प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 103, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें७४ प्राचीनलिपिमला.
पहिले शारदालिपि के लेख बहुत ही कम प्रसिद्धि में आये थे और ई. स. १८०४ तक तो एक भी लेख
की प्रतिकृति प्रसिद्ध नहीं हुई थी, परंतु सुप्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. फोजल ने ई. स. १६११ में बड़े
श्रम के साथ चंबा राज्य के शिलालेख और दानपत्रों का बड़ा संग्रह कर 'ऐंटिक्विटीज़ ऑफ़ चंबा
स्टेट' नामक अपूर्व ग्रंथ प्रकाशित किया जिसमें प्राचीन लिपियों के अभ्यासियों के लिये शारदा
लिपि की अमूल्य सामग्री है.
लिपिपत्र २८ वां.
यह लिपिपत्र सराहां की प्रशस्ति¹ से तय्यार किया गया है. इसमें 'ए' के लिखोण की सिर
के स्थान की आड़ी लकीर की बाईं ओर चिन्ह और जोड़ा है जो वास्तव में 'ए' की मात्रा का
एक प्रकार का चिह्न है और कुटिल तथा नागरी लिपि के लेखों में ए, ऐ, ओ और औ की मात्राओं
में भी कभी कभी मिलता² है. पीछे से यही चिह्न लंबा होकर खड़ी लकीर³ के रूप में परिणत
होगया (देखो, लिपिपत्र ३१ में बहादुरसिंह के दानपत्र का 'ए' ). वर्तमान शारदा 'ए' में इस
खड़ी लकीर के अतिरिक्त 'ए' के ऊपर भी नागरी की 'ए' की मात्रा सी मात्रा और लगाई जाती है
(देखो, लिपिपत्र ७७). 'द्' के मध्य में ग्रंथि लगाई है. 'श' और 'स' में इतना ही भेद है कि
पहिले का सिर पूरे अक्षर पर है और दूसरे का दो अंशो में विभक्त है. 'त्' तथा 'म्' में मूल अक्षरों
के चिह्न स्पष्ट नहीं रहे. 'ओ' की मात्रा का चिह्न कहीं ~ भी है (देखो, 'यो'), 'औ' की मात्रा
कहीं उक्त चिह्न के अतिरिक्त व्यंजन के सिर के अंत में ^ चिह्न और जोड़ कर बनाई है (देखो,
'मौ' ) और रेफ पंक्ति से ऊपर नहीं किंतु सीध में लगाया है.
लिपिपत्र २८ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
किष्किन्धाकाधौशकुले प्रसूता सोमप्रभा नाम बभूव तस्य ।
देवी जगद्भूषणभूतमूर्तिस्त्रिलोचनस्येव गिरौशपुत्री ॥ अपूर्व-
मिन्दुम्प्रविधाय वेधास्सदा स्फुरत्कान्तिकलकमुक्तं ... संपूर्णबिम्बं (बिम्बं)
के राजा जयचंद्र ( जयचंद्र ) के समय की दो प्रशस्तियां लगी हैं. जनरल कनिंगहाम ने बाबू ( राजा ) शिवप्रसाद के पठना-
नुसार उनका समय क्रमशः लौकिक ( सप्तर्षि ) संवत् ८० और गत शककाल ७२६ ( ई. स. ८०४ ) माना था ( क; आ. स. रि;
जि. ४, पृ. १८०-८२ ; प्लेट ४२). फिर डॉ. बूलर ने ये प्रशस्तियां छापीं (ऐं. इं ; जि. १, पृ. १०४-७ ; ११२-५) और पहिली का संवत्
[लौकिक] संवत्सर ८० ज्येष्ठ शुक्ल १ रविवार और दूसरी का गत शककाल ७[२६] होना स्थिर किया. फिर उसी आधार
पर इन प्रशस्तियों को शारदा लिपि के सब से पुराने लेख, एवं उक्त लिपि का प्रचार ई. स. ८०० के आस पास से होना, मान
लिया ( वू ; इं. पे; पृ. ५७ ) परंतु ई. स. १८८८ में डॉ. कीलहॉर्न ने गणित कर देखा तो शक संवत् ६२६ से १४२६ तक की आठ
शताब्दियों के गत २६ वें वर्षों में से केवल शक संवत् ११२६ ही एक ऐसा वर्ष पाया जिसमें ज्येष्ठ शुक्ल १ को रविवार था. इस
आधार पर उक्त विद्वान् ने इन प्रशस्तियों का ठीक समय शक संवत् ११२६ = लौकिक संवत् ८० होना स्थिर किया ( इं. ऐं ;
जि. २०, पृ. १५४ ) और डॉ. फोजल ने मूल प्रशस्तियों को देखकर डॉ. कीलहॉर्न का कथन ही ठीक बतलाया ( फो; ऐँ. चं.
स्टेट् ; पृ. ४३-४ ). ऐसी दशा में ये प्रशस्तियां न तो ई. स. ८०४ की मानी जा सकती है और न शारदा लिपि का प्रचार ई. स.
८०० के आस पास होना स्वीकार किया जा सकता है. दूसरी बात यह भी है कि जनरल कनिंगहाम ने जयचंद्र से पांचवें
राजा जयचंद्रसिंह की गद्दीनशीनी ई. स. १३९५ में और ८ वें राजा रूपचंद्र की गद्दीनशीनी ई. स. १३६० में होना और उस
(रूपचंद्र ) का फ़ीरोज़ तुगलक ( ई. स. १३६०-७० ) के अधीन होना लिखा है ( क; कॉ. मि. इं; पृ. १०४). ऐसी दशा में
भी जयचंद्र का ई. स. ८०४ में नहीं किंतु १२०४ में विद्यमान होना ही स्थिर होता है.
१ फो; ऐँ. चं. स्टे; प्लेट १५.
२ देखो, लिपिपत्र १८वें की मूल पंक्तियों में से दूसरी पंक्ति में 'विधत्ते' का 'ते', उसी पंक्ति में 'शत्रुसैन्यं' का 'सै',
और उसी लिपिपत्र में 'श्रो' और 'श्रो'.
३ यही खड़ी लकीर नागरी में 'पर्द्धीमात्रा' (पृष्ठमात्रा) होकर ए, ऐ, ओ और औ की मात्रावाले व्यंजनों के पूर्व