प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपश्चिमी लिपि. ७६
दानपत्र के अक्षरों में से अधिकतर के सिर ⌒ ऐसे हैं जिनकी उत्पत्ति वैद्यदेव के उपर्युक्त दानपत्र के
अक्षरों के सिरों से हुई हो. वर्तमान उड़िया लिपि के अक्षरों के सिर पुरुषोत्तमदेव के दानपत्र के
सिरों से अधिक घुमाववाले हैं और उनका अंतिम भाग अधिक नीचा होता है परंतु वे सिरे उक्त
दानपत्र के अक्षरों के सिरों ही के विकसित रूप हैं.
लिपिपत्र ३५ वें की मूल पंक्तियों¹ का अक्षरांतर—
श्री जय दुर्गायै नमः । वीर श्रीगजपति
गउड़ेश्वर नवकोटिकर्नाटककलवर्गेश्वर
श्रीपुरुषोत्तमदेव महाराजाङ्कर । पोते-
श्वरभटकु दान शासन पटा । ए ५
अङ्क मेष दि १० अं सोमवार ग्रहण-
११—पश्चिमी लिपि.
ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी तक (लिपिपत्र ३६ से ४०).
पश्चिमी लिपि का प्रचार गुजरात, काठियावाड़, नासिक, खानदेश तथा सतारा ज़िलों में,
हैदराबाद राज्य के कुछ अंशों और कोंकण आदि में ई. स. की पांचवीं से नवीं शताब्दी तक रहा
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