रों⁷ एवं विजयनगर के तीनों राजवंशों के कई दानपत्रों⁸ में नागरी लिपि मिल आती है. विजयनगर के राजाओं के दानपत्रों की नागरी लिपि 'नंदि नागरी' कहलाती है और अब तक दक्षिण में संस्कृत पुस्तकों के लिखने में उसका प्रचार है.


¹ ये मूल पंक्तियां प्रतिहार बाउक के उपर्युक्त जोधपुर के लेख से उद्धृत की गई हैं.
² इं. ऐं; जि. ३, पृ. २७१-६; २६७-३०२. जि. १२, पृ. २६१-५. इं. ऐं; जि. ५, पृ. २७७-८. जि. ६, पृ. ३३-५. जि. १३, पृ. १३४-६. ज. बंब. ए. सो; जि. १२, पृ. २१६; ३३३. जि. १३ पृ. २-५; आदि.
³ इं. ऐं; जि. ३, पृ. १०५-१०. जि. ४, पृ. ६०-२; २८१-६. जि. ५, पृ १५२-६. जि. ६, पृ. २४२-६. जि. ७, पृ. ३६-४१. जि. ८, पृ. १८३-८. जि. ६, पृ. २६-३७. जि. १०, पृ. ८१-६. इं. ऐं; जि. ११, पृ. १११-३; १५७-६०. जि. १२, पृ. १४६-५२; २६४-७. जि. १३, पृ. १३४-६. बुं; ई. पे. प्लेट ४. अक्षरों की पंक्ति ४ थी.
⁴ इं. ऐं; जि ६, पृ. २८७-६४. इं. ऐं; जि. १३, पृ. ६६-८. जि. १४, पृ. १६६-२००.
⁵ इं. ऐं; जि. ३, पृ ४-६; ३०५-६. इं. ऐं; जि. १४, पृ. १४१-४२. जि. १६, पृ. २१-४; आदि.
⁶ इं. ऐं; जि २, पृ. २१७-२१; २२४-८. इं. ऐं; जि. १२, पृ. १२६-७. जि. १७, पृ. १२०-२२; आदि.
⁷ इं. ऐं; जि. १, पृ. ३४१-४. जि. २, पृ. २१६-२०. इं. ऐं; जि. १४, पृ. ३१५-६. ज. बंब. ए. सो; जि. १२, पृ. ७-८; २५-३०; ४२-५. जि. १५, पृ. ३८६-६०; आदि.
⁸ इं. ऐं; जि. ३, पृ. ३७-६; १२०-२४; १५१-८; २४०-५१. जि. ४, पृ. १२-२२; २७२-८. जि. ७, पृ. ८०-८३. जि. ६, पृ. ३३१-६. जि. ११, पृ. ३२६-३६. जि. १२, पृ. १७१-८५. जि. १३, पृ. १२६-३१. इं. ऐं; जि. १३, पृ. १२८-३२; १५६-६०; आदि.

Here is the line-by-line transcription of the page:

नागरीलिपि ६६
उत्तरी भारत में नागरी का प्रयोग ई. स. की १०वीं शताब्दी के प्रारंभ के आसपास से
मिलता है और यह पहिले पहिल कन्नौज के प्रतिहारवंशी राजा महेंद्रपाल ( प्रथम ) के दिघवाद-
बौली से मिले हुए वि. सं. ६५५ के दानपत्र¹ में मिलती है. तदनंतर उसी वंश के अन्य
राजाओं²; मेवाड़, वागड़ आदि के गुहिलवंशियों³; सांभर, अजमेर, नाडौल, जालौर,
चंद्रावती ( आबू ) आदि के चाहमान (चौहान)वंशियों; कन्नौज के गाहडवालों⁴; हथुंडी,
धनोप, बदाऊं आदि के राष्ट्रकूटों⁵; काठियावाड़, लाट और गुजरात ( अणहिलवाड़ा ) के चौलुक्यों⁶
( सोलंकियों ); आबू और मालवा आदि के परमारों⁷; ग्वालियर, दूबकुंड, नरवर आदि के कच्छप-
घात⁸ ( कछवाहा ) वंशियों; जेजाकभुक्ति ( जझौती=बुंदेलखंड ) के चंद्रात्रेय(चंदेल)वंशियों⁹; त्रिपुरी
( तेवर ), रत्नपुर आदि के हैहय ( कलचुरि ) वंशियों

कि अक्षर की चौड़ाई होती है. '११वीं शताब्दी की नागरीलिपि वर्तमान नागरी से मिलती जुलती
ही है और १२ वीं शताब्दी से वर्तमान नागरी बन गई, केवल 'इ', और 'घ' में ही कहीं पुरानापन नज़र
आता है (देखो, लिपिपत्र २६ में जाजल्लदेव के लेख के अक्षर) और व्यंजनों के साथ जुड़नेवाली
ए, ऐ, ओ और औ की मात्राओं में कभी कभी यह अंतर पाया जाता है कि 'ए' की मात्रा व्यंजन
के पूर्व खड़ी लकीर के रूप में सिर की लकीर से सटी रहती है, 'ऐ' की मात्रा में एक तो वैसी ही
खड़ी लकीर और दूसरी तिरछी रेखा व्यंजन के ऊपर लगाई जाती है (देखो, लिपिपत्र २७ में धारा-
वर्ष के लेख से दिये हुए अक्षरों में 'ने' और 'लै'); 'ओ' की मात्रा दो खड़ी लकीरों से बनाई जाती
है जिनमें से एक व्यंजन के पहिले और दूसरी उसके पीछे ('आ' की मात्रा की नांई) रहती
है, और 'औ' में वैसी ही दो लकीरें तथा एक वक्र रेखा व्यंजन के ऊपर रहती हैं (देखो, लिपि-
पत्र २७ की मूल पंक्तियों की दूसरी पंक्ति में 'वंशोद्धरण' में 'शो', और पहिली पंक्ति में 'ओमे' में 'ओ' तथा
'चौलुक्य' में 'चौ'). उक्त ४ स्वरों की इस प्रकार की मात्राएं शिलालेखादि में कहीं कहीं ई. स. की
१५वीं शताब्दी तक और हस्तलिखित पुस्तकों में १६वीं शताब्दी के पीछे तक मिल आती हैं,
जिनको राजपूताना के पुस्तकलेखक 'पड़ी मात्राएं' (पृष्ठमात्रा) कहते हैं. ई. स. की १२ वीं शताब्दी से लगा
कर अब तक नागरी लिपि बहुधा एक ही रूप में चली आती है तो भी लेखनशैली और देशभेद से
कुछ अंतर रह ही जाता है, जैसे कि जैन लेखकों के इ, उ, छ, झ, ठ, ड, ल और क्ष अक्षर
(इ, उ, छ, झ, ठ, ड, ल, क्ष), और दक्खिणवालों के अ, झ, ण, भ और क्ष अक्षर (अ, झ,
ण, भ और क्ष) नागरी के उन अक्षरों से अब भी भिन्न हैं.
दक्षिण में वर्तमान नागरी से अधिक मिलती हुई लिपि उत्तरी भारतवर्ष की अपेक्षा पहिले,
अर्थात् ई. स. की आठवीं शताब्दी से, मिलती है. पहिले पहिल वह राष्ट्रकूट (राठौड़) वंश के राजा
दंतिदुर्ग के सामनगढ़ से मिले हुए शक संवत् ६७५ (ई. स. ७५४) ^१ के दानपत्र में; उसके बाद
राष्ट्रकूट राजा गोविंदराज (दूसरे) के समय के धुलिया से मिले हुए शक सं. ७०१ (ई. स. ७८०) के दानपत्र^२
में; तदनंतर पैठण^३ और वणीगांव^४ से मिले हुए राष्ट्रकूट गोविंद (तीसरे) के दानपत्रों में, जो
क्रमशः शक संवत् ७१६ और ७३० (ई. स. ७६४ और ८०८) के हैं; बड़ौदे^५ से मिले हुए गुजरात
के राष्ट्रकूट ध्रुवराज (धारावर्ष, निरुपम) के श. सं. ७५७ (ई. स. ८३५) के दानपत्र में और
राष्ट्रकूट अमोघवर्ष और उसके शिलारवंशी सामंत पुल्लशक्ति (प्रथम और द्वितीय) के समय के कन्हेरी
के लेखों^६ में, जो क्रमशः श. सं. ७६५ (?) और ७७३ (ई. स. ८४३ और ८५१) के हैं, पाई जाती है और
उक्त समय के पीछे भी दक्षिण की लिपियों के साथ साथ बराबर मिलती चली आती है. उपर्युक्त सब ताम्रपत्र
और शिलालेख भिन्न भिन्न पुरुषों के हाथ के लिखे हुए होने से उनकी लेखनशैली कुछ कुछ निराली
है परंतु उनकी लिपि को नागरी कहने में कोई संकोच नहीं है. इस प्रकार नागरी लिपि ई. स.
की ८ वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से विस्तृत रूप में लिखी हुई मिलती है परंतु उससे पहिले
भी उसका व्यवहार होना चाहिये क्योंकि गुजरात के गुर्जरवंशी राजा जयभट (तीसरे) के
कलचुरि संवत् ४५६ (ई. स. ७०६) के दक्षिणी शैली की पश्चिमी लिपि के दानपत्र^७ में उक्त
राजा के हस्ताक्षर 'स्वहस्तो मम श्रीजयभटस्य' नागरी लिपि में ही है.
१. इं. पं; जि. ११, पृ. ११० से ११३ के बीच के प्लेट. २. बॉ. गॅ; जि. ८, पृ. २८६-७ के बीच के प्लेट.
३. ऐं. इं; जि. ३, पृ. १०६ और १०७ के बीच के प्लेट.
४. इं. पं; जि. ११, पृ. १५८ और १६१ के बीच के प्लेट. ५. इं. पं; जि. १४, पृ. २०० और २०१ के बीच के प्लेट.
६. इं. पं; जि. १३, पृ. १३३ और १३४. जि. २०, पृ. ४२१-२. बू. इं. पे; प्लेट ५, अक्षरों की पंक्ति ५, और पृ. ५१,
टिप्पण ४.
७. इं. पं; जि. २, पृ. २४८ के पास का प्लेट.

नागरीलिपि. ७१
लिपिपत्र २४ वां.
यह लिपिपत्र मोरवी से मिले हुए राजा जाईंकदेव के गुप्त संवत् ५८५ (ई. स. ९०४) के
दानपत्र १, अलवर से मिले हुए प्रतिहार राजा विजयपाल के समय के वि. स. १०१६ (ई. स. ९५६) के
शिलालेख २ और नेपाल से मिली हुई हस्तलिखित पुस्तकों ३ से तय्यार किया गया है. जाईंकदेव के
दानपत्र के अक्षरों की आकृति कुटिल ४ है परंतु लिपि नागरी से मिलती हुई ही है, केवल ख, घ, ङ,
ड, थ, ध, न, फ और म अक्षर वर्तमान नागरी से कुछ भिन्न हैं.
लिपिपत्र २४ वें की मूलपंक्तियों ५ का नागरी अक्षरांतर—
षष्टिवरिष(वर्षे)सहस्राणि स्वर्गे तिष्ठति भूमिदः ।
आछेत्ता [चा]नुमंता च तान्येव नरकं वसेत् । स्वदत्तां
परदत्तां वा यो हरेतु(त) वसुंधरां । गवां शतस-
हस्तस्य ह(हं)तुः प्राप्नोति किल्बि(ल्बि)षं ॥ विंध्याटवीष्व-
लिपिपत्र २५ वां.
यह लिपिपत्र छिंदवंशी लल्ल के वि. सं. १०४६ (ई. स. ९६२) के देवल के लेख ६ से, परमार
राजा भोजरचित ‘कूर्मशतक’ नामक दो काव्यों से, जो धार से शिलाओं ७ पर खुदे हुए मिले
हैं, और परमार राजा उदयादित्य के समय के उदयपुर ८ तथा उज्जैन ९ के लेखों से, तय्यार किया गया
है. देवल के लेख में ‘अ’ नागरी का सा बन गया है क्योंकि उसकी खड़ी लकीर के नीचे के
अंत में बाईं ओर से तिरछी रेखा जोड़ी है. यही तिरछी रेखा कुछ काल के अनंतर ‘अ’ की
बांई तरफ़ की तीन तिरछी लकीरों में से तीसरी बन गई जो वास्तव में अक्षर में सुंदरता लाने के विचार
से जोड़ी जाती थी. कूर्मशतक के अक्षरों में ‘इ’ और ‘ई’ में ऊपर की दो बिंदियों के बीच की वक्र
रेखा, उन्हींके नीचे की तीसरी बिंदी के स्थानापन्न ७ चिह्न के अंत का बाईं तरफ़ से दाहिनी तरफ़ बढ़ा
हुश्रा घुमाव, एवं ‘ऊ’ और ‘ओ’ के नीचे के भाग का वैसा ही घुमाव, केवल सुंदरता के विचार से ही हैं.
उदयादित्य के उदयपुर के लेख में ‘इ’ की जो आकृति मिलती है वह तीन बिंदीवाले ‘इ’ का रूपांतर
है और उसे सुंदर बनाने के विचार से ही इस विलक्षण रूप की उत्पत्ति हुई है. उदयादित्य के
उज्जैन के लेख के अंत में उस समय की नागरी की पूरी वर्णमाला, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय और
उपध्मानीय के चिह्नों सहित खुदी है, जिससे ई. स. की ११वीं शताब्दी में ऋ, ॠ, ऌ और ॡ के रूप
कैसे थे यह पाया जाता है.
१. इं. पँ.; जि. २, पृ. २५८ के पास का शेट. २. उदयपुर निवासी कुंवर फतहलाल मेहता की भेजी हुई उक्त लेख की छाप से.
३. बु; इं. पे; प्लेट ६, प्राचीन अक्षरों की पंक्ति ७ से.
४. भिन्न भिन्न लेखकों की लेखन शैली भिन्न मिलती है. कोई सरल अक्षर लिखता है तो कोई टेढ़ी मेढ़ी आकृति
के अर्थात् कुटिल. ऐसी दशा में लिपिविभाग निश्चय रूप से नहीं हो सकते.
५. ये मूल पंक्तियां जाईकदेव के उपर्युक्त दानपत्र से हैं.
६. पँ. इं; जि. १, पृ. ७६ के पास का प्लेट. ७. ऍ. इं; जि. ८, पृ. २४८ और २६० के बीच के ३ प्लेट.
८. ऍ. इं; जि १, पृ. २३४ के पास का प्लेट.
९. उज्जैन में महाकाल के मंदिर के पीछे की एक छत्री में खड़ी हुई शिला पर खुदी हुई प्रशस्ति की अपने हाथ से
तय्यार की हुई छाप से.
यह शिला उदयादित्य के समय की किसी प्रशस्ति की अंतिम शिला है जिसमें ८० के पीछे के थोड़े से श्लोक हैं. इसमें
संवत् नहीं है, परंतु पत्थर का जो अंश खाली रह गया उसपर प्रशस्तिलेखक के हाथ से ही लिखी हुई पूरी वर्णमाला तथा
नाग के ग्रंथिल चित्र के भीतर धातुओं के प्रत्यय आदि खुदे हैं (जैसे कि धार से मिले हैं) और अंत के श्लोक में
“उदयादित्यदेवस्य वर्धनाक्षकृपाथिका” खुदा है जिससे उक्त प्रशस्ति का उदयादित्य के समय का होना पाया जाता है.

७२ प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र २५ वें की मूल पंक्तियों १ का नागरी अक्षरांतर—
आरामोद्यानवापौषु देव्वायतनेषु च । कृतानि क्रियमाणा-
नि यस्याः कर्माणि सर्व्वदा ॥ दीनानाथविपन्नेषु करुणान्वि-
तचेतसः । सत्त्वेषु भुञ्जते यस्या विप्रसंघा दिने दिने ॥
इत्थं विविक्तममयोः परिवर्द्धमानधर्म्मप्रव(ब)न्धविगलत्कलिकालवृ-
लिपिपत्र २६ वां.
यह लिपिपत्र कन्नौज के गाहडवालवंशी राजा चंद्रदेव और मदनपाल के वि. सं. ११५४ (ई. स.
१०६८) के दानपत्र², हस्तलिखित पुस्तकों³ तथा हैहय (कलचुरि) वंशी राजा जाजल्लदेव के समय के
शिलालेख४ से तय्यार किया गया है. चंद्रदेव के दानपत्र की 'इ' के परिवर्तित रूप से वर्तमान नागरी का 'इ'
बना है (देखो, लिपिपत्र ८२ में 'इ' की उत्पत्ति). 'धा' में 'आ' की मात्रा की खड़ी लकीर को 'ध' के मध्य
से एक नई आड़ी लकीर खींच कर जोड़ा है, जिसका कारण यह है कि 'ध' और 'व' के रूप बहुधा
एकसा बन गये थे जिससे उनका अंतर बतलाने के लिये 'ध' बहुधा बिना सिर के लिखा जाता था, यदि
कोई कोई सिर की लकीर लगाते थे तो बहुत ही छोटी. ऐसी दशा में 'ध' के साथ 'आ' की मात्रा सिर
की आड़ी लकीर के साथ जोड़ी नहीं जाती थी, क्योंकि ऐसा करने से 'धा' और 'वा' में अंतर नहीं रहता.
इसी लिये 'धा' के साथ की 'आ' की मात्रा मध्य से जोड़ी जाती थी. चंद्रदेव के दानपत्र के अक्षरों की पंक्ति
के अंत का 'म' उक्त दानपत्र से नहीं किंतु चंद्रदेव के वंशज गोविंदचंद्र के सोने के सिक्के पर के लेख से
लिया गया है और इसीसे उसको अंत में अलग धरा है. जाजल्लदेव के लेख में हलंत और अवग्रह के
चिह्न उनके वर्तमान चिन्हों के समान ही हैं. उक्त लेख के अक्षरों के अंत में 'इ' और 'ई' अलग दिये गये
हैं जिनमें से 'इ' बीजोल्यां (मेवाड़ में) के पास के चट्टान पर खुदे हुए चाहमान (चौहान) वंशी
राजा सोमेश्वर के समय के वि. सं. १२२६ (ई. स. ११७०) के लेख से लिया गया है और 'ई' चौहान
वंशी राजा पृथ्वीराज (तीसरे) के समय के वि. सं. १२४४ (ई. स. ११८७) के बीसलपुर (जयपुर राज्य
में) के लेख से लिया गया है. उक्त दोनों अक्षरों के ऐसे रूप अन्यत्र कहीं नहीं मिलते.
लिपिपत्र २६ वें की मूल पंक्तियों५ का नागरी अक्षरांतर—
तद्वंश्यो हैहय आसीद्यतो जायन्त हैहयाः ।......त्यसेन-
प्रिया सतौ ॥ ३ ॥ तेषां हैहयभूभुजां समभवद्वंसे(शे) स चेदीश्व-
रः श्रीकोकल्ल इति स्मरप्रतिक्षतिर्विश्व(श्व)प्रमोदो यतः । येनायं
चितसौ(श्रौ)धा......मेन मातुं यशः स्वीयं प्रेषितमुच्चकैः
कियदिदि त्र(ब्र)ह्मांडमन्तः क्षिति ॥ ४ ॥ अष्टादशस्य रिपुकुंभिवि-
लिपिपत्र २७ वां.
यह लिपिपत्र आबू के परमार राजा धारावर्ष के समय के वि. सं. १२६५ (ई. स. १२०८)
के ओरिआगांव के लेख६, जालोर के चाहमान (चौहान) राजा चाचिगदेव के समय के वि. सं. १३२१ (ई. स-
१. ये मूल पंक्तियां राजा लल्ल के समय के उपर्युक्त देवल के लेख से हैं. २. इं. ऐं; जि. १८, पृ. १९ के पास का प्लेट.
३. बृ. इं. ऐ; प्लेट ६, अक्षरों की पंक्ति १५-१६. ४. ऐ. इं; जि. १, पृ. ३४ के पास का प्लेट.
५. ये मूल पंक्तियां हैहयवंशी राजा जाजल्लदेव के रतनपुर के लेख से हैं (ऐं. इं; जि. १, पृ. ३४ के पास का प्लेट).
६. राजपूताना म्यूज़िअम (अजमेर) में रक्खे हुए उक्त लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से.

१२६४) के सूंधा नामक पहाड़ के लेख१ और मेवाड़ के गुहिलवंशी रावल समरसिंह के समय के चीरवा
गांव से मिले हुए वि. सं. १३३० (ई. स. १२७३) के लेख२ से तय्यार किया गया है. ओरिआ गांव
के लेख में 'ध' के सिर नहीं है परंतु 'ध' को 'व' से स्पष्ट रूप से भिन्न बतलाने के लिये व के ऊपर
बाईं ओर ( ऐसी लकीर जोड़ दी है. यह रूप पिछले नागरी के लेखों तथा पुस्तकों में मिल
आता है. सूंधा के लेख की लिपि जैन है. उसके 'लृ', 'ठ' आदि अक्षरों को अब तक जैन लेखक
वैसा ही लिखते हैं. 'णण' को, 'ण' लिखके बीच में आड़ी लकीर लगा कर बनाया है. यह रूप कई लेखों में
मिलता है और अब तक कई पुस्तकलेखक उसको ऐसा ही लिखते हैं. चीरवा के लेख में 'ग्ग' को 'ग्र'
का सा लिखा है और अन्य लेखों में भी उसका ऐसा रूप मिलता है, जिसको कोई कोई विद्वान् 'ग्र'
पढ़ते भी हैं परंतु उक्त लेख का लेखक बहुत शुद्ध लिखनेवाला था अत एव उसने भूल से सर्वत्र
'ग्ग' को 'ग्र' लिख दिया हो यह संभव नहीं. उसने उस समय का 'ग्ग' का प्रचलित रूप ही लिखा
है जिसका नीचे का अंश प्राचीन 'ग' का ही कुछ विकृत रूप है, जैसे कोई कोई लेखक वर्तमान नागरी के 'क्त'
और 'क्र' को 'क्त' और 'क्र' लिखते हैं जिनमें वर्तमान 'क' नहीं किंतु उसका प्राचीन रूप ही
लिखा जाता है.
लिपिपत्र २७ वें की मूल पंक्तियों३ का नागरी अक्षरांतर-
संवत् १२६५ वर्षे ॥ वैशाखशु १५ भौमे । चौलुक्य-
वंशोद्धरणपरमभट्टारकमहाराजाधिराजश्रीमद्भीमदेवप्र-
वर्द्धमानविजयराज्ये श्रीकरणे महामुद्रामात्यमहं०-
भाभूप्रभृतिसमस्तपंचकुले परिपंथयति चंद्रावतीनायमां-
डलिकसुरत्राणश्रीधारावर्षदेवे एकातपत्रवाहकत्वेन
६-शारदा ( कश्मीरी ) लिपि.
ई. स. की १० वीं शताब्दी के आसपास से ( लिपिपत्र २८ से ३१ ).
शारदालिपि पंजाब के अधिकतर हिस्से और कश्मीर में प्राचीन शिलालेखों, दानपत्रों, सिक्कों४
तथा हस्तलिखित पुस्तकों में मिलती है. यह लिपि नागरी की नांई कुटिल लिपि से निकली है.
ई. स. की ८ वीं शताब्दी के मेरुवर्मा के लेखों५ से पाया जाता है कि उस समय तक तो उधर कुटिल
लिपि का ही प्रचार था, जिसके पीछे के स्वाइम् (सइ) गांव से मिली हुई भगवती की मूर्ति के आसन
पर खुदे हुए सोमट के पुत्र राजानक भोगट के लेख६ की लिपि भी शारदा की अपेक्षा कुटिल से अधिक
मिलती हुई है. शारदालिपि का सब से पहिला लेख सराहां की प्रशस्ति७ है जिसकी लिपि ई. स. की
१०वीं शताब्दी के आसपास की है. यही समय शारदा लिपि की उत्पत्ति का माना जा सकता है.
१. जोधपुर निवासी मेरे विद्वान् मित्र मुन्शी देवीप्रसाद की भेजी हुई छाप से.
२. चीरवा गांव के मंदिर की भीत में लगे हुए उक्त लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से.
३. ये मूल पंक्तियां उपर्युक्त ओरिआ गांव के लेख से हैं.
४. कश्मीर के उत्पलवंशी राजाओं के सिक्कों में. ५. देखो, लिपिपत्र २२ वां. ६. फो. ऐं. चं. स्टे; पृ. १५२, प्लेट १३.
७. देखो, लिपिपत्र २८ वां. कांगड़ा ज़िले के कीरग्राम के बैजनाथ (वैद्यनाथ) नामक शिवमन्दिर में जालंधर (कांगड़े)

७४ प्राचीनलिपिमला.
पहिले शारदालिपि के लेख बहुत ही कम प्रसिद्धि में आये थे और ई. स. १८०४ तक तो एक भी लेख
की प्रतिकृति प्रसिद्ध नहीं हुई थी, परंतु सुप्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. फोजल ने ई. स. १६११ में बड़े
श्रम के साथ चंबा राज्य के शिलालेख और दानपत्रों का बड़ा संग्रह कर 'ऐंटिक्विटीज़ ऑफ़ चंबा
स्टेट' नामक अपूर्व ग्रंथ प्रकाशित किया जिसमें प्राचीन लिपियों के अभ्यासियों के लिये शारदा
लिपि की अमूल्य सामग्री है.
लिपिपत्र २८ वां.
यह लिपिपत्र सराहां की प्रशस्ति¹ से तय्यार किया गया है. इसमें 'ए' के लिखोण की सिर
के स्थान की आड़ी लकीर की बाईं ओर चिन्ह और जोड़ा है जो वास्तव में 'ए' की मात्रा का
एक प्रकार का चिह्न है और कुटिल तथा नागरी लिपि के लेखों में ए, ऐ, ओ और औ की मात्राओं
में भी कभी कभी मिलता² है. पीछे से यही चिह्न लंबा होकर खड़ी लकीर³ के रूप में परिणत
होगया (देखो, लिपिपत्र ३१ में बहादुरसिंह के दानपत्र का 'ए' ). वर्तमान शारदा 'ए' में इस
खड़ी लकीर के अतिरिक्त 'ए' के ऊपर भी नागरी की 'ए' की मात्रा सी मात्रा और लगाई जाती है
(देखो, लिपिपत्र ७७). 'द्' के मध्य में ग्रंथि लगाई है. 'श' और 'स' में इतना ही भेद है कि
पहिले का सिर पूरे अक्षर पर है और दूसरे का दो अंशो में विभक्त है. 'त्' तथा 'म्' में मूल अक्षरों
के चिह्न स्पष्ट नहीं रहे. 'ओ' की मात्रा का चिह्न कहीं ~ भी है (देखो, 'यो'), 'औ' की मात्रा
कहीं उक्त चिह्न के अतिरिक्त व्यंजन के सिर के अंत में ^ चिह्न और जोड़ कर बनाई है (देखो,
'मौ' ) और रेफ पंक्ति से ऊपर नहीं किंतु सीध में लगाया है.
लिपिपत्र २८ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
किष्किन्धाकाधौशकुले प्रसूता सोमप्रभा नाम बभूव तस्य ।
देवी जगद्भूषणभूतमूर्तिस्त्रिलोचनस्येव गिरौशपुत्री ॥ अपूर्व-
मिन्दुम्प्रविधाय वेधास्सदा स्फुरत्कान्तिकलकमुक्तं ... संपूर्णबिम्बं (बिम्बं)
के राजा जयचंद्र ( जयचंद्र ) के समय की दो प्रशस्तियां लगी हैं. जनरल कनिंगहाम ने बाबू ( राजा ) शिवप्रसाद के पठना-
नुसार उनका समय क्रमशः लौकिक ( सप्तर्षि ) संवत् ८० और गत शककाल ७२६ ( ई. स. ८०४ ) माना था ( क; आ. स. रि;
जि. ४, पृ. १८०-८२ ; प्लेट ४२). फिर डॉ. बूलर ने ये प्रशस्तियां छापीं (ऐं. इं ; जि. १, पृ. १०४-७ ; ११२-५) और पहिली का संवत्
[लौकिक] संवत्सर ८० ज्येष्ठ शुक्ल १ रविवार और दूसरी का गत शककाल ७[२६] होना स्थिर किया. फिर उसी आधार
पर इन प्रशस्तियों को शारदा लिपि के सब से पुराने लेख, एवं उक्त लिपि का प्रचार ई. स. ८०० के आस पास से होना, मान
लिया ( वू ; इं. पे; पृ. ५७ ) परंतु ई. स. १८८८ में डॉ. कीलहॉर्न ने गणित कर देखा तो शक संवत् ६२६ से १४२६ तक की आठ
शताब्दियों के गत २६ वें वर्षों में से केवल शक संवत् ११२६ ही एक ऐसा वर्ष पाया जिसमें ज्येष्ठ शुक्ल १ को रविवार था. इस
आधार पर उक्त विद्वान् ने इन प्रशस्तियों का ठीक समय शक संवत् ११२६ = लौकिक संवत् ८० होना स्थिर किया ( इं. ऐं ;
जि. २०, पृ. १५४ ) और डॉ. फोजल ने मूल प्रशस्तियों को देखकर डॉ. कीलहॉर्न का कथन ही ठीक बतलाया ( फो; ऐँ. चं.
स्टेट् ; पृ. ४३-४ ). ऐसी दशा में ये प्रशस्तियां न तो ई. स. ८०४ की मानी जा सकती है और न शारदा लिपि का प्रचार ई. स.
८०० के आस पास होना स्वीकार किया जा सकता है. दूसरी बात यह भी है कि जनरल कनिंगहाम ने जयचंद्र से पांचवें
राजा जयचंद्रसिंह की गद्दीनशीनी ई. स. १३९५ में और ८ वें राजा रूपचंद्र की गद्दीनशीनी ई. स. १३६० में होना और उस
(रूपचंद्र ) का फ़ीरोज़ तुगलक ( ई. स. १३६०-७० ) के अधीन होना लिखा है ( क; कॉ. मि. इं; पृ. १०४). ऐसी दशा में
भी जयचंद्र का ई. स. ८०४ में नहीं किंतु १२०४ में विद्यमान होना ही स्थिर होता है.
१ फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट १५.
२ देखो, लिपिपत्र १८वें की मूल पंक्तियों में से दूसरी पंक्ति में 'विधत्ते' का 'ते', उसी पंक्ति में 'शत्रुसैन्यं' का 'सै',
और उसी लिपिपत्र में 'श्रो' और 'श्रो'.
३ यही खड़ी लकीर नागरी में 'पर्द्धीमात्रा' (पृष्ठमात्रा) होकर ए, ऐ, ओ और औ की मात्रावाले व्यंजनों के पूर्व

शारदा लिपि. ७५
वदनं यदीयमनुत्तराङ्ककृताङ्गयष्टिः ॥ नानाविधालङ्कृतिसन्नि-
वेशविशेषरम्या गुणशालिनी या । मनोहरत्वं सुतरा मवाप स-
चेतसां सत्कविभारतीव ॥ शृङ्गारसिन्धो X किमियन्नु वेला किं वा
मनोभ्रूतसुमञ्जरी स्यात् वसन्तराजस्य नु राज्यलक्ष्मीस्त्रैलोक्यसौन्दर्य-
लिपिपत्र २६ वां.
यह लिपिपत्र राजा विदग्ध के सुंगल गांव के दानपत्र२ से तय्यार किया गया है. इसमें 'ड' वि-
लक्षण है, कहीं कहीं 'प' और 'म' में स्पष्ट अंतर नहीं है, 'व' तथा 'ब' में भेद नहीं है, 'ए' की
मात्रा तीन प्रकार से लगी है जिनमें से एक आड़ी लकीर है (देखो, 'ऐ') और 'र्थ', 'थै', 'स्थ'
और 'स्थि' में 'थ' का रूप विकृत मिलता है.
लिपिपत्र २६ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति ॥।१ श्रीचणप(म्प)कावासकात्परमभट्टारकमहाराजाधिराज-
परमेश्वरश्रीमद्युगाकरवर्मदेवपादानुध्यात[:] परमब्र(ह्म)ह्मण्यो निखि-
लसच्छासनाभिप्रवृत्तगुरुवृत्तदेवतानुवृत्तसमधिगतशास्तुकुशल-
तया समाराधितविद्वज्जनहृदयो नथानुगतपौरुषप्रयोगा-
वाप्तत्रिवर्गसिद्धिः सम्यगर्जिताभिकामिकगुणसहिततया फ-
लित इव मार्गतरु [:] । सर्वसत्वा(त्त्वा)अयनौ(णौ)यो मोषनाम्नाय३
आदित्यवङशो(वंशो)द्भव [:] परममाहेश्वरो (रः) श्रीभोगमतीदेव्या (व्यां) समुत्पन्न [:]
लिपिपत्र ३० वां.
यह लिपिपत्र सोमवर्मा के कुलैत के दानपत्र४, चंबा से मिले हुए सोमवर्मा और आसट के दान-
पत्र५, राजानक नागपाल के देवीरीकोठी (देब्रिकोटी) के शिलालेख६, आरिगांव के शिलालेख७ तथा
जालंधर के राजा जयच्चंद्र के समय की शक संवत् ११२६८=लौकिक संवत् ८० (ई. स. १२०४) की
कांगडा ज़िले के कीरग्राम के बैजनाथ (वैद्यनाथ) के मंदिर की दो प्रशस्तियों९ से तय्यार किया गया
है और इसमें मुख्य मुख्य अक्षर ही दिये गये हैं. कुलैत के दानपत्र में 'च' के बाईं तरफ के अंश के नीचे
के भाग में गांठ सी लगाई है और 'छ' की खड़ी लकीर के मध्य में ग्रंथि बनाकर उसके और 'क' के
बीच के अंतर को स्पष्ट किया है. बैजनाथ की प्रशस्तियों के 'ई' को, उक्त अक्षर के प्राचीन रूप में खड़ी
कभी कभी लगने लगी और बंगला, मैथिल तथा उड़िया लिपियों में दाहिनी तरफ नीचे गांठवाली वक्र रेखा के रूप में उसका
अब तक प्रयोग होता है (देखो, लिपिपत्र ७८ और ७६ में उक्त लिपियों की वर्णमालाओं में के, कै, को और कौ).
१. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट १७ से.
२. इन तीन लकीरों में से पहिली की आकृति ) ऐसी है और दूसरी व तीसरी खड़ी लकीरें हैं जिनमें स एक अनावश्यक है.
३. शुद्ध पाठ 'मोषणान्वयः' होना चाहिये.
४. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट २४ से.
५. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट २५ से.
६. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट ३० से.
७. ऐँ. इं; जि. ६, पृ. ३०१ के पास के प्लेट से.
८. इन प्रशस्तियों के समय के लिये देखो ऊपर पृ. ७३ टिप्पणी ७.
९. बु; इं. पे; प्लेट ४, प्राचीन अक्षरों की पंक्ति प्रथम से.

७६ प्राचीनलिपिमाला.
लकीर के दोनों पार्श्व में लगनेवाली बिंदियों को उक्त लकीर के परिवर्तित रूप के ऊपर लगा कर, बनाया
है और उसीसे वर्तमान शारदा का 'ई' बना है. 'ते' और 'थै' में 'ए' और 'ऐ' की मात्राएं
क्रमशः एक और दो आड़ी लकीरें व्यंजन के ऊपर लगा कर बनाई हैं. टाकरी लिपि में 'ए' और 'ऐ'
की मात्राएं अब तक ऐसी ही लगाई जाती है (देखो लिपिपत्र ७७).
लिपिपत्र ३० वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
ओं नमश्शिवाय ॥ जयति भुवनकारणं स्वयंभुज्जयति पुर-
न्दरनन्दनो सुरारिः [।] जयति गिरिसुतानिरुद्धदेहो...रितभयाप-
हरो हरश्च देवः ॥ श्रीचष्प(म्प)कावासकात्यसमब्रह्मग्यो लला-
तटघटितविकटभुकुटिपटककुटि(द्वि)तकट कसमटिककृतसाना-
लिपिपत्र ३१ वां.
यह लिपिपत्र कुलू के राजा बहादुरसिंह के दानपत्र², अथर्ववेद³ (पिप्पलादशाखा) और शाकु-
न्तल नाटक⁴ की हस्तलिखित पुस्तकों से तय्यार किया गया है. अथर्ववेद की पुस्तक के अक्षरों का
'इ' प्राचीन 'इ' के '७°' इस रूप को नीचे के अंश से प्रारंभ कर चलती कलम से पूरा लिखने से ही
ऐसा बना है. उसीसे वर्तमान शारदा का 'इ' बना है. शाकुंतल नाटक से उद्धृत किये हुए अक्षरों
में से अधिकतर अर्थात् अ, आँ, ई, ऊ, ऋ, ओ, औ, क, ख, ग, च, छ, झ, ञ, ड, ढ, ण, त, थ, द,
ध, न, प, फ, ब, म, य, र, श, ष, स और ह अक्षर वर्तमान कश्मीरी से मिलते जुलते ही हैं (उक्त
अक्षरों को लिपिपत्र ७० में दी हुई वर्तमान शारदालिपि से मिला कर देखो).
लिपिपत्र ३१ वें की मूल पंक्तियों⁵ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति ॥ रामरामरामपराक्रमपराक्रमण्डदक्षदक्षजा-
कांतनितांतचरणशरणकृतांतःकरणरणविशारद शारदद्वि-
मकरानुकारियशःपूरपूरितदिगंतरपरमभट्टारकमहाराजाधिरा-
जश्रीबहादुरसिंहदेवपादाः ॥ ॥ महाश्रीयुवराजप्रतापसिं-
हः महामंचिवर नारायणसिंहः ॥ श्रीचंपकपुरस्थमहापं-
१. ये मूल पंक्तियां राजा सोमवर्मा के कुलैत के दानपत्र से हैं.
२. आ. स. रि; ई. स. १९०३-४, प्लेट ७१ से. ३. हार्वर्ड ओरियंटल सिरीज में छपे हुए अथर्ववेद के अंग्रेज़ी
अनुवाद के साथ दी हुई उक्त पुस्तक के एक पत्रे की प्रतिकृति से.
४. बु; इं. पे; सेट ६, प्राचीन अक्षरों की पंक्ति ६ से.
५. ये मूल पंक्तियां कुलू के राजा बहादुरसिंह के दान पत्र से हैं.

१०—बंगला लिपि.
ई. स. की ११ वीं शताब्दी के आस पास से (लिपिपत्र ३२ से ३५).
बंगला लिपि भारतवर्ष के पूर्वी विभाग अर्थात् मगध की तरफ़ की नागरी लिपि से निकली है
और बिहार, बंगाल, मिथिला, नेपाल, आसाम तथा उड़ीसा से मिलनेवाले कितने एक शिलालेख,
दानपत्र, सिक्कों या हस्तलिखित पुस्तकों में पाई जाती है. बंगाल के राजा नारायणपाल के समय,
अर्थात् ई. स. की दसवीं शताब्दी तक तो उधर भी नागरी लिपि का ही प्रचार रहा. उक्त राजा के
लेखों में केवल 'ए'१, 'ख'२ आदि कुछ अक्षरों में बंगला की ओर झुकाव नज़र आता है. ई. स. की
ग्यारहवीं शताब्दी के पालवंशी राजा विजयपाल के देवपारा के लेख३ में ए, ख, ञ, त, म, र, ल और
स में नागरी से थोड़ी सी भिन्नता है और कामरूप के वैद्यदेव के दानपत्र४, आसाम से मिले हुए
वल्लभेंद्र के दानपत्र५ और हस्त्राकोल के लेख६ की लिपियों में से प्रत्येक को नागरी (लिपिपत्र २४-२७) से
मिलाया जावे तो अ, इ, ई, ऋ, ए, ऐ, ख, घ, झ, ञ, ट, थ, प, फ, र, श और ष में अंतर पाया जाता
है. इस प्रकार लेखनशैली में क्रमशः परिवर्तन होते होते वर्तमान बंगला लिपि बनी.
लिपिपत्र ३२ वां.
यह लिपिपत्र बंगाल के राजा नारायणपाल के समय के बदाल के स्तंभ के लेख७ और विजय-
सेन के देवपारा के लेख८ से तय्यार किया गया है. बदाल के लेख से तो मुख्य मुख्य अक्षर ही लिये
गये हैं. उनमें 'अ' और 'आ' की प्रारंभ की छोटीसी खड़ी लकीर न लगने से उनके रूप नागरी
के 'ञ' से बन गये हैं. संभव है कि यह भिन्नता दानपत्र खोदनेवाले की ग़लती से हुई हो.
देवपारा के लेख में अवग्रह की आकृति वर्तमान नागरी के 'इ' सी है, विसर्ग के ऊपर भी
सिर की आड़ी लकीर लगाई है, 'प' तथा 'य' में विशेष अंतर नहीं है और 'व' और 'ब' में
कोई भेद नहीं है.
लिपिपत्र ३२वें की मूल पंक्तियों९ का नागरी अक्षरांतर—
तस्मिन् सेनान्ववाये प्रतिसुभटशतोत्सादनव्र(ब्र)ह्मवादौ
स व्र(ब्र)ह्मक्षत्रियाणामजनि कुलशिरोदाम सामन्तसे-
नः। उन्नीयन्ते यदीयाः स्खलदुदधिजलोल्लोलश्री-
तेषु सेतोः कच्छान्तेष्वप्सरोभिर्भृशम यतनथस्पर्द्धया
युद्धगाथाः ॥ यस्मिन् सङ्गरचत्वरे पटुरटत्तूर्योप-
१. देखो लिपिपत्र ३२.
२. मेमॉयर्स ऑफ़ एशियाटिक् सोसाइटी ऑफ़ बंगाल, जिल्द ५, प्लेट २४ की अंतिम पंक्ति में 'वैशाख्यां' का 'ख'.
३. ऍ. इं; जि. १, पृ. ३०८ के पास का प्लेट. ४. ऍ. इं; जि. २, पृ. ३५२ और ३५३ के बीच के ४ प्लेट.
५. ऍ. इं; जि. २, पृ. १८४ और १८५ के बीच के २ प्लेट. ६. ज. बंगा. ए. सो; ई. स. १८०८, पृ. ४६२.
७. ऍ. इं; जि. २, पृ. १६१ के सामने का प्लेट. ८. ऍ. इं; जि. १, पृ. ३०८ के पास का प्लेट.
९. ये मूल पंक्तियां देवपारा के लेख से हैं.

७८
प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र ३३ वां.
यह लिपिपत्र बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन के तर्पणडिघी के दानपत्र १ से और कामरूप के
वैद्यदेव के दानपत्र २ से तय्यार किया गया है. उन दोनों में 'इ' और 'ई' में विशेष अंतर नहीं है.
वैद्यदेव के दानपत्र का 'ऐ', 'ए' से नहीं, किंतु 'इ' में कुछ परिवर्तन करके बनाया है, अनु-
स्वार को अक्षर के ऊपर नहीं किंतु आगे धरा है और उसके नीचे हलंत की सी तिरछी लकीर
और लगाई है, 'ऊ' और 'ऋ' की मात्राओं में स्पष्ट अंतर नहीं है, 'व' और 'ब' में भेद नहीं है
और सिर सीधी लकीर से नहीं किंतु ⊂ ऐसी लकीर से बनाये हैं, जिसका अधिक विकास उड़िया
लिपि के सिरों में पाया जाता है.
लिपिपत्र ३३ वें की मूल पंक्तियों ३ का नागरी अक्षरांतर—
ओं ओं नमो भगवते वासुदेवाय ॥ स्वस्ति ॥ अम्व(म्ब)र-
मानस्तम्भः कुम्भः संसारवी(बी)जरक्षायाः । हरिदन्तरमि-
तमूर्त्तिः क्रीडा

पश्चिमी लिपि. ७६
दानपत्र के अक्षरों में से अधिकतर के सिर ⌒ ऐसे हैं जिनकी उत्पत्ति वैद्यदेव के उपर्युक्त दानपत्र के
अक्षरों के सिरों से हुई हो. वर्तमान उड़िया लिपि के अक्षरों के सिर पुरुषोत्तमदेव के दानपत्र के
सिरों से अधिक घुमाववाले हैं और उनका अंतिम भाग अधिक नीचा होता है परंतु वे सिरे उक्त
दानपत्र के अक्षरों के सिरों ही के विकसित रूप हैं.
लिपिपत्र ३५ वें की मूल पंक्तियों¹ का अक्षरांतर—
श्री जय दुर्गायै नमः । वीर श्रीगजपति
गउड़ेश्वर नवकोटिकर्नाटककलवर्गेश्वर
श्रीपुरुषोत्तमदेव महाराजाङ्कर । पोते-
श्वरभटकु दान शासन पटा । ए ५
अङ्क मेष दि १० अं सोमवार ग्रहण-

११—पश्चिमी लिपि.
ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी तक (लिपिपत्र ३६ से ४०).

पश्चिमी लिपि का प्रचार गुजरात, काठियावाड़, नासिक, खानदेश तथा सतारा ज़िलों में,
हैदराबाद राज्य के कुछ अंशों और कोंकण आदि में ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी तक रहा
[L1

८० प्राचीनलिपिमाला.
ओर मुड़ कर नीचे को झुकी हुई रहती है ( देखो, लिपिपत्र ३६-४८, ५२-५७ ) और अ, आ, ई, क, ञ
और र अक्षरों की खड़ी लकीरों तथा बहुधा उ, ऊ और ऋ की मात्राओं के नीचे के अंश बाईं तरफ
मुड़ कर घुमाव के साथ ऊपर की ओर बढ़े हुए रहते हैं ( देखो, लिपिपत्र ३६-४८, ५२-५८ ). यही
ऊपर की ओर बढ़ा हुआ अंश समय के साथ और ऊपर बढ़ कर सिर तक भी पहुंचने लगा जिससे
तेलुगु-कनडी तथा ग्रंथ लिपियों में अ, आ, ई, क, झ और र की आकृतियां मूल अक्षरों से बिलकुल
विलक्षण हो गई. इसके अतिरिक्त दक्षिण के लेखक अपने अक्षरों में सुंदरता लाने के विचार से खड़ी
और आड़ी लकीरों को वक्र या खमदार बनाने लगे जिससे ऊपर की सीधी आड़ी लकीर की आकृति
बहुधा ⌒ , नीचे की सीधी आड़ी लकीर की ‿ और सीधी खड़ी लकीर की आकृति { ऐसी
बनने लगी तथा इन लकीरों के प्रारंभ, मध्य या अंत में कहीं कहीं ग्रंथियां भी बनाई जाने लगी. इन्हीं
कारणों, तथा कितने एक अक्षरों को चलती कलम से पूरा लिखने, से दक्षिण की लिपियों के वर्तमान
अक्षर उनके मूल ब्राह्मी अक्षरों से बहुत ही विलक्षण बन गये.

लिपिपत्र ३६ वां.
यह लिपिपत्र मंदसोर से मिले हुए राजा नरवर्मन् १ के समय के मालव ( विक्रम ) संवत् ४६१
( ई. स. ४०४ ) और वहीं से मिले हुए कुमारगुप्त २ के समय के मालव ( विक्रम ) संवत् ५२६ ( ई.
स. ४७२ ) के लेखों से तय्यार किया गया है. नरवर्मन् के समय के लेख में 'य' प्राचीन और नवीन
( नागरी का सा ) दोनों तरह का मिलता है. दक्षिणी शैली के अन्य लेखों में 'य' का दूसरा
( नागरी का सा ) रूप केवल संयुक्ताक्षर में, जहां 'य' दूसरा अक्षर होता है, प्रयुक्त होता है
परंतु यह लेख उत्तरी भारत का है, इसलिए इसमें वैसे रूप का भी केवल 'य' के स्थान में प्रयोग हुआ है.
'रु' का दूसरा रूप 'उ' की मात्रा सहित 'र' को चलती कलम से लिखने से बना है, शुद्ध
रीति से लिखा हुआ रूप तो पहिला ही है. 'इ' में दो बिंदियों के ऊपर की सीधी आड़ी
लकीर को वक्र रेखा बना दिया है.

लिपिपत्र ३६ वें की मूल पंक्तियों ३ का नागरी अक्षरांतर—
सिद्धम् सहस्रशिरसे तस्मै पुरुषायामितात्मने च-
तुस्समुद्रपर्य्यङ्कतोयनिद्रालवे नमः श्रीर्माल्वगणाम्नाते
प्रशस्ते कृतसंज्ञिते एकषष्ठ्यधिके प्राप्ते समाशतचतुष्ट-
य(ये) प्रावृक(ट्का)ले शुभे प्राप्ते मनस्तुष्टिकरे नृणाम् मधो(हे)
˙प्रवृत्ते शक्रस्य कृष्णास्यानुमते तदा निष्पन्नव्रीहियवसा

लिपिपत्र ३७ वां.
यह दानपत्र वलभी के राजा ध्रुवसेन ४ के गुप्त सं. २१० ( ई. स. ५३६ ) के और
धरसेन ५ ( दूसरे ) के गुप्त सं. २५२ ( ई. स. ५७१ ) के दानपत्रों से तय्यार किया गया है.
धरसेन ( दूसरे ) के दानपत्र में अनुस्वार और विसर्ग की बिंदियों के स्थान में आड़ी लकीरें बनाई

१. मेरे विद्वान् मित्र देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर की भेजी हुई उक्त लेख की छाप से.
२. फ्ली; गु. इं; प्लेट ११ से. ३. ये मूल पंक्तियां नरवर्मन् के मंदसोर के लेख से हैं.
४. एं. इं; जि. ११, पृ. ११० के पास के सेट से. ५. एं. इं; जि. ८, पृ. ३०२ और ३०३ के बीच के सेटों से.

पश्चिमी लिपि. ८१
हैं (देखो 'णां' और 'दृः') और हलंत अक्षर को उसके पहिले अक्षर के नीचे लिखा है (देखो
'पत्' 'शत्' और 'सेत्').
लिपिपत्र ३७वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
स्वस्ति वलभि(भी)तः प्रसभप्रणतामित्राणां मैत्रकाणामतु-
लबलसपत्नमण्डलाभोगरुंसक्तसंप्रहारशतलब्धप्रतापः
प्रतापः² प्रतापोपनतदानमानाज्र्ज्जवोपार्जितानुरागेानुरक्तमौ-
लभृतमित्रश्रेणीबलावाप्तराज्यश्रिः (श्रीः) परमम(मा)हेश्वरः श्रि(श्री)सेना-
पतिभटाकंस्तस्य सुतस्तत्पादरजोरुणावनतपविचि(त्री)कृतशिराः
लिपिपत्र ३८ वां.
यह लिपिपत्र पालीताना से मिले हुए गारुलक सिंहादित्य के गुप्त सं. २५५ (ई. स. ५७४)
के दानपत्र³ और वलभी के राजा शीलादित्य (पांचवें) के गुप्त सं. ४०३ (ई. स. ७२२) के दान-
पत्र⁴ से तय्यार किया गया है. शीलादित्य के दानपत्र में 'इ' के चार टुकड़े किये हैं, जिनमें से
नीचे की दो रेखाएं तो दो बिंदियों के स्थानापन्न हैं और ऊपर की दो तिरछी रेखाएं, सीधी आड़ी
लकीर के खमदार रूप के ही हिस्से हैं जो जुड़े हुए होने चाहिये थे. 'ए' का रूप विलक्षण बना
है परंतु वह लिपिपत्र ३७वें में दिये हुए 'ए' का त्वरा से लिखा हुआ विकृत रूप ही है. 'ऐ'
में ऊपर की खमदार आड़ी रेखा का खम के पूर्व का हिस्सा 'ए' के अग्रभाग की बाईं ओर
जुड़नेवाली रेखा का गोलाईदार रूप ही है और बाकी का भाग 'ए' का है. 'ल्ल' में ऊपर
का आधा भाग 'ल' (दूसरे) का रूप है और नीचे का आधा भाग 'ल' (तीसरे) का कुछ
विकृत रूप है. इस तरह दो प्रकार के 'ल' मिलकर यह रूप बना है.
लिपिपत्र ३८ वें की मूल पंक्तियों⁵ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति फङ्गप्रसवणात्प्रकृष्टकर्म्माम्भोङ्गताभ्युदया-
न्निभूताशेषदिषामनेकस मरशतसं पातात्यन्त विजयिना (नां)
प्रभृतयश कौत्यों लङ्कारालङ्कतान्यवयभुवां गारुलकानां
वंश्या(वंशा)नुक्रमेणाविर्भूतो दीनानाथाश्रितार्त्तिबान्धवजनो-
पजीव्यमानविभवविस्तरः तरुरिवाक्षीणफलच्छायातयैका-
लिपिपत्र ३६ वां.
यह लिपिपत्र त्रैकूटकवंशी राज दह्रसेन⁶ के कलचुरि संवत् २०७ (ई. स. ४५६) के, गुर्जर-
वंशी रणग्रह⁷ के कलचुरि सं. ३६१ (ई. स. ६४०) के और दह्र⁸ (दूसरे) के कलचुरि सं. ३६२
१. ये मूल पंक्तियां धरसेन (दूसरे) के दानपत्र से हैं. २. 'प्रतापः' शब्द यहां पर अनावश्यक है.
३. ऍ. इं; जि. ११, पृ. १८ और १६ के बीच के प्लेटों से. ४. ज. बंब. ए. सो; जि. ११, पृ. ३६३ के पास के प्लेट १ A. B. से.
५. ये मूल पंक्तियां गारुलक सिंहादित्य के दानपत्र से हैं.
६. ऍ. इं; जि. १०, पृ. ५३ के पास के सेट से. ७. ऍ. इं; जि. २, पृ. २१ के पास के सेट से.
८. ऍ. इं; जि. ५, पृ. ४० और ४१ के बीच के सेटों से.

८२ प्राचीनलिपिशाला.
(ई. स. ६४१) के दानपत्रों से तय्यार किया गया है. रणग्रह के दानपत्र का 'ए' लिपिपत्र ३८
में दिये हुए वलभी के राजा शीलादित्य के दानपत्र के 'ए' से मिलता हुआ है.
लिपिपत्र ३९वें की मूल पंक्तियों¹ का नागरी अक्षरांतर—
इत्युक्तञ्च भगवता वेदव्यासेन व्यासेन षष्टिवरिष(वर्ष)-
सहस्राणि स्वर्गे मोदति भूमिद (दः) आच्छेत्ता चानुमन्ता
च तान्येव नरके वसे [त्] विन्ध्याटवीष्वतोयासु शुष्ककोटरवा-
सिन [:] क्रि(कृ)ष्णाहयो हि जायन्ते भूमिदानापहारका [:]
लिपिपत्र ४० वां.
यह लिपिपत्र नवसारी से मिले हुए चालुक्य युवराज श्रयाश्रय (शीलादित्य) के कलचुरि सं.
४२१ (ई. स. ६७०) के दानपत्र² और गुजरात के राष्ट्रकूट (राठौड़) राजा कर्कराज (सुवर्णवर्ष)
के शक सं. ७३४ (ई. स. ८१२) के दानपत्र³ से तय्यार किया गया है. कर्कराज के दानपत्र के
'ड' की आकृति नागरी के 'द' की सी है जिसमें, संभव है कि, ग्रंथि से नीचे निकला हुआ अंश 'ढ'
से उक्त अक्षर को भिन्न बतलाने के लिये ही हो. 'ड' का ऐसा ही या इससे मिलता हुआ रूप
लिपिपत्र ३७ और ३८ में भी मिलता है.
लिपिपत्र ४०वें की मूल पंक्तियों⁴ का नागरी अक्षरांतर—
ओं स वोव्याद्वेधसा येन(धाम) यन्नाभिकमलङ्कृतं । हरश्च
यस्य कान्तेन्दुकलया स(क)मलङ्कृतं ॥ स्वस्ति स्वकीया-
न्वयवङ्श(वंश)कर्त्ता श्रीराष्ट्रकूटामलवङ्श(वंश)जन्मा । प्रदानशूरः
समरेकवीरो गोविन्दराजः क्षितिपो बभूव ॥ यस्या-
⸱⸱⸱मात्तजयिनः प्रियसाहसस्य क्षमापालवेशफलमेव
१२—मध्यप्रदेशी लिपि.
ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी के आस पास तक (लिपिपत्र ४१-४२).
मध्यप्रदेशी लिपि का प्रचार मध्यप्रदेश, बुंदेलखंड, हैदराबाद राज्य के उत्तरी विभाग तथा
मईसोर राज्य के कुछ हिस्सों में ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी के आस पास तक रहा. यह
लिपि गुप्तों⁵, वाकाटकवंशियों⁶, शरभपुर के

मध्यप्रदेशी लिपि. ८३
राजाओं¹ तथा कुछ कंदबों² के दानपत्रों या शिलालेखों में मिलती है. इस लिपि के दानपत्र अधिक
और विस्तृत रूप में मिलते हैं, शिलालेख कम और बहुधा छोटे छोटे. इसके अक्षर लंबाई में
अधिक और चौड़ाई में कम होते हैं, उनके सिर चौकूंटे या संदूक की आकृति के बहुधा भीतर से
खाली, परंतु कभी कभी भरे हुए भी, मिलते हैं और अक्षरों की आकृति बहुधा समकोणवाली
होती है (देखो, ऊपर पृ. ४३). इससे इस लिपि के अक्षर साधारण पाठक को विलक्षण प्रतीत
होते हैं परंतु इन दो बातों को छोड़ कर देखा जावे तो इस लिपि में और पश्चिमी लिपि में बहुत
कुछ समता है. इस लिपि पर भी पश्चिमी लिपि की नांई उत्तरी शैली का प्रभाव पड़ा है.

लिपिपत्र ४१ वां.
यह लिपिपत्र वाकाटकवंशी राजा प्रवरसेन (दूसरे) के दूदिया³ सिवनी⁴ और चम्मक५
के दानपत्रों से तय्यार किया गया है. दूदिया तथा सिवनी के दानपत्रों के अक्षरों के सिर
चौकूंटे और भीतर से खाली हैं तथा अधिकतर अक्षर समकोणवाले हैं, परंतु चम्मक के दानपत्र
के अक्षरों के चौकूंटे सिर भीतर से भरे हुए हैं और समकोणवाले अक्षरों की संख्या कम है.
दूदिया के दानपत्र से उद्धृत किये हुए अक्षरों के अंत में जो 'इ', 'ऊ' और 'औ' अक्षर दिये हैं
वे उक्त दानपत्र से नहीं हैं. 'ऊ' अजंटा की गुफा के लेखसंख्या ३ की पंक्ति १७ से⁶ और 'औ' महासु-
देवराज के रायपुर के दानपत्र की १० वीं पंक्ति७ से लिया है. उक्त तीनों दानपत्रों में कोई प्रचलित
संवत् नहीं दिया परंतु यह निश्चित है कि प्रवरसेन (दूसरा) गुप्तवंशी राजा चंद्रगुप्त दूसरे (देवगुप्त)
की पुत्री प्रभावतीगुप्ता का पुत्र था और चंद्रगुप्त दूसरे के समय के लेख गुप्त संवत् ८२ से ९३
(ई. स. ४०१-१२) तक के मिले हैं. ऐसी दशा में प्रवरसेन (दूसरे) का ई. स. की पांचवीं शताब्दी
के प्रारंभ के आस पास विद्यमान होना निश्चित है.

लिपिपत्र ४१वें की मूल पंक्तियों८ का नागरी अक्षरांतर—
दृष्टम् प्रवरपुरात् अग्निष्टोम(मा)प्तोर्यामोक्थ्यषोडश्यतिरा(रा)त्रवाज-
पेयबृहस्पतिसवसाद्यश्क्रचतुरश्वमेधयाजिनः विष्णुवृद्धसगो-
त्रस्य सम्राटः(ज्ञो) वाकाटकानाममहाराजश्रोप्रवरसेनस्य सूनोः
सूनोः अत्यन्तस्वामिमहाभैरवभक्तस्य अंसभारसन्निवेशितशि···लि-

लिपिपत्र ४२ वां.
यह लिपिपत्र बालाघाट से मिले हुए वाकाटकवंशी राजा पृथिवीसेन (दूसरे) के९, खरिअर से
मिले हुए राजा महासुदेव१० के और राजीम से मिले हुए राजा तीवरदेव के११ दानपत्रों से तय्यार किया
गया है. तीवरदेव के दानपत्र में 'इ' की दो बिंदियों के ऊपर की आड़ी लकीर में विलक्षण मोड़ डाला है.
खरिअर और राजीम के दानपत्रों का समय अनुमान से लगाया है क्योंकि उनका निश्चित
समय स्थिर करने के लिये अब तक ठीक साधन उपलब्ध नहीं हुए.


१. ऍ. इं; जि. ७, पृ. १०४-६. जि. ६, पृ. १७२-३. फ्ली; गु. इं; लेखसंख्या ८१.
२. इं. ऍ; जि. २१, पृ. ६३. रा; ऍ. क; जि. ७, पृ. २०० के पास का सेट.
३. ऍ. इं; जि. ३, पृ. २६० और २६१ के बीच के सेट ४. फ्ली; गु इं; सेट ३५ वां.
५. फ्ली; गु. इं; सेट ३४.
६. आ. स. वे. इं; जि. ४, प्लेट ५७. ७. फ्ली; गु. इं; प्लेट २७.
८. ये मूल पंक्तियां प्रवरसेन (दूसरे) के दूदिया के दानपत्र से हैं.
९. ऍ. इं; जि. ६, पृ. २७० और २७१ के बीच के प्लेटों से.
१०. ऍ. इं; जि. पृ. १७२ और १७३ के बीच के प्लेटों से. ११. फ्ली; गु. इं; प्लेट ४५ से.

८४ प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र ४२ वें की मूल पंक्तियों १ का नागरी अक्षरांतर—
स्वस्ति शरभपुराद्विक्रमोपनतसामन्तमकुटचूडामणिप्रभाप्रसे-
काम्बुधौतपादयुगलो रिपुविलासिनोसीमन्तोद्धरणहेतुर्व्वसुवसु-
धागोप्रद परमभागवतो मातापितृ(तृ)पादानुध्यातश्रीमहासुदेवराजः
क्षितिमण्डाहारौयनवन्दकएतत्प्रावेश्यश्रा[म्बिल्कयो]२( प्रतिवासिकुटु-
म्बिनस्समाज्ञापयति ॥ विदितमस्तु वो यथास्माभिरेतद्ग्रामद-
र्यं तृ(त्रि)दशपतिसदनसुखप्रतिष्ठाकरो(रं) यावद्रविशशितार[किरणप्र-


१३—तेलुगु-कनड़ी लिपि.
ई. स. की पांचवीं शताब्दी से (लिपिपत्र ४३ से ५१).

तेलुगु-कनड़ी लिपि का प्रचार बंबई इहाते के दक्षिणी विभाग में, हैदराबाद राज्य के दक्षिणी हिस्सों
में, माईसोर राज्य में तथा मद्रास इहाते के उत्तर-पूर्वी विभाग में ई. स. की पांचवीं शताब्दी के आस-
पास से पाया जाता है (देखो, ऊपर पृष्ठ ४३). इसमें समय के साथ परिवर्तन होते होते अक्षरों की
गोलाई बढ़ने लगी और त्वरासे लिखने के कारण ई. स. की ११ वीं शताब्दी के आसपास
इसके कितने एक अक्षर और १४ वीं शताब्दी के आसपास अधिकतर अक्षर वर्तमान तेलुगु और कनड़ी
लिपियों से मिलते जुलते बन गये. फिर उनमें थोड़ासा और परिवर्तन होकर वर्तमान तेलुगु और
कनड़ी लिपियां, जो परस्पर बहुत ही मिलती हुई हैं, बनीं; इसलिये इस लिपि का नाम तेलुगु-कनड़ी
कल्पना किया गया है. यह लिपि पल्लवों, कदंबों, पश्चिमी तथा पूर्वी चालुक्यों, राष्ट्रकूटों, गंगावंशियों,
काकतीयों आदि कई राजवंशों तथा कई सामंतवंशों के शिलालेख तथा दानपत्रों में एवं कितने ही
साधारण पुरुषों के लेखों में मिलती है. उक्त लेखादि की संख्या सैकड़ों नहीं किंतु हजारों को पहुंच
चुकी है, और वे ऐपिग्राफिआ इंडिका, ऐपिग्राफिआ कर्नाटिका, इंडियन ऐंटिक्वेरी आदि प्राचीन शोध-
संबंधी अनेक पुस्तकों में छप चुके हैं.


लिपिपत्र ४३ वां.
यह लिपिपत्र पल्लववंशी राजा विष्णुगोपवर्मन् के उरुवुपल्लि ३ के, तथा उसी वंश के राजा
सिंहवर्मन् के पिकिर २ और मंगळूर ४ गांवों से मिले हुए दानपत्रों से तय्यार किया गया है. विष्णु-
गोपवर्मन् के दानपत्रों के अक्षरों के सिर मध्यप्रदेशी लिपि की नांई बहुधा चौकूंटे और भीतर से
खाली हैं और समकोणवाले अक्षरों की संख्या कम और गोलाईदार या खमदार लकीरवालों की
अधिक है, तोभी इसकी लिपि मध्यप्रदेशी और पश्चिमी लिपि से बहुत कुछ मिलती हुई है. सिंहवर्मन्


१. ये मूल पंक्तियां महासुदेव के खरिआर के दानपत्र से हैं.
२. इं. ऐं.; जि. ५, पृ. ५० और ५१ के बीच के प्लेटों से.
३. इं. ऐं.; जि. ८, पृ. १६० और १६१ के बीच के प्लेटों से.
४. इं. ऐं; जि. ५, पृ. १५४ और १५६ के बीच के प्लेटों से.

के दानपत्रों के अक्षरों के सिर चौकूंटे नहीं किंतु छोटी सी आड़ी लकीर से बने हुए हैं. इस
लिपिपत्र की लिपियों का समय केवल अनुमान से ही लिखा है.
लिपिपत्र ४३वें की मूल पंक्तियों का१ नागरी अक्षरांतर—
जितं भगवता श्रीविजयपलक्कडस्थानात् परम्ब्रह्म-
ण्यस्य स्वबाहुबलाज्जितोर्जितक्षात्रतपोनिधेः विहि-
तसर्व्वमर्यादस्य स्थितिस्थितस्यामितात्मनो महाराज-
स्य श्रीस्कन्दवर्म्मणः प्रपौत्रस्यार्जितशक्तिसिद्धिसम्पन्न-
स्य प्रतापोनतराजमण्डलस्य महाराजस्य वसु-
धातलैकवीरस्य श्रीवीरवर्म्मणः पौत्रस्य देवद्विज-

लिपिपत्र ४४ वां.
यह लिपिपत्र देवगिरि से मिले हुए कदंबवंशी राजा मृगेशवर्मन्२ और काकुस्थवर्मन्३ के दान-
पत्रों से तय्यार किया गया है. इनके अक्षरों के सिर चौकूंटे परंतु भीतर से भरे हुए हैं और कितने
ही अक्षरों की आड़ी लकीरें विशेष कर खमदार बनती गई हैं (देखो, मृगेशवर्मन् के दानपत्रों में इ, ख,
ज, ट, ड, घ, ब, भ, म, व और ह, और काकुस्थवर्मन् के दानपत्र में इ, ख, च, ढ, द, ल आदि).
लिपिपत्र ४४वें की मूल पंक्तियों४ का नागरी अक्षरांतर—
सिद्धम् ॥ जयत्यहं [स्तलोकेशः सर्व्वभूतहिते रतः रागा-
द्यैरहरोनन्तोऽनन्त[नन्द]गौश्वरः ॥ स्वस्ति विजयवैज[य]न्त्या [:] स्वामिम-
हासेनेनमातृगणानुद्ध्या (ध्या) ताभिषिक्तानां५ मानव्यसगोत्राणां६ हारितिपू-
त्राणां (णां) तां (आं) गिरसां प्रतेहृतस्वाद्ध्या (ध्या) यचर्चकाना (नां) सद्द्धर्म्मसंदर्बाना (नां)
कदंबानां अनेकजन्मान्तरोपाज्जितविपुलपुण्यस्कन्धः वाहवाज्जित-

लिपिपत्र ४५ वां.
यह लिपिपत्र चालुक्यवंशी राजा मंगलेश्वर के समय के शक सं. ५०० (ई. स. ५७८) के
शिलालेख७, उसी वंश के राजा पुलकेशिन् (दूसरे) के हैदराबाद (निज़ाम राज्य में) से मिले हुए
शक सं. ५३४ (ई. स. ६१२) के दानपत्र८ और पूर्वी चालुक्य राजा सर्वलोकाश्रय (विजयसिद्धि,
मंगियुवराज) के राज्यवर्ष दूसरे (ई. स. ६७३) के दानपत्र९ से तय्यार किया गया है. मंगलेश्वर

१. ये मूल पंक्तियां उरुवुपल्लि के दानपत्र से हैं.
२. इं. ऐं; जि. ७, पृ. ३५ के सामने के प्लेट से. ३. इं. ऐं; जि. ६, पृ. २४ और २५ के बीच के प्लेटों से.
४. ये मूल पंक्तियां मृगेशवर्मन् के दानपत्र से हैं.
५. "भिषिक्तानां' के 'ना' के पीछे ठीक वैसा ही चिह्न है जैसा कि मृगेशवर्मन् के दानपत्र से दिये हुए अक्षरों में
'हिः' के विसर्ग के नीचे की बिंदी के स्थान में पाया जाता है. संभव है कि यह अनुस्वार का चिह्न हो (न कि 'म्' का)
जो अक्षर के ऊपर नहीं किंतु आगे धरा हो. इस प्रकार का चिह्न उक्त दानपत्र में तीन जगह मिलता है, अन्यत्र अनुस्वार
का नियत चिह्न सर्वत्र अक्षर के ऊपर ही धरा है.
६. यहां भी ठीक वही चिह्न है जिसका विवेचन टिप्पण ५ में किया गया है.
७. इं; ऐं; जि. १०, पृ. ५८ के पास के प्लेट से. ८. इं. ऐं; जि. ६, पृ. ७२ और ७३ के बीच के प्लेटों से.
९. ऐं. इं; जि. ८, पृ. २६८ और २६९ के बीच के प्लेटों से.