सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 102

१२६४) के सूंधा नामक पहाड़ के लेख१ और मेवाड़ के गुहिलवंशी रावल समरसिंह के समय के चीरवा
गांव से मिले हुए वि. सं. १३३० (ई. स. १२७३) के लेख२ से तय्यार किया गया है. ओरिआ गांव
के लेख में 'ध' के सिर नहीं है परंतु 'ध' को 'व' से स्पष्ट रूप से भिन्न बतलाने के लिये व के ऊपर
बाईं ओर ( ऐसी लकीर जोड़ दी है. यह रूप पिछले नागरी के लेखों तथा पुस्तकों में मिल
आता है. सूंधा के लेख की लिपि जैन है. उसके 'लृ', 'ठ' आदि अक्षरों को अब तक जैन लेखक
वैसा ही लिखते हैं. 'णण' को, 'ण' लिखके बीच में आड़ी लकीर लगा कर बनाया है. यह रूप कई लेखों में
मिलता है और अब तक कई पुस्तकलेखक उसको ऐसा ही लिखते हैं. चीरवा के लेख में 'ग्ग' को 'ग्र'
का सा लिखा है और अन्य लेखों में भी उसका ऐसा रूप मिलता है, जिसको कोई कोई विद्वान् 'ग्र'
पढ़ते भी हैं परंतु उक्त लेख का लेखक बहुत शुद्ध लिखनेवाला था अत एव उसने भूल से सर्वत्र
'ग्ग' को 'ग्र' लिख दिया हो यह संभव नहीं. उसने उस समय का 'ग्ग' का प्रचलित रूप ही लिखा
है जिसका नीचे का अंश प्राचीन 'ग' का ही कुछ विकृत रूप है, जैसे कोई कोई लेखक वर्तमान नागरी के 'क्त'
और 'क्र' को 'क्त' और 'क्र' लिखते हैं जिनमें वर्तमान 'क' नहीं किंतु उसका प्राचीन रूप ही
लिखा जाता है.
लिपिपत्र २७ वें की मूल पंक्तियों३ का नागरी अक्षरांतर-
संवत् १२६५ वर्षे ॥ वैशाखशु १५ भौमे । चौलुक्य-
वंशोद्धरणपरमभट्टारकमहाराजाधिराजश्रीमद्भीमदेवप्र-
वर्द्धमानविजयराज्ये श्रीकरणे महामुद्रामात्यमहं०-
भाभूप्रभृतिसमस्तपंचकुले परिपंथयति चंद्रावतीनायमां-
डलिकसुरत्राणश्रीधारावर्षदेवे एकातपत्रवाहकत्वेन
६-शारदा ( कश्मीरी ) लिपि.
ई. स. की १० वीं शताब्दी के आसपास से ( लिपिपत्र २८ से ३१ ).
शारदालिपि पंजाब के अधिकतर हिस्से और कश्मीर में प्राचीन शिलालेखों, दानपत्रों, सिक्कों४
तथा हस्तलिखित पुस्तकों में मिलती है. यह लिपि नागरी की नांई कुटिल लिपि से निकली है.
ई. स. की ८ वीं शताब्दी के मेरुवर्मा के लेखों५ से पाया जाता है कि उस समय तक तो उधर कुटिल
लिपि का ही प्रचार था, जिसके पीछे के स्वाइम् (सइ) गांव से मिली हुई भगवती की मूर्ति के आसन
पर खुदे हुए सोमट के पुत्र राजानक भोगट के लेख६ की लिपि भी शारदा की अपेक्षा कुटिल से अधिक
मिलती हुई है. शारदालिपि का सब से पहिला लेख सराहां की प्रशस्ति७ है जिसकी लिपि ई. स. की
१०वीं शताब्दी के आसपास की है. यही समय शारदा लिपि की उत्पत्ति का माना जा सकता है.
१. जोधपुर निवासी मेरे विद्वान् मित्र मुन्शी देवीप्रसाद की भेजी हुई छाप से.
२. चीरवा गांव के मंदिर की भीत में लगे हुए उक्त लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से.
३. ये मूल पंक्तियां उपर्युक्त ओरिआ गांव के लेख से हैं.
४. कश्मीर के उत्पलवंशी राजाओं के सिक्कों में. ५. देखो, लिपिपत्र २२ वां. ६. फो. ऐं. चं. स्टे; पृ. १५२, प्लेट १३.
७. देखो, लिपिपत्र २८ वां. कांगड़ा ज़िले के कीरग्राम के बैजनाथ (वैद्यनाथ) नामक शिवमन्दिर में जालंधर (कांगड़े)