प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 95, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ * प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र १६ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
ओं आसीत्सर्व्वमहीक्षितामनुरिव क्षत्त्रस्थितेर्द्देशिकः श्रीमान्मत्तगजे-
न्द्रखेलगमनः श्रीयज्ञवर्म्मा नृपः यस्याहूतसहस्रनेत्त्रविरहक्षामा
सदैवाध्वरैः पौलोमी चिरमश्रुपातमलिनं(नां) धत्ते कपोलश्रियं ॥
श्रीशार्दूलनृपात्मजः परहितः श्रीपौष्णः श्रूयते लोके चन्द्रम-
लिपिपत्र २० वां.
यह लिपिपत्र उदयपुर के विक्टोरिया हॉल में रक्खे हुए मेवाड़ के गुहिलवंशी राजा अपराजित
के समय के वि. सं. ७१८ (ई. स. ६६१) के लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से बनाया
गया है. इसके 'थ' और 'श' नागरी के 'थ' और 'श' से मिलते जुलते ही हैं केवल ऊपर की
गांठें उलटी हैं. 'य' के प्राचीन और नवीन (नागरी के सदृश) दोनों रूप मिलते हैं. 'आ' की
मात्रा चार प्रकार से बनाई है. 'जा' और 'हा' के ऊपर 'आ' की मात्रा ( ऐसी लगी है, जिसकी
स्मृति अब तक कितने एक पुस्तकलेखकों को है क्योंकि जब वे भूल से कहीं 'आ' की मात्रा छोड़
जाते हैं और व्यंजन की दाहिनी ओर उसको लिखने का स्थान नहीं होता तब वे उस के ऊपर ऽ
चिह्न लगा देते हैं. इस लेख में अक्षरों तथा स्वरों की मात्राओं में सुंदरता लाने का यत्न कर लेखक
ने अपनी चित्रनिपुणता का परिचय दिया है (देखो, जा, टा, रा, धि, रि, हि, ही, ते, ले, नै, वै, यो, कौ,
शौ, सौ, त्य, प्र, व्य, श्री).
लिपिपत्र २० वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
राजा श्रीगुहिलान्वयामलपयोधराशौ स्फुरद्दीधितिर्ध्वस्तध्वान्तसमूहदृष्ट-
सकलव्यालावलेपान्तकृत् । श्रीमानित्यपराजितः क्षितिभृतामभ्यर्चितो
मूर्धभिः(भि)र्वृत्तस्वच्छतयैव कौस्तुभमणिश्र्जातो जगद्भूषणं ॥ शिवात्म-
जोखण्डितशक्तिसंपद्धुर्यः समाक्रान्तभुजङ्गशत्रु [:]। तेनेन्द्रवत्स्कन्द इव
प्रणेता कृतो महाराजवराहसिंहः जनगृहीतमपि क्षयवर्जितं
धवलमप्यनुरञ्जितभूतलं स्थिरमपि प्रविकासि दिशो दश भ्रमति
लिपिपत्र २१ वां.
यह लिपिपत्र बांसखेड़ा से मिले हुए राजा हर्ष (हर्षवर्द्धन) के दानपत्र१, नेपाल के राजा अंशु-
वर्मन् के लेख२, राजा दुर्गगण के झालरापाटन के लेख३, कुदारकोट के लेख४ तथा राजा शिवगण के
कोटा के लेख५ से तय्यार किया गया है. हर्ष के दानपत्र से प्राचीन अक्षरों की पहिली पंक्ति के 'ह'
से 'प्र' तक के अक्षर उद्धृत किये हैं और अंतिम पांच अक्षर ('ध' से 'श्री' तक) उक्त दानपत्र
के अंत के हर्ष के हस्ताक्षरों६ से लिये गये हैं जो चित्रलिपि का नमूना होने के साथ ही साथ उक्त राजा
की चित्रविद्या की निपुणता प्रकट करते हैं. झालरापाटन के लेख में विसर्ग की दोनों बिंदियों को ჻
१. ये मूल पंक्तियां मौखरी (मुखर) वंशी राजा अनंतवर्मन् के नागार्जुनी गुफा के लेख से उद्धृत की गई हैं (फ्ली;
गु. इं; प्लेट ३१ A.)
२. ऍ. इं; जि. ४, पृ. २१० के पास का प्लेट. ३. इं. पँ; जि. १०, पृ. १७० के पास का प्लेट.
४. झालरापाटन (छावनी) में रक्खे हुए मूल लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई दोनों ओर की छापों से.
५. ऍ. इं; जि. १, पृ. १८० के पास का प्लेट. ६. इं. पँ; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट.