प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकि अक्षर की चौड़ाई होती है. '११वीं शताब्दी की नागरीलिपि वर्तमान नागरी से मिलती जुलती
ही है और १२ वीं शताब्दी से वर्तमान नागरी बन गई, केवल 'इ', और 'घ' में ही कहीं पुरानापन नज़र
आता है (देखो, लिपिपत्र २६ में जाजल्लदेव के लेख के अक्षर) और व्यंजनों के साथ जुड़नेवाली
ए, ऐ, ओ और औ की मात्राओं में कभी कभी यह अंतर पाया जाता है कि 'ए' की मात्रा व्यंजन
के पूर्व खड़ी लकीर के रूप में सिर की लकीर से सटी रहती है, 'ऐ' की मात्रा में एक तो वैसी ही
खड़ी लकीर और दूसरी तिरछी रेखा व्यंजन के ऊपर लगाई जाती है (देखो, लिपिपत्र २७ में धारा-
वर्ष के लेख से दिये हुए अक्षरों में 'ने' और 'लै'); 'ओ' की मात्रा दो खड़ी लकीरों से बनाई जाती
है जिनमें से एक व्यंजन के पहिले और दूसरी उसके पीछे ('आ' की मात्रा की नांई) रहती
है, और 'औ' में वैसी ही दो लकीरें तथा एक वक्र रेखा व्यंजन के ऊपर रहती हैं (देखो, लिपि-
पत्र २७ की मूल पंक्तियों की दूसरी पंक्ति में 'वंशोद्धरण' में 'शो', और पहिली पंक्ति में 'ओमे' में 'ओ' तथा
'चौलुक्य' में 'चौ'). उक्त ४ स्वरों की इस प्रकार की मात्राएं शिलालेखादि में कहीं कहीं ई. स. की
१५वीं शताब्दी तक और हस्तलिखित पुस्तकों में १६वीं शताब्दी के पीछे तक मिल आती हैं,
जिनको राजपूताना के पुस्तकलेखक 'पड़ी मात्राएं' (पृष्ठमात्रा) कहते हैं. ई. स. की १२ वीं शताब्दी से लगा
कर अब तक नागरी लिपि बहुधा एक ही रूप में चली आती है तो भी लेखनशैली और देशभेद से
कुछ अंतर रह ही जाता है, जैसे कि जैन लेखकों के इ, उ, छ, झ, ठ, ड, ल और क्ष अक्षर
(इ, उ, छ, झ, ठ, ड, ल, क्ष), और दक्खिणवालों के अ, झ, ण, भ और क्ष अक्षर (अ, झ,
ण, भ और क्ष) नागरी के उन अक्षरों से अब भी भिन्न हैं.
दक्षिण में वर्तमान नागरी से अधिक मिलती हुई लिपि उत्तरी भारतवर्ष की अपेक्षा पहिले,
अर्थात् ई. स. की आठवीं शताब्दी से, मिलती है. पहिले पहिल वह राष्ट्रकूट (राठौड़) वंश के राजा
दंतिदुर्ग के सामनगढ़ से मिले हुए शक संवत् ६७५ (ई. स. ७५४) ^१ के दानपत्र में; उसके बाद
राष्ट्रकूट राजा गोविंदराज (दूसरे) के समय के धुलिया से मिले हुए शक सं. ७०१ (ई. स. ७८०) के दानपत्र^२
में; तदनंतर पैठण^३ और वणीगांव^४ से मिले हुए राष्ट्रकूट गोविंद (तीसरे) के दानपत्रों में, जो
क्रमशः शक संवत् ७१६ और ७३० (ई. स. ७६४ और ८०८) के हैं; बड़ौदे^५ से मिले हुए गुजरात
के राष्ट्रकूट ध्रुवराज (धारावर्ष, निरुपम) के श. सं. ७५७ (ई. स. ८३५) के दानपत्र में और
राष्ट्रकूट अमोघवर्ष और उसके शिलारवंशी सामंत पुल्लशक्ति (प्रथम और द्वितीय) के समय के कन्हेरी
के लेखों^६ में, जो क्रमशः श. सं. ७६५ (?) और ७७३ (ई. स. ८४३ और ८५१) के हैं, पाई जाती है और
उक्त समय के पीछे भी दक्षिण की लिपियों के साथ साथ बराबर मिलती चली आती है. उपर्युक्त सब ताम्रपत्र
और शिलालेख भिन्न भिन्न पुरुषों के हाथ के लिखे हुए होने से उनकी लेखनशैली कुछ कुछ निराली
है परंतु उनकी लिपि को नागरी कहने में कोई संकोच नहीं है. इस प्रकार नागरी लिपि ई. स.
की ८ वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से विस्तृत रूप में लिखी हुई मिलती है परंतु उससे पहिले
भी उसका व्यवहार होना चाहिये क्योंकि गुजरात के गुर्जरवंशी राजा जयभट (तीसरे) के
कलचुरि संवत् ४५६ (ई. स. ७०६) के दक्षिणी शैली की पश्चिमी लिपि के दानपत्र^७ में उक्त
राजा के हस्ताक्षर 'स्वहस्तो मम श्रीजयभटस्य' नागरी लिपि में ही है.
१. इं. पं; जि. ११, पृ. ११० से ११३ के बीच के प्लेट. २. बॉ. गॅ; जि. ८, पृ. २८६-७ के बीच के प्लेट.
३. ऐं. इं; जि. ३, पृ. १०६ और १०७ के बीच के प्लेट.
४. इं. पं; जि. ११, पृ. १५८ और १६१ के बीच के प्लेट. ५. इं. पं; जि. १४, पृ. २०० और २०१ के बीच के प्लेट.
६. इं. पं; जि. १३, पृ. १३३ और १३४. जि. २०, पृ. ४२१-२. बू. इं. पे; प्लेट ५, अक्षरों की पंक्ति ५, और पृ. ५१,
टिप्पण ४.
७. इं. पं; जि. २, पृ. २४८ के पास का प्लेट.