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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 318 में से

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पृष्ठ 106

१०—बंगला लिपि.
ई. स. की ११ वीं शताब्दी के आस पास से (लिपिपत्र ३२ से ३५).
बंगला लिपि भारतवर्ष के पूर्वी विभाग अर्थात् मगध की तरफ़ की नागरी लिपि से निकली है
और बिहार, बंगाल, मिथिला, नेपाल, आसाम तथा उड़ीसा से मिलनेवाले कितने एक शिलालेख,
दानपत्र, सिक्कों या हस्तलिखित पुस्तकों में पाई जाती है. बंगाल के राजा नारायणपाल के समय,
अर्थात् ई. स. की दसवीं शताब्दी तक तो उधर भी नागरी लिपि का ही प्रचार रहा. उक्त राजा के
लेखों में केवल 'ए'१, 'ख'२ आदि कुछ अक्षरों में बंगला की ओर झुकाव नज़र आता है. ई. स. की
ग्यारहवीं शताब्दी के पालवंशी राजा विजयपाल के देवपारा के लेख३ में ए, ख, ञ, त, म, र, ल और
स में नागरी से थोड़ी सी भिन्नता है और कामरूप के वैद्यदेव के दानपत्र४, आसाम से मिले हुए
वल्लभेंद्र के दानपत्र५ और हस्त्राकोल के लेख६ की लिपियों में से प्रत्येक को नागरी (लिपिपत्र २४-२७) से
मिलाया जावे तो अ, इ, ई, ऋ, ए, ऐ, ख, घ, झ, ञ, ट, थ, प, फ, र, श और ष में अंतर पाया जाता
है. इस प्रकार लेखनशैली में क्रमशः परिवर्तन होते होते वर्तमान बंगला लिपि बनी.
लिपिपत्र ३२ वां.
यह लिपिपत्र बंगाल के राजा नारायणपाल के समय के बदाल के स्तंभ के लेख७ और विजय-
सेन के देवपारा के लेख८ से तय्यार किया गया है. बदाल के लेख से तो मुख्य मुख्य अक्षर ही लिये
गये हैं. उनमें 'अ' और 'आ' की प्रारंभ की छोटीसी खड़ी लकीर न लगने से उनके रूप नागरी
के 'ञ' से बन गये हैं. संभव है कि यह भिन्नता दानपत्र खोदनेवाले की ग़लती से हुई हो.
देवपारा के लेख में अवग्रह की आकृति वर्तमान नागरी के 'इ' सी है, विसर्ग के ऊपर भी
सिर की आड़ी लकीर लगाई है, 'प' तथा 'य' में विशेष अंतर नहीं है और 'व' और 'ब' में
कोई भेद नहीं है.
लिपिपत्र ३२वें की मूल पंक्तियों९ का नागरी अक्षरांतर—
तस्मिन् सेनान्ववाये प्रतिसुभटशतोत्सादनव्र(ब्र)ह्मवादौ
स व्र(ब्र)ह्मक्षत्रियाणामजनि कुलशिरोदाम सामन्तसे-
नः। उन्नीयन्ते यदीयाः स्खलदुदधिजलोल्लोलश्री-
तेषु सेतोः कच्छान्तेष्वप्सरोभिर्भृशम यतनथस्पर्द्धया
युद्धगाथाः ॥ यस्मिन् सङ्गरचत्वरे पटुरटत्तूर्योप-
१. देखो लिपिपत्र ३२.
२. मेमॉयर्स ऑफ़ एशियाटिक् सोसाइटी ऑफ़ बंगाल, जिल्द ५, प्लेट २४ की अंतिम पंक्ति में 'वैशाख्यां' का 'ख'.
३. ऍ. इं; जि. १, पृ. ३०८ के पास का प्लेट. ४. ऍ. इं; जि. २, पृ. ३५२ और ३५३ के बीच के ४ प्लेट.
५. ऍ. इं; जि. २, पृ. १८४ और १८५ के बीच के २ प्लेट. ६. ज. बंगा. ए. सो; ई. स. १८०८, पृ. ४६२.
७. ऍ. इं; जि. २, पृ. १६१ के सामने का प्लेट. ८. ऍ. इं; जि. १, पृ. ३०८ के पास का प्लेट.
९. ये मूल पंक्तियां देवपारा के लेख से हैं.