प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 104, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंशारदा लिपि. ७५
वदनं यदीयमनुत्तराङ्ककृताङ्गयष्टिः ॥ नानाविधालङ्कृतिसन्नि-
वेशविशेषरम्या गुणशालिनी या । मनोहरत्वं सुतरा मवाप स-
चेतसां सत्कविभारतीव ॥ शृङ्गारसिन्धो X किमियन्नु वेला किं वा
मनोभ्रूतसुमञ्जरी स्यात् वसन्तराजस्य नु राज्यलक्ष्मीस्त्रैलोक्यसौन्दर्य-
लिपिपत्र २६ वां.
यह लिपिपत्र राजा विदग्ध के सुंगल गांव के दानपत्र२ से तय्यार किया गया है. इसमें 'ड' वि-
लक्षण है, कहीं कहीं 'प' और 'म' में स्पष्ट अंतर नहीं है, 'व' तथा 'ब' में भेद नहीं है, 'ए' की
मात्रा तीन प्रकार से लगी है जिनमें से एक आड़ी लकीर है (देखो, 'ऐ') और 'र्थ', 'थै', 'स्थ'
और 'स्थि' में 'थ' का रूप विकृत मिलता है.
लिपिपत्र २६ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
ओं स्वस्ति ॥।१ श्रीचणप(म्प)कावासकात्परमभट्टारकमहाराजाधिराज-
परमेश्वरश्रीमद्युगाकरवर्मदेवपादानुध्यात[:] परमब्र(ह्म)ह्मण्यो निखि-
लसच्छासनाभिप्रवृत्तगुरुवृत्तदेवतानुवृत्तसमधिगतशास्तुकुशल-
तया समाराधितविद्वज्जनहृदयो नथानुगतपौरुषप्रयोगा-
वाप्तत्रिवर्गसिद्धिः सम्यगर्जिताभिकामिकगुणसहिततया फ-
लित इव मार्गतरु [:] । सर्वसत्वा(त्त्वा)अयनौ(णौ)यो मोषनाम्नाय३
आदित्यवङशो(वंशो)द्भव [:] परममाहेश्वरो (रः) श्रीभोगमतीदेव्या (व्यां) समुत्पन्न [:]
लिपिपत्र ३० वां.
यह लिपिपत्र सोमवर्मा के कुलैत के दानपत्र४, चंबा से मिले हुए सोमवर्मा और आसट के दान-
पत्र५, राजानक नागपाल के देवीरीकोठी (देब्रिकोटी) के शिलालेख६, आरिगांव के शिलालेख७ तथा
जालंधर के राजा जयच्चंद्र के समय की शक संवत् ११२६८=लौकिक संवत् ८० (ई. स. १२०४) की
कांगडा ज़िले के कीरग्राम के बैजनाथ (वैद्यनाथ) के मंदिर की दो प्रशस्तियों९ से तय्यार किया गया
है और इसमें मुख्य मुख्य अक्षर ही दिये गये हैं. कुलैत के दानपत्र में 'च' के बाईं तरफ के अंश के नीचे
के भाग में गांठ सी लगाई है और 'छ' की खड़ी लकीर के मध्य में ग्रंथि बनाकर उसके और 'क' के
बीच के अंतर को स्पष्ट किया है. बैजनाथ की प्रशस्तियों के 'ई' को, उक्त अक्षर के प्राचीन रूप में खड़ी
कभी कभी लगने लगी और बंगला, मैथिल तथा उड़िया लिपियों में दाहिनी तरफ नीचे गांठवाली वक्र रेखा के रूप में उसका
अब तक प्रयोग होता है (देखो, लिपिपत्र ७८ और ७६ में उक्त लिपियों की वर्णमालाओं में के, कै, को और कौ).
१. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट १७ से.
२. इन तीन लकीरों में से पहिली की आकृति ) ऐसी है और दूसरी व तीसरी खड़ी लकीरें हैं जिनमें स एक अनावश्यक है.
३. शुद्ध पाठ 'मोषणान्वयः' होना चाहिये.
४. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट २४ से.
५. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट २५ से.
६. फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट ३० से.
७. ऐँ. इं; जि. ६, पृ. ३०१ के पास के प्लेट से.
८. इन प्रशस्तियों के समय के लिये देखो ऊपर पृ. ७३ टिप्पणी ७.
९. बु; इं. पे; प्लेट ४, प्राचीन अक्षरों की पंक्ति प्रथम से.