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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 318 में से

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पृष्ठ 109

८० प्राचीनलिपिमाला.
ओर मुड़ कर नीचे को झुकी हुई रहती है ( देखो, लिपिपत्र ३६-४८, ५२-५७ ) और अ, आ, ई, क, ञ
और र अक्षरों की खड़ी लकीरों तथा बहुधा उ, ऊ और ऋ की मात्राओं के नीचे के अंश बाईं तरफ
मुड़ कर घुमाव के साथ ऊपर की ओर बढ़े हुए रहते हैं ( देखो, लिपिपत्र ३६-४८, ५२-५८ ). यही
ऊपर की ओर बढ़ा हुआ अंश समय के साथ और ऊपर बढ़ कर सिर तक भी पहुंचने लगा जिससे
तेलुगु-कनडी तथा ग्रंथ लिपियों में अ, आ, ई, क, झ और र की आकृतियां मूल अक्षरों से बिलकुल
विलक्षण हो गई. इसके अतिरिक्त दक्षिण के लेखक अपने अक्षरों में सुंदरता लाने के विचार से खड़ी
और आड़ी लकीरों को वक्र या खमदार बनाने लगे जिससे ऊपर की सीधी आड़ी लकीर की आकृति
बहुधा ⌒ , नीचे की सीधी आड़ी लकीर की ‿ और सीधी खड़ी लकीर की आकृति { ऐसी
बनने लगी तथा इन लकीरों के प्रारंभ, मध्य या अंत में कहीं कहीं ग्रंथियां भी बनाई जाने लगी. इन्हीं
कारणों, तथा कितने एक अक्षरों को चलती कलम से पूरा लिखने, से दक्षिण की लिपियों के वर्तमान
अक्षर उनके मूल ब्राह्मी अक्षरों से बहुत ही विलक्षण बन गये.

लिपिपत्र ३६ वां.
यह लिपिपत्र मंदसोर से मिले हुए राजा नरवर्मन् १ के समय के मालव ( विक्रम ) संवत् ४६१
( ई. स. ४०४ ) और वहीं से मिले हुए कुमारगुप्त २ के समय के मालव ( विक्रम ) संवत् ५२६ ( ई.
स. ४७२ ) के लेखों से तय्यार किया गया है. नरवर्मन् के समय के लेख में 'य' प्राचीन और नवीन
( नागरी का सा ) दोनों तरह का मिलता है. दक्षिणी शैली के अन्य लेखों में 'य' का दूसरा
( नागरी का सा ) रूप केवल संयुक्ताक्षर में, जहां 'य' दूसरा अक्षर होता है, प्रयुक्त होता है
परंतु यह लेख उत्तरी भारत का है, इसलिए इसमें वैसे रूप का भी केवल 'य' के स्थान में प्रयोग हुआ है.
'रु' का दूसरा रूप 'उ' की मात्रा सहित 'र' को चलती कलम से लिखने से बना है, शुद्ध
रीति से लिखा हुआ रूप तो पहिला ही है. 'इ' में दो बिंदियों के ऊपर की सीधी आड़ी
लकीर को वक्र रेखा बना दिया है.

लिपिपत्र ३६ वें की मूल पंक्तियों ३ का नागरी अक्षरांतर—
सिद्धम् सहस्रशिरसे तस्मै पुरुषायामितात्मने च-
तुस्समुद्रपर्य्यङ्कतोयनिद्रालवे नमः श्रीर्माल्वगणाम्नाते
प्रशस्ते कृतसंज्ञिते एकषष्ठ्यधिके प्राप्ते समाशतचतुष्ट-
य(ये) प्रावृक(ट्का)ले शुभे प्राप्ते मनस्तुष्टिकरे नृणाम् मधो(हे)
˙प्रवृत्ते शक्रस्य कृष्णास्यानुमते तदा निष्पन्नव्रीहियवसा

लिपिपत्र ३७ वां.
यह दानपत्र वलभी के राजा ध्रुवसेन ४ के गुप्त सं. २१० ( ई. स. ५३६ ) के और
धरसेन ५ ( दूसरे ) के गुप्त सं. २५२ ( ई. स. ५७१ ) के दानपत्रों से तय्यार किया गया है.
धरसेन ( दूसरे ) के दानपत्र में अनुस्वार और विसर्ग की बिंदियों के स्थान में आड़ी लकीरें बनाई

१. मेरे विद्वान् मित्र देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर की भेजी हुई उक्त लेख की छाप से.
२. फ्ली; गु. इं; प्लेट ११ से. ३. ये मूल पंक्तियां नरवर्मन् के मंदसोर के लेख से हैं.
४. एं. इं; जि. ११, पृ. ११० के पास के सेट से. ५. एं. इं; जि. ८, पृ. ३०२ और ३०३ के बीच के सेटों से.