प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 107, कुल 318 में से
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प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र ३३ वां.
यह लिपिपत्र बंगाल के राजा लक्ष्मणसेन के तर्पणडिघी के दानपत्र १ से और कामरूप के
वैद्यदेव के दानपत्र २ से तय्यार किया गया है. उन दोनों में 'इ' और 'ई' में विशेष अंतर नहीं है.
वैद्यदेव के दानपत्र का 'ऐ', 'ए' से नहीं, किंतु 'इ' में कुछ परिवर्तन करके बनाया है, अनु-
स्वार को अक्षर के ऊपर नहीं किंतु आगे धरा है और उसके नीचे हलंत की सी तिरछी लकीर
और लगाई है, 'ऊ' और 'ऋ' की मात्राओं में स्पष्ट अंतर नहीं है, 'व' और 'ब' में भेद नहीं है
और सिर सीधी लकीर से नहीं किंतु ⊂ ऐसी लकीर से बनाये हैं, जिसका अधिक विकास उड़िया
लिपि के सिरों में पाया जाता है.
लिपिपत्र ३३ वें की मूल पंक्तियों ३ का नागरी अक्षरांतर—
ओं ओं नमो भगवते वासुदेवाय ॥ स्वस्ति ॥ अम्व(म्ब)र-
मानस्तम्भः कुम्भः संसारवी(बी)जरक्षायाः । हरिदन्तरमि-
तमूर्त्तिः क्रीडा