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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 318 में से

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पृष्ठ 113

८४ प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र ४२ वें की मूल पंक्तियों १ का नागरी अक्षरांतर—
स्वस्ति शरभपुराद्विक्रमोपनतसामन्तमकुटचूडामणिप्रभाप्रसे-
काम्बुधौतपादयुगलो रिपुविलासिनोसीमन्तोद्धरणहेतुर्व्वसुवसु-
धागोप्रद परमभागवतो मातापितृ(तृ)पादानुध्यातश्रीमहासुदेवराजः
क्षितिमण्डाहारौयनवन्दकएतत्प्रावेश्यश्रा[म्बिल्कयो]२( प्रतिवासिकुटु-
म्बिनस्समाज्ञापयति ॥ विदितमस्तु वो यथास्माभिरेतद्ग्रामद-
र्यं तृ(त्रि)दशपतिसदनसुखप्रतिष्ठाकरो(रं) यावद्रविशशितार[किरणप्र-


१३—तेलुगु-कनड़ी लिपि.
ई. स. की पांचवीं शताब्दी से (लिपिपत्र ४३ से ५१).

तेलुगु-कनड़ी लिपि का प्रचार बंबई इहाते के दक्षिणी विभाग में, हैदराबाद राज्य के दक्षिणी हिस्सों
में, माईसोर राज्य में तथा मद्रास इहाते के उत्तर-पूर्वी विभाग में ई. स. की पांचवीं शताब्दी के आस-
पास से पाया जाता है (देखो, ऊपर पृष्ठ ४३). इसमें समय के साथ परिवर्तन होते होते अक्षरों की
गोलाई बढ़ने लगी और त्वरासे लिखने के कारण ई. स. की ११ वीं शताब्दी के आसपास
इसके कितने एक अक्षर और १४ वीं शताब्दी के आसपास अधिकतर अक्षर वर्तमान तेलुगु और कनड़ी
लिपियों से मिलते जुलते बन गये. फिर उनमें थोड़ासा और परिवर्तन होकर वर्तमान तेलुगु और
कनड़ी लिपियां, जो परस्पर बहुत ही मिलती हुई हैं, बनीं; इसलिये इस लिपि का नाम तेलुगु-कनड़ी
कल्पना किया गया है. यह लिपि पल्लवों, कदंबों, पश्चिमी तथा पूर्वी चालुक्यों, राष्ट्रकूटों, गंगावंशियों,
काकतीयों आदि कई राजवंशों तथा कई सामंतवंशों के शिलालेख तथा दानपत्रों में एवं कितने ही
साधारण पुरुषों के लेखों में मिलती है. उक्त लेखादि की संख्या सैकड़ों नहीं किंतु हजारों को पहुंच
चुकी है, और वे ऐपिग्राफिआ इंडिका, ऐपिग्राफिआ कर्नाटिका, इंडियन ऐंटिक्वेरी आदि प्राचीन शोध-
संबंधी अनेक पुस्तकों में छप चुके हैं.


लिपिपत्र ४३ वां.
यह लिपिपत्र पल्लववंशी राजा विष्णुगोपवर्मन् के उरुवुपल्लि ३ के, तथा उसी वंश के राजा
सिंहवर्मन् के पिकिर २ और मंगळूर ४ गांवों से मिले हुए दानपत्रों से तय्यार किया गया है. विष्णु-
गोपवर्मन् के दानपत्रों के अक्षरों के सिर मध्यप्रदेशी लिपि की नांई बहुधा चौकूंटे और भीतर से
खाली हैं और समकोणवाले अक्षरों की संख्या कम और गोलाईदार या खमदार लकीरवालों की
अधिक है, तोभी इसकी लिपि मध्यप्रदेशी और पश्चिमी लिपि से बहुत कुछ मिलती हुई है. सिंहवर्मन्


१. ये मूल पंक्तियां महासुदेव के खरिआर के दानपत्र से हैं.
२. इं. ऐं.; जि. ५, पृ. ५० और ५१ के बीच के प्लेटों से.
३. इं. ऐं.; जि. ८, पृ. १६० और १६१ के बीच के प्लेटों से.
४. इं. ऐं; जि. ५, पृ. १५४ और १५६ के बीच के प्लेटों से.